प्रथम सहचरी भाव हिय - श्री रामराय जी, आदिवाणी (102.1)
सर्वप्रथम अपने हृदय में सहचरी-भाव धारण करके स्वयं को मानसी-भाव से कुंज के द्वार पर उपस्थित करना चाहिए, जहाँ मंगलमय श्री युगल किशोर की विविध प्रकार से प्रेमपूर्वक सेवा करते हुए उनका गुणगान करना चाहिए।
