श्री रामराय
श्री रामराय वृंदावन धाम के एक महान रसिक संत थे जो श्री नित्यानंद प्रभु के शिष्य थे। श्री रामराय जी का वंश गीत गोविंद के रचयिता श्री जयदेव का वंशज माना जाता है। श्री रामराय का जन्म चौदहवीं पीढ़ी में जयदेव के यहाँ हुआ था । उनका जन्म लाहौर में हुआ था, लेकिन वे कम उम्र में वृंदावन चले गए। उन्होंने आदि वाणी ग्रंथ की रचना की है जो ब्रज भाषा में लिखी गई है।
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वृन्दावन ही बीज है वृन्दावन - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (86)
श्रीवृन्दावन ही विशुद्ध प्रेमाभक्ति का बीज है और श्रीवृन्दावन ही उसका खिला हुआ पुष्प है। श्रीवृन्दावन ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है तथा श्रीवृन्दावन ही प्रेम-रस का मूल स्रोत और आधार है।
तेरौ मुख पीयूष पंक प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (20)
श्री कृष्ण कहते हैं—हे प्यारी श्रीराधे! आपका मुख अमृतमय सरोवर के समान है और उसमें आपके दोनों नेत्र दो नीलकमलों के समान प्रकट हो रहे हैं। मेरा मन मतवाले भ्रमर के समान होकर उन दोनों नीलकमल रूपी नेत्रों में जा बसा है, यहाँ तक कि वह उनकी पुतलियों के भीतर ही निवास करने लगा है।
मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)
प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है।
प्रथम सहचरी भाव हिय - श्री रामराय जी, आदिवाणी (102.1)
सर्वप्रथम अपने हृदय में सहचरी-भाव धारण करके स्वयं को मानसी-भाव से कुंज के द्वार पर उपस्थित करना चाहिए, जहाँ मंगलमय श्री युगल किशोर की विविध प्रकार से प्रेमपूर्वक सेवा करते हुए उनका गुणगान करना चाहिए।
प्यारी देख मेरें कैसी वीरी रची - श्री रामराय जी, आदिवाणी (26)
सखी श्री राधा से कहती है — हे प्यारी जू! देखो, मैंने कितनी सुंदर बीरी (पान) रची है। इसका फल यह होगा कि तुम्हारे अमृत-से अधरों पर लालिमा और भी गाढ़ी हो जाएगी—अर्थात् तुम्हारे लाल होठों पर यह और गहरी रंजना कर देगी।
प्यारी तोहि कैसै कै मान मनाऊँ - श्री रामराय जी, आदिवाणी (37)
हे प्यारीजू! तुम्हारे मान (रूठने) को मनाने का मैं हर संभव प्रयास कर रहा हूँ, किंतु मैं पूर्णतः विवश हो चुका हूँ। तुम्हारी राजधानी वृन्दावन में वास करते हुए हर क्षण कोई न कोई नई युक्ति गढ़ता हूँ, परंतु वह भी निष्फल ही सिद्ध हो रही है।
श्रीवृन्दावन रज परस - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (78)
श्री वृन्दावन की रज का स्पर्श अत्यंत सरस, हृदय को हर्षित करने वाला और समस्त सुखों का मूल है। इसलिए श्रीधाम वृन्दावन में यमुना तट पर वास कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए।
वृन्दावन को नाम ले, भज वृन्दावन धाम - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (87)
श्री वृंदावन का नाम लो, श्री वृंदावन धाम का भजन करो क्योंकि श्री वृंदावन धाम के समान त्रिलोक में विश्राम स्थल और कोई नहीं है।
तन वृन्दावन वास कर धन वृन्दावन वास - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (84)
