श्री रघुनाथ दास गोस्वामी
श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख 6 शिष्यों में से एक थे, जिन्होंने श्री राधाकुंड में निवास किया और वहां रहकर मंजरी भाव से भजन किया।
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त्वदलोकन-कालाहि - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (9)
हे क्रीड़ा परायण स्वामिनी श्री राधे!, आपके दर्शन के अभाव में मैं काले सर्प के डंक से क्षण क्षण मरी जा रही हूँ। कृपया अपने श्री चरण कमल में संलग्न अलतारूप (महावर) औषधि देकर मुझे जीवन प्रदान करो।
सदा राधाकृष्णोच्छलदतुल - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (3)
मैं युग के समान अति दीर्घकाल पर्यन्त विरही होते हुए भी सदा श्री राधा कृष्ण के उल्लासयुक्त अतुलनीय लीलास्थल इस ब्रजधाम को त्यागकर पूर्ण एश्वर्य से दीप्तिमान श्री यदुपति को, उनके कहने पर भी उनके दर्शन करने के लिए क्षणमात्र को भी श्री द्वारिका नहीं जाऊँगा ।
यदा तव सरोवरं सरस-भृंगसंघोल्लसत् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (15)
हे प्रफुल्लित - कमलनयने ! जब से मैंने मधुर गुञ्जनकारी मधुकरों से शोभित, कमलसमूह से मनोहर और मधुरजल से पूर्ण आपके सरोवर ( राधाकुण्ड ) का दर्शन किया है, तब से आपके श्रीचरणों के दास्यरस में मेरी लालसा जाग उठी है ।
लक्ष्मीर्यदङ्घ्रिकमलस्य नखाञ्चलस्य - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (101)
हे स्वामिनी, लक्ष्मी देवी भी आपके चरणारविन्द के नखाग्र प्रान्त के सौन्दर्य का एक बिन्दु मात्र भी प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि आप मुझे अपने रूप-लीलादि के दर्शन योग्य नेत्र नहीं प्रदान करेंगी तो दावाग्नि के समान दुखदायी मेरे इस जीवन का क्या प्रयोजन है?
रतिं गौरीलीले अपि तपति सौन्दर्यकिरणैः - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, मन शिक्षा (10)
हे मन! जो अपनी सौन्दर्य-किरणों से रति, गौरी एवं लीला को सन्तप्त करने वाली हैं, सौभाग्य समूह से जो इन्द्राणी, लक्ष्मी तथा सत्यभामा को पराजित करने वाली हैं और प्रियतम श्रीकृष्ण को वशीभूत करने में जो श्रीचन्द्रावली–प्रमुख नवतरुण ब्रजललनाओं को दूर निक्षेप कर देती हैं, उन श्रीहरिप्रेयसी श्रीराधा जी का भजन कर ।
पादाब्जयोस्तव विना वर - दास्यमेव - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (16)
हे दिव्य-क्रीड़ा परायणा स्वामिनि ! आपके चरण-कमलों के सर्वश्रेष्ठ दास्य को छोड़कर मैं कभी भी अन्य किसी (सख्यादि) भाव की प्रार्थना नहीं करती हूँ। आपके सखीत्व को मैं नित्य बार-बार नमस्कार करती हूँ। आपके दास्य में ही मेरा अनुराग हो, यह मैं सत्य कह रही हूँ।
यथा दुष्टत्वं मे - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, मन शिक्षा (8)
अरे मन! तू इस श्रीब्रज धाम में ऐसी दीनतामय व्याकुलता से श्रीगिरिधारी जी [श्री कृष्ण] का भजन कर, जिससे वे कृपा करके मुझ जैसे शठ का भी दुष्ट स्वभाव दूर कर दें और मुझे प्रेमामृत प्रदान करते हुए श्रीराधा का भजन का विधान करने के लिये आदेश करें ।
यत्प्रान्तदेश लवलेश विघूर्णितेन - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (42)
हे करुणामयि राधे! आप जब अपने नेत्रप्रान्त को लेश मात्र भी घुमाती हैं-(चञ्चल दृष्टि से इधर-उधर देखती हैं) तो कृष्ण-गजेन्द्र उसी क्षण दृढ़ बन्धन में आ जाता है। खञ्जन के नेत्रों को भी पराभूत करने वाले आपके इन नेत्रों की, मैं कभी आदर सहित काजल लगा कर पूजा कर सकूँगी?
