पद्म पुराण
पद्म पुराण (संस्कृत: पद्म पुराण) हिंदू धर्म के ग्रंथों एवं अठारह प्रमुख पुराणों में से एक है।
38 लेख उपलब्ध हैं
अनन्यशरणो नित्यं तथैवानन्यसाधन - पद्म पुराण (5.82.33 - 2.5.38)
भगवान शंकर नारद जी से अनन्य भक्ति के विषय में कहते हैं - मनुष्य को सदैव केवल अपने उपास्य देव की ही अनन्य शरण लेनी चाहिए और किसी अन्य साधन को नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि अनन्य-भक्ति से ही जीव की जन्मों की बिगड़ी बात बनेगी । ऐसा भक्त अन्य देव की पूजा न करे, अन्य को प्रणाम न करे, न ही अन्य का स्मरण करे । वह न तो अन्य को देखे, न अन्य के यश गावे और न ही अन्य की कभी निन्दा करे, और न ही अन्य का प्रसाद ग्रहण करे, न ही अन्य की माला आदि धारण करे। अपने इष्टदेव के अतिरिक्त अन्य किसी का वार्तालाप, वंदन, या बाह्य व्यवहार को पूर्ण रूप से त्याग देना चाहिए । जैसे चातक पक्षी अत्यन्त प्यासा होने पर भी नदी या समुद्र का जल नहीं पीता और केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा-बून्द ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार जीव को भी केवल अपने इष्टदेव की ही शरण में जाना चाहिए।
स्त्रियो म्लेच्छास्च पशवः - पद्मपुराण, पातालखण्ड
स्त्रियाँ, म्लेच्छ, पशु, पक्षी, अथवा मृग—जो भी ब्रज में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे सब परम गति को प्राप्त कर लेते हैं।
पूर्णब्रह्मसुखैश्वर्यं नित्यमानंदमव्ययम् - पद्मपुराण, पातालखण्ड(5.69.9)
पृथ्वी पर स्थित वृंदावन पूर्ण ब्रह्म का साकार रूप है जो परम सुख, ऐश्वर्य एवं नित्यानंद से परिपूर्ण है। वैकुंठ आदि लोक तो इसके केवल अंश मात्र हैं।
तस्योभयतटी रम्या - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद 77, 78
भगवान शिव पार्वती माता से कहते हैं - वृंदावन में स्थित यमुना के दोनों तट अत्यंत मनोहर हैं, वे शुद्ध स्वर्ण से निर्मित हैं और वे गंगा से करोड़ों गुना अधिक पुण्यदायिनी मानी जाती हैं, जहाँ के स्पर्श मात्र से ही परम फल की प्राप्ति होती है। उस कर्णिका में श्रीहरि (कृष्ण) असंख्य गुना मधुर एवं आनन्दमयी लीलाओं में संलग्न रहते हैं। कालिंदी कर्णिका (यमुना) और श्रीकृष्ण भिन्न नहीं हैं, वे दोनों एक ही स्वरूप हैं ।
वृंदावनपरित्यागो गोविंदस्य न विद्यते - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 77 (श्री कृष्ण का वर्णन), छंद (61)
श्री वृंदावन धाम को गोविंद कभी भी त्याग नहीं करते। अन्यत्र जगह जैसे मथुरा और द्वारका में जो उनका शरीर दृष्टिकर होता है वह कृतिम है, बनावटी है । इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।
त्वमप्येनां समाश्रित्य राधिकां - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 82 (वृंदावन महिमा), छंद (88)
भगवान कृष्ण कहते हैं - हे शिव! अत: आपको भी मेरी प्रिया श्री राधा की शरण लेनी चाहिए, सदा मेरे युगल मंत्र का जाप करना चाहिए, और मेरे धाम वृंदावन में रहना चाहिए।
बहु जन्मानि पापानि - पद्म पुराण, पातालखण्ड
बहु जन्मों के संचित पाप मथुरा (ब्रज मण्डल) के प्रभाव से क्षण मात्र में नष्ट हो जाते हैं।
सकृदावां प्रपन्नो वा - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 82, छंद (82, 83)
श्री कृष्ण शिव जी से कहते हैं - जो एक बार हम दोनों (मैं और श्री राधा) की शरण में आकर अथवा केवल मेरी प्रिया (श्री राधा) की शरण में आकर उनकी अनन्य भाव से सेवा करता है, वह निस्संदेह मुझको प्राप्त होता है । महेश्वर! इसके विपरीत जो मेरी शरण में आगया, परंतु मेरी प्रिया की शरण में नहीं आया, वह मुझको कभी भी प्राप्त नहीं होगा ।
इदमानंदकंदाख्यं विद्धि वृंदावनं - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 82, छंद (76-78)