अपने तन से वृंदावन में वास करना चाहिए, क्योंकि वृंदावन वास जीवन का अमूल्य धन है। मन को भी वृंदावन में लीन कर, प्रिया-प्रियतम की वृंदावन से संबंधित रस लीलाओं का निरंतर चिंतन करना चाहिए।
श्रीवृन्दावन रस सुधा सिंधु निमज्जत जोय - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (81)
जो व्यक्ति स्वयं को श्री वृंदावन रस रूपी अमृत-सागर में पूर्णतः डुबो देता है, उसे फिर कभी दैहिक, दैविक और भौतिक त्रितापों का स्पर्श नहीं होता।
वृन्दावन की याद जो आवत है मन मांहि - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (85)
जिस किसी को वृंदावन की याद आती है उसी क्षण श्री राधा अपने प्रियतम (श्रीकृष्ण) संग उस व्यक्ति को कृपापूर्वक स्वीकार कर उसकी सराहना करती हैं।
प्यारी तोहि वुरी वान जह मान की - श्री रामराय जी, आदिवाणी (36)
श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं, “हे प्यारी जू! आपकी यह मान करने की आदत मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक है”। यदि आपकी थोड़ी सी भी टेढ़ी भौंहें देख लेता हूँ, तो मेरे प्राण अति व्याकुल हो उठते हैं, अपनी सुधि-बुधि खो बैठता हूँ ।
रसिकन कृष्ण प्रेमरस निधिसौं - श्री रामराय जी, आदिवाणी (60)
अनन्य रसिकों ने श्री कृष्ण प्रेम-रस रूपी धन की साक्षात मूर्तिमान स्वरूपा अर्थात् रंगीली श्री राधा को ही सदा लाड़ लड़ाया है, जो समस्त जीवों की विविध प्रकार की प्राकृत वासनाओं का अविरल रूप से हरण करती हैं।
ललित लता मन्दिर के आंगन - श्री रामराय जी, आदिवाणी (10)
प्रातः काल के समय श्री राधा कृष्ण सुन्दर लता मंदिर के आंगन में विराजमान हैं। श्री प्रिया जी श्री कृष्ण की पीताम्बरी ओढ़े हुए हैं एवं श्री कृष्ण श्री प्रिया जी की नीली साड़ी ओढ़े हुए हैं।
श्रीबृन्दावन प्यारौ प्यारी कौ - श्री रामराय जी, आदिवाणी (81)
श्री वृंदावन धाम श्री राधा प्यारी को अत्यंत प्रिय है इसलिए श्यामसुन्दर को वृंदावन प्राणों से भी अधिक प्यारा है । निशिदिन, छिन छिन, उनका वृंदावन के प्रति प्रेम दुगना, चौगुना होकर बढ़ता रहता है क्योंकि यह राधा प्यारी का ही अभिन्न स्वरूप है ।
श्री राधेजू कौ श्रीवृंदावन वनराजु - श्री रामराय जी, आदिवाणी (3)
श्री वृंदावन वनराज श्री राधा जू का है जहाँ की भूमि रत्नों से जटित एवं लताएं सोने के समान सजी हैं ।
प्यारीजू प्यारेकौं भावै सो सहज करैं - श्री रामराय जी, आदिवाणी (1)
प्यारे श्री श्यामसुंदर को जो भाता है, वही प्यारी श्री राधा सहज में करती हैं एवं प्यारी श्री राधा को जो सदैव भाता है, वही प्यारे श्री श्यामसुंदर करते हैं ।
कियौ सिंगार लाल प्यारी कौ - श्री रामराय, आदिवाणी (17)
श्री लालजी (श्री कृष्ण) ने श्री प्यारी जू का सुन्दर श्रृंगार किया है जिसका दर्शन कर सखियाँ मुस्कुरा रही हैं ।
श्री रामराय जी की जीवनी
श्री रामराय जी का प्राकट्य रावी नदी के तट पर बसे लाहौर नगरी में सारस्वत ब्राह्मण कुल में 1483 वैशाख शुक्ल 11 को मध्यान काल में हुआ ।
रे मन करि श्रीवन अनुराग - श्री रामराय, आदिवाणी (93)
रे मन! श्री वृंदावन धाम से अनुराग कर । तूने 84 लाख योनियों को पार कर मनुष्य जन्म प्राप्त किया है, इसलिए महल की टहल (श्री राधा कि निज महल में सेवा) के लिए साधनारत हो ।