लाल कैं यह मन ललक रहै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (27)
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) के हृदय में सदैव यही लालसा बनी रहती है कि कब श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) प्रसन्न होकर मेरी ओर तनिक-सा निहारेंगी।
पद्यावली, बयालीस लीला ग्रंथ का एक अध्याय है, जिसमें रस पदों को काव्यात्मक शैली में क्रम से पिरोया गया है, जिसे श्री हित ध्रुवदास जी ने लिखा है।
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श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) के हृदय में सदैव यही लालसा बनी रहती है कि कब श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) प्रसन्न होकर मेरी ओर तनिक-सा निहारेंगी।
मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।
परम स्नेही केवल एक श्रीविहारी और श्रीविहारिणी ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं।
हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल वाणी में वार्तालाप कर रहे हैं।
हे सखि ! हमारे युगल किशोर प्रेम की चरम सीमा हैं। इनका तन, मन और नेत्र — सब एक हो गए हैं, ये कभी एक-दूसरे से विलग नहीं होते।
वर्षा ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना, विद्युत की चमक, चातक, कोयल, शुक और मोर के मधुर स्वर वातावरण को सुखमय बना रहे हैं। काजल से भी अधिक काले बादल चारों ओर से उमड़-घुमड़ कर आकाश कर घिर आए हैं।
रसिक शिरोमणि श्रीलाल जी (श्री कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा और कौन रँगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रेम के ही रंग में रँग गया हो।
हे सखि ! प्राणों का उत्सर्ग करने पर भी लाड़िली-लाल का यह सर्वोपरि प्रेम नहीं मिलता, ऐसा विलक्षण-मूल्यवान् अर्थात् महँगा है यह प्रेम, अतएव हे सखि ! तुम्हीं बताओ इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
श्री राधा श्री कृष्ण के प्राण हैं और श्री राधा के प्राण हैं श्री कृष्ण। ऐसे प्रेम-राशि युगल परस्पर एक दूसरे की छवि का निरंतर अवलोकन करते रहते हैं, तथापि किसी भी प्रकार तृप्त नहीं होते, वरन् उनकी रुचि अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है।
श्री वल्लभ लाल जू की प्रिया श्री राधिका के सुन्दर तन पर नील वर्ण की साड़ी एवं सुगन्ध से सनी हुई सुन्दर कञ्चुकी भली प्रकार कसी हुई शोभित है।
हे मेरे मन ! तू श्री राधा नामक नित्य नव-वधू नवल-किशोरी की ही आराघना कर, जिनकी आराधना रसिक शेखर श्री विहारीलाल भी सदा करते हैं।
अखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में यदि कोई प्रेमी है, तो वह केवल श्री वृन्दावन निकुञ्ज-विलासी विहारी-विहारिणी श्री लाड़िली-लाल ही हैं, जो केवल अनन्य प्रेम की रंग-रुचि में अद्भुत रूप से अनुरञ्जित हुए देखे जाते हैं।
श्री हित ध्रुवदास जी रसिक उपासकों को उपदेश करते हैं कि तुम श्री राधावल्लभ का ही भजन करो, केवल श्री राधावल्लभ का ही भजन करो और अन्य धर्मों को सर्वथा त्याग दो ।
सुहावनी छवि से युक्त रंगीले युगल यमुना तट पर विराजमान हैं । उनके युगल-गौर तनु पर अंग-अंग के भूषण प्रतिबिम्भित हैं ।
आज श्री लाड़ली लाल की छवि पूरित जोड़ी अनुपम शोभा दे रही है। सुन्दर एवं नित्य नव-नवायमान् रूप लावण्य-धाम रसिक मन-मोहन श्रीलाल जी और रूप विलक्षण नित्य नूतन कुँवरि किशोरी की जोड़ी अपूर्व है ।
आज रँग रँगीली प्रिया अपने प्रियतम से उमग-उमग कर रस-मरी वार्ता कर रही हैं। जिसे पुनः पुनः श्रवण करके श्री नवल रसिक मन-मोहन प्रियतम उस वार्ता को सुनते ही रहने के लिए बार-बार ललचा रहे हैं।
हे सखि ! मेरे नेत्र रूप के रँग में रँग गये हैं । वे चन्द्रमा रूपी युगल किशोर के बदनारविन्द की शोभा के रस में पगे हुये हैं ।
रसिक शेखर श्रीलाल जी के अतिरिक्त ऐसा और कौन रैंगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रेम के ही रंग में रँँग गया हो ।
श्री राधावल्लभ लाल की आरती जो कञ्चन निर्मित मणिमयी एवं रत्न जटित है, सहचरियाँ प्रीतिपूर्वक वार (उतार) रही हैं ।
नव निकुंज देश की कोई सहचरी अपनी सहेली से कहती है - हे सखी ! प्रीति की अध्भुत गति का अवलोकन तो करो, जहॉ प्रिया अपने प्रियतम को प्रीति पूर्वक हृदय पर ऐसे धारण करती है जैसे कोई माला को धारण करता है ।