श्री कृष्ण कहते हैं: हे रुद्र, यह आनंद कंद ही मेरा निज धाम वृन्दावन है। इसमें प्रवेश मात्र से ही जीव सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाता है। जो मूर्ख मेरे इस निज धाम को प्राप्त कर इसे छोड़ कर अन्यत्र जाता है वो आत्म हत्यारा ही होगा। मैंने केवल सत्य और सत्य ही कहा है। मैं वृन्दावन को छोड़ कर अन्य कहीं कभी नहीं जाता एवं उनके (श्री राधा) के साथ नित्य यहाँ वास करता हूँ ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मत्प्रियां शरणं व्रजेत् - पद्म पुराण, पाताल खंड (82.86)
भगवान श्री कृष्ण श्री शिवजी से कहते हैं - हे रुद्र, यदि मुझे वश में करना चाहते हो तो मेरी प्रियतमा (श्री राधा) का आश्रय ग्रहण करो । मैंने आपसे यह परम रहस्य की बात कही है आप इसे गुप्त ही रखियेगा ।
राधाराधेति यो ब्रूयात् - पद्म पुराण, उत्तर खंड (163.1)
श्री शिव जी देवर्षि नारद से कहते हैं- जो मनुष्य 'राधा-राधा' कहता है तथा उनका स्मरण करता है, वह सब तीर्थों के संस्कार से युक्त होकर सब प्रकार की विद्या की प्राप्ति में प्रयत्नवान् बनता है।
तदालापं कुरुष्वैव - पद्म पुराण, उत्तर खंड (163.3)
भगवान शिवजी कहते हैं: हे महाभाग! श्री राधा का भजन करो, उनका मन्त्र (राधा) जो अति उत्तम है उसका जप करो और हर क्षण राधा-राधा बोलते हुए उनका नाम-कीर्तन करो।
राधाराधेति कुर्य्यात्तु राधाराधेति पूजयेत् - पद्म पुराण, उत्तर खंड (163.2)
शिवजी पार्वती माता से कहते हैं कि जो राधा-राधा कहता है, राधा-राधा कहकर पूजा करता है, राधा-राधा में जिसकी निष्ठा है, जो राधा-राधा नाम उच्चारण करता रहता है, वह महाभाग श्रीवृन्दावन में श्रीराधा की सहचरी होता है।
तत्स्पर्शपुष्पगंधादि नानासौरभसंभवः - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद (117-118)
श्री कृष्णवल्लभा श्रीराधिका ही आद्याप्रकृति हैं। उन राधिका के कोटि-कोटि कलांश से ही त्रिगुणमयी दुर्गा आदि देवियों का प्रादुर्भाव होता है। उन राधिका के पद-रज स्पर्श से करोड़ों विष्णुओं का (व्यापक-पालक-शक्तियों का) उदय हुआ करता है।
हरौ येषां स्थिरा भक्ति भूयसी येषु तत्कृपा - पद्म पुराण, उत्तरखण्ड
हरि की कृपा से जिसको स्थिरा भक्ति प्राप्त हो जाती है, ऐसे ही धन्य व्यक्ति की मथुरा (ब्रज) में प्रीति होती है ।
कथितं ते प्रियतमे गुह्याद्गुह्योत्तमोत्तमम् - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद (57)
हे प्रियतम, मैंने तुमको गोपनीय से भी गोपनीय, रहस्यों का भी रहस्य, दुर्लभों से भी दुर्लभ सर्वोच्च श्री वृंदावन धाम के बारे में ही बताया है।
अन्येषु पुन्य क्षेत्रेषु मुक्तिरेव महाफलम् - पद्म पुराण, पातालखण्ड
अन्य पुण्य क्षेत्रों में मुक्ति ही महाफल है। और मुक्त जनों की प्रार्थनीय हरिभक्ति मथुरा (ब्रज) में प्राप्त होती है। हे मुने! जो मनुष्य मथुरा तीन रात्री निवास करता है, श्रीहरि उसको मुक्तगणों को भी दुर्लभ सुख प्रदान करते हैं।
त्रैलोक्यगोपितं देवि - पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद (58)
हे देवी, श्री वृंदावन को तीनों लोकों में गोपनीय रखा गया है एवं यह देवों के ईश्वर द्वारा भी पूजित है । यह नित्य ही भगवान ब्रह्मा आदि द्वारा वांछित है, एवं यह देवताओं, सिद्धों आदि द्वारा सेवित है ।
गुणातीतं महद्धाम पूर्णप्रेमस्वरूपकम् - पद्मपुराण (5.69.68)
यह पवित्र धाम गुणातीत है, एवं पूर्ण प्रेम स्वरूप है जहां वृक्ष इत्यादि भी भाव विभोर होकर [पुलक इत्यादि युक्त] आँसु बहाते हैं, फिर पूर्ण चेतना युक्त विष्णु भक्त जो यहाँ निवास करते हैं उनके बारे में क्या ही कहा जाए । इस धरती पर श्री वृंदावन ही वह भूमि है जो नित्य ही भगवान कृष्ण के चरणों की रज के संपर्क में रहती है।
गुह्याद्गुह्यतरं रम्यं मध्ये वृंदावनं भुवि - पद्मपुराण (5.69.71)
पृथ्वी पर व्याप्त श्री वृंदावन समस्त रहस्यों से भी बड़ा रहस्य है। यह गोविंद का नित्य निवास स्थान है, एवं परमानंद स्वरूप है।