पद्यावली [बयालीस लीला]

पद्यावली, बयालीस लीला ग्रंथ का एक अध्याय है, जिसमें रस पदों को काव्यात्मक शैली में क्रम से पिरोया गया है, जिसे श्री हित ध्रुवदास जी ने लिखा है।

33 लेख उपलब्ध हैं

  1. आरती राधिका-लाल पर वारौं सहज - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20)

    मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।

  2. सनेही एक विहारी-विहारिनि एक - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (99)

    परम स्नेही केवल एक श्रीविहारी और श्रीविहारिणी ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं।

  3. आज सखि निरख रूप भरि नैन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (91)

    हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल वाणी में वार्तालाप कर रहे हैं।

  4. गरजनि घन अरु दामिनी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (68)

    वर्षा ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना, विद्युत की चमक, चातक, कोयल, शुक और मोर के मधुर स्वर वातावरण को सुखमय बना रहे हैं। काजल से भी अधिक काले बादल चारों ओर से उमड़-घुमड़ कर आकाश कर घिर आए हैं।

  5. ऐसौ और सनेही कौन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)

    रसिक शिरोमणि श्रीलाल जी (श्री कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा और कौन रँगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रेम के ही रंग में रँग गया हो।

  6. प्रान दियैं यह प्रेम न पैयै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)

    हे सखि ! प्राणों का उत्सर्ग करने पर भी लाड़िली-लाल का यह सर्वोपरि प्रेम नहीं मिलता, ऐसा विलक्षण-मूल्यवान् अर्थात् महँगा है यह प्रेम, अतएव हे सखि ! तुम्हीं बताओ इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?

  7. प्रीतम के प्रान प्यारी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (37)

    श्री राधा श्री कृष्ण के प्राण हैं और श्री राधा के प्राण हैं श्री कृष्ण। ऐसे प्रेम-राशि युगल परस्पर एक दूसरे की छवि का निरंतर अवलोकन करते रहते हैं, तथापि किसी भी प्रकार तृप्त नहीं होते, वरन् उनकी रुचि अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है।

  8. राधिकावल्लभ प्यारी सोहै तन नील सारी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (38)

    श्री वल्लभ लाल जू की प्रिया श्री राधिका के सुन्दर तन पर नील वर्ण की साड़ी एवं सुगन्ध से सनी हुई सुन्दर कञ्चुकी भली प्रकार कसी हुई शोभित है।

  9. सनेही एक विहारी-विहारिनि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)

    अखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में यदि कोई प्रेमी है, तो वह केवल श्री वृन्दावन निकुञ्ज-विलासी विहारी-विहारिणी श्री लाड़िली-लाल ही हैं, जो केवल अनन्य प्रेम की रंग-रुचि में अद्भुत रूप से अनुरञ्जित हुए देखे जाते हैं।

  10. श्री राधावर भज श्री राधावर भजि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (94)

    श्री हित ध्रुवदास जी रसिक उपासकों को उपदेश करते हैं कि तुम श्री राधावल्लभ का ही भजन करो, केवल श्री राधावल्लभ का ही भजन करो और अन्य धर्मों को सर्वथा त्याग दो ।

  11. सोभित आज छबीली जोरी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (30)

    आज श्री लाड़ली लाल की छवि पूरित जोड़ी अनुपम शोभा दे रही है। सुन्दर एवं नित्य नव-नवायमान् रूप लावण्य-धाम रसिक मन-मोहन श्रीलाल जी और रूप विलक्षण नित्य नूतन कुँवरि किशोरी की जोड़ी अपूर्व है ।

  12. रंगीली करत रंगीली बात - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (93)

    आज रँग रँगीली प्रिया अपने प्रियतम से उमग-उमग कर रस-मरी वार्ता कर रही हैं। जिसे पुनः पुनः श्रवण करके श्री नवल रसिक मन-मोहन प्रियतम उस वार्ता को सुनते ही रहने के लिए बार-बार ललचा रहे हैं।

  13. ऐसौ और सनेही कौन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)

    रसिक शेखर श्रीलाल जी के अतिरिक्त ऐसा और कौन रैंगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रेम के ही रंग में रँँग गया हो ।

  14. देखौ अद्भुत प्रीति की चालहि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (60)

    नव निकुंज देश की कोई सहचरी अपनी सहेली से कहती है - हे सखी ! प्रीति की अध्भुत गति का अवलोकन तो करो, जहॉ प्रिया अपने प्रियतम को प्रीति पूर्वक हृदय पर ऐसे धारण करती है जैसे कोई माला को धारण करता है ।

  15. राधिका वल्लभ प्यारी, सहजहि सुकुँवारी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (39)

    प्रियतम श्री लाल जी की प्रिया श्री राधा सहज ही अङ्ग-प्रत्यङ्ग कोमलाङ्गी, गुणों की भण्डार तथा रस एवं रूप की राशि हैं।