अनाराध्य राधापदाम्भोजयुग्ममाश्रित्य - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, स्व-संकल्प-प्रकाश-स्तोत्र (1)
जिसने श्री राधारानी के चरण रज की एक बार भी आराधना नहीं की, उनके चरण चिन्ह से आच्छादित श्री ब्रज धाम की एक बार भी शरण ग्रहण नहीं की, उनको नित्य लाड़ लड़ाने वाले प्रेमी रसिक भक्तों से एक बार भी वार्ता नहीं की, वह कितना मूर्ख है जो सोचता है कि वह श्री श्याम सुन्दर के रहस्य रुपी प्रेम समुद्र में अवगाहन करेगा।
देवि दुःखकुलसागरोदरे दूयमानमति दुर्गतं जनम् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (8)
हे देवि श्रीराधिके ! मैं दुःखसमूहरूप दुष्पार सागर में निराश्रय अवस्था में अति दुर्गति को प्राप्त कर रही हूँ। आप अपनी कृपारूप दृढ़ नौका में चढ़ाकर अपने अद्भुत चरणकमल-भवन में मुझे ले जाइये।
अजाण्डे राधेति स्फुरदभिधया सिक्तजनयाऽनया - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (7)
इस ब्रह्माण्ड में जो व्यक्ति 'श्रीराधा'- इस उज्ज्वल नाम द्वारा सब मनुष्यों को प्रेम-पूर्वक नमस्कार करते हुए श्री कृष्ण का भजन करता है, अहह ! प्रतिदिन उस व्यक्ति के श्रीचरण-कमलों को धोकर मैं उस चरणामृत को अतिशय आनन्दपूर्वक हर समय पान कर मस्तक पर धारण करूँगा।
य एकं गोविन्दं भजति कपटी दाम्भिकतया - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (6)
जो व्यक्ति केवल श्री कृष्ण की ही भक्ति करते हैं बिना श्री राधारानी के, ऐसे कपटी व्यक्तियों के मैं कभी भी समीप नहीं जाऊँगा, यह मेरा प्रन है।
हे श्रीसरोवर सदा त्वयि - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (98)
हे श्रीराधाकुण्ड मेरी स्वामिनी श्रीराधा जी अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के साथ आपके तटवर्ती कुञ्ज में प्रेमोद्रेक में विविध क्रीड़ाएं करती रहती हैं। हे राधाकुण्ड ! आप उन युगलकिशोर के प्रिय से भी अधिक प्रियतम हैं। अतएव कृपा करके मेरी जीवनस्वरूपा स्वामिनी श्रीराधा के आज ही दर्शन करा दो ।
स्वप्नेऽपि किं सुमुखि ते चरणाम्बुजात - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (11)
हे सुमुखि ! अहो ! कभी स्वप्न में भी मैं आपके चरणकमलों के सुगन्धित परागचूर्ण रूप विभूषण से अपने मस्तक को परम सुशोभित करके मस्तक के उत्तमांग-नाम को सार्थक कर पाऊँगी।
जित्वा पाशकखेलायामाच्छिद्य - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (80)
हे दिव्यलीलामयि ! पाशक-क्रीड़ा में श्रीश्यामसुन्दर को हराकर, उनकी वंशी छुड़ाकर कब मेरी ओर फेंकोगी और मैं उसे छिपाकर सुरक्षित रख लूंगी ?
आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (102)
हे श्रेष्ठभंगि स्वामिनि [श्री राधे] ! अमृत सिन्धु [आपके चरण कमल] की प्राप्ति की प्रत्याशा में अब तक मैं अति कष्ट पूर्वक समय बिता रही हूँ। अब भी यदि आप मुझ पर मुझ कृपा नहीं करती हैं, तो फिर जीवित रहने का, व्रज में वास करने का यहां तक कि श्रीकृष्ण से ही मेरा क्या प्रयोजन है ?
स्वमुखान्मन्मुखे देवि कदा - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (93)
हे करुणामयि देवी श्री राधे ! चारों ओर देखते हुए अवसर पाकर कदा आप स्नेह पूर्वक अपने मुख का चर्वित पान मेरे मुख में ही प्रदान करोगी?
हा नाथ गोकुलसुधाकर सुप्रसन्न - श्री रघुनाथ दास, विलाप कुसुमांजलि (100)
हे नाथ ! हे गोकुलचन्द्र ! हे प्रसन्नमुखकमल ! हे मधुर-मन्द मुसकानकारी ! हे कृपाभिषिक्त ! आप जहां अतिशय प्रेमपूर्ण होकर अपनी प्रिया श्रीराधा जी के साथ विहार करते हैं, अपनी प्रियतमा की सेवा के लिये मुझे भी आप वहां ले चलो ।
न चानयत्र क्षेत्रे हरितनु - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (02)
मैं एक क्षण के लिए भी किसी अन्य पवित्र धाम में नहीं रहूंगा, भले ही वह जगह में श्री कृष्ण की साक्षात अनुभूति क्यों न होती हो, भले ही वहां अत्यंत महान भक्त नित्य हरी कथा रस में क्यों न मुझे डुबाते हों अथवा उस हरी कथा रस का नित्य पान करते हों, किन्तु मेरी केवल और केवल यही इच्छा है कि मैं जन्म जन्मांतर ब्रज में ही रहूं, चाहे मैं अपना समय यहाँ के ग्रामीण लोगों से फ़ालतू बात करते हुए ही क्यों न व्यतीत करूँ।
ब्रज विलास स्तव - रघुनाथ दास गोस्वामी
ओ! जब मैं ब्रज में गोवर्धन के ढलानों के चारों ओर घूमता हूं तो पागलपन मैं बार-बार पुकारता हूं, "हे राधे! हे कृष्ण! ", और जब कभी गोवेर्धन पर्वत पे ठोकरें खाकर और कभी-कभी जमीन पर बेहोश हो जाता हु तो मेरी आँखों के आंसुओं लगातार बाह जाते है