श्री रसिक देव जू की वाणी
श्री रसिक देव जू की वाणी श्री हरिदास संप्रदाय में बताई गयी निकुंज उपासना के दोहों का संग्रह है, जिसे श्री रसिक देव जी ने लिखा है। श्री रसिक देव जी, वृंदावन के रसिक संत, श्री नरहरी देव जू के शिष्य, और स्वामी श्री हरिदास परम्परा के अष्टचार्य (आठ आचार्यों) के छठे आचार्य थे।
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पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)
प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।
लेत परस्पर अंग सुवास मन - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (19)
श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर एक-दूसरे के अंगों की दिव्य सुगंध का रसास्वादन कर रहे हैं, जिससे उनके मन में अलौकिक प्रेम-काम की तरंगें उठ रही हैं और इस दिव्य रस के अतिरिक्त उन्हें अन्य किसी भी बाहरी वस्तु का भान नहीं है।
प्यारी जू तैं मोहि मोल लियो - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (15)
श्रीलालजी (कृष्ण) अपनी प्रियाजी (श्री राधा) से कहते हैं—हे प्यारी जू! आपने तो मुझे बिना मोल के अपना बना लिया है (मैं आपका बिना मोल का दास हो गया हूँ)। आपकी ही कृपा से मैंने कामदेव की विशाल सेना पर विजय प्राप्त की है; अब तो मैं आपके द्वारा दिए गए जीवन-दान से ही जीवित हूँ।
एक अखंडित एकरस निरवधि रति जो होइ - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (4)
जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।
बनि दुकूल बैठे परजंक - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (17)
दोनों प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) रेशमी वस्त्रों से सुशोभित होकर साथ बैठे हैं। कमल-से नेत्रों से एक-दूजे को निहारते हैं और प्यारीजू (श्री राधा) अपने प्रियतम को प्रेम-सुख में भरकर आलिंगन करती हैं।
रसिक रीति अद्भुत कथी - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (18)
श्री श्यामा कुंजबिहारी की दिव्य केली-रस में डूबे हुए रसिकों द्वारा अपनाई गई यह रस-रीति अत्यंत ही अद्भुत है। श्री रसिक देव जी कहते हैं कि श्री नरहरिदास जी की कृपा और प्रताप से ही रसिकों के संग उन्हें इस प्रेममय धाम में निवास का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
मंद हँसनि मुख कमल की - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (7)
अपने मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान एवं तिरछी चितवन से मेरी ओर निहार कर, श्री राधा ने मुझे अपने वश कर, मेरे प्राणों का हरण कर लिया।
रसिक बिहारी सौं बनी - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (16)
मेरी रसिक बिहारी से ऐसी बनी हुई है कि वे पल भर को भी मेरा साथ नहीं छोड़ते, जिसे देखकर मुझे आश्चर्य होता है कि ये वन में रास रचाने कब जाते होंगे।
होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (21)
श्री श्यामसुंदर के संग होली खेलने के लिए उल्लास से भरी हुई छबीली श्याम प्यारी (श्री राधा) आयी हैं । अपने नेत्रों में अबीर एवं गुलाल रूपी प्रेम रंग भरकर, आज यह अपने मनभाया कर रही हैं ।
रसिक रसीली बात सों - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (2)
जब श्री राधा विहार-लीला में मान धारण करती हैं, तब रसिकवर श्री लाल जी उनकी ओर मुख कर, मधुर एवं रसीली बातों से उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं और नयनों के संकेत से ही प्रणाम कर विनयपूर्वक प्रार्थना करते हैं।
हिंडोरे झूलत तन सुकुमार - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (23)
सुकुमार शिरोमणि नित्यविहारी श्री युगल आनदोल्लास के हिंडोले पर झूल रहे हैं। श्री प्रियाजी पुलकित हो होकर अपने प्राणाधार प्रियतम के हृदय से लग रही हैं।
श्री हरिदास उपासना - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (10)
स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य-विहारमयी उपासना अत्यंत दुर्लभ है— लाखों में कोई एक ही उसे समझ और धारण कर पाता है। इस दिव्य रस-परंपरा को प्राप्त करना सहज नहीं; असंख्य साधक प्रयास कर चले गए, परंतु विरले ही उसके अधिकारी बने।
पुरुष भाव छूटै नहीं, मन में बस रही जोई - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (12)
सखी भाव एक दिव्य भाव है जिसका प्रादुर्भाव बिना निर्विकार हुए नहीं होता, जहाँ जीव लौकिक कर्मों एवं संबंधों से सर्वप्रथम अनासक्त हो जाता है, जहाँ वह न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक।
तिहारौ तौ परयौ है मान को सुभाव - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (11)
प्रिया प्रियतम एक दूसरे को निहार रहे हैं । इतने में श्री राधा मान कर लेती हैं । ऐसा सूक्ष्म मान हुआ है कि कुछ समझ ही नहीं आ रहा, कटाक्ष में ही मान हो गया है । इतने में एक सखी श्री राधा से कहती है, हे राधे, तुम्हारा तो मान का स्वभाव ही है ।
रसिक निमिष नहिं बीछुरैं, ना दुरि बैठें और - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (1)
हमारे रसिक बिहारी-बिहारिनी एक क्षण के लिए भी परस्पर से अलग नहीं होते और कहीं दूर भी नहीं बैठते। इस दिव्य विहार में मान केवल इतना-सा होता है कि नयनों की कोर से हलका-सा दुराव प्रकट हो जाता है।
दूलह दुलहिन अधिक बनी - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (25)
नित्य दूल्हा दुलहिन श्री राधा कृष्ण आज सम्पूर्ण श्रृंगार से सज्जित हैं । दोनों कल्पतरु वृक्ष की पूजा करने चले हैं, लेकिन आज यहाँ बात कुछ और है ।
मन सीसी राधा अतर - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (8)
मेरे मन-रूपी शीशी में श्री राधा-रूपी इत्र नख-शिख तक भरा हुआ है। उसे देखकर साँवरे श्री कृष्ण भँवरे के समान मोहित होकर उससे लिपटे रहते हैं।
श्रीबिहारीजू खेलत बसंत - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)
श्रीबिहारी जी वसन्तका खेल-खेल रहे हैं । आनन्द से भरी सब सखियाँ भी वहाँ उपस्थित हैं और हैं श्री किशोरी जी जिनके प्रत्येक अंग में रूप खिला है ।
सखी री मन के स्याम सुखदाई - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)
हे सखी, मन में जो श्री नित्यबिहारी बिहारिनी जु निरंतर विहार कर रहे हैं, वे ही श्याम सदाकाल सुखदाई हैं । प्रकट श्याम से हर क्षण कैसे मिल सकते हैं और उनका वियोग भी दुःखदाई है ।
भाग बड़ौ वृन्दावन पायौ
अत्यंत भाग्य से ही वृंदावन धाम का वास एवं प्रेम प्राप्त होता है ।
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