श्री रसनिधि

श्री रसनिधि, ब्रज के एक रसिक कवि

17 लेख उपलब्ध हैं

  1. हरि कौ सुमिरौ हर घरी - श्री रसनिधि

    हे परम चतुर और सज्जन पुरुषों! जीवन की प्रत्येक घड़ी में श्री हरि का ही स्मरण करो और अपनी जिह्वा से सदैव 'हरि हरि' बोलो। प्रत्येक प्रकार से श्री हरि के ही बनकर रखो। इसी में ही जीवन की परम सार्थकता है।

  2. अब तौ प्रभु तारै बनै नातर होत कुतार- श्री रसनिधि

    हे प्रभु (श्री राधा-कृष्ण)! अब तो आपको मेरा उद्धार करना ही होगा, अन्यथा मेरी बड़ी दुर्गति होगी। आप पतित-पावन हैं और आपने ही अनेक अधमों का उद्धार किया है। अब मेरी एकमात्र आशा आपकी अहैतुकी कृपा ही है। वही मेरा आधार है, अन्यथा अपने साधन से कोई आपको कैसे प्राप्त कर सकता है?

  3. चल न सकै निज ठौर तैं जे तन द्रुम अभिराम- श्री रसनिधि

    हे मेघ! जैसे अचल वृक्ष स्वयं चलकर जल ग्रहण नहीं कर सकते, वैसे ही तुम्हारा धर्म है उन तक वर्षा पहुँचाना। उसी प्रकार जब जीव संसार की निरंतर दौड़ से थककर रुक जाए और पूर्ण आत्मसमर्पण कर दे, तब घनश्याम प्रभु स्वयं उसके समीप आकर उसकी रक्षा करते हैं तथा उस पर अपने दिव्य रस की वर्षा करते हैं।

  4. लखि औगुन तन आपनै भूल सबै सुधि जाइ- श्री रसनिधि

    जब मैं अपने दोषों की ओर दृष्टि करता हूँ, तब भय से मेरा मन व्याकुल हो उठता है और मैं अपनी सुध-बुध खो बैठता हूँ। किन्तु हे प्रभु! जब मैं आपकी “पतित-पावन” और “अधम-उधारन” जैसी उपाधियों का स्मरण करता हूँ, तो हृदय में यह गहरा संतोष उत्पन्न होता है कि — ऐसे कृपालु प्रभु मेरा भी उद्धार अवश्य करेंगे।

  5. कैइक स्वाँग बनाइकै नाचौ वहु विधि नाच- श्री रसनिधि

    रसनिधि कहते हैं कि तुम चाहे कितने ही स्वांग बनाकर नाना प्रकार के नाच क्यों न नाच लो, पर जब तक तुम्हारा हृदय सच्चा नहीं हो जाता, तब तक भगवान श्रीकृष्ण तुम पर कभी प्रसन्न नहीं होंगे। भाव यह है कि मनुष्य चाहे भगवा कपड़े पहने, चाहे सिर मुंडाए, चाहे जटा बढ़ाए—इन बाहरी आडंबरों से भगवद्प्राप्ति नहीं होती। वे तो केवल छल-कपट त्यागकर हृदय से प्रेमपूर्वक भजन करने वाले को ही प्राप्त होते हैं।

  6. जाकौ गति चाहत दियौ लेत अगति तैं राखि- श्री रसनिधि

    जिसको स्वयं भगवान गति देना चाहते हैं, भले ही वह कैसा भी हो, वे उसे हर प्रकार की बुरी दशा से बचा कर सम्भाल लेते हैं । श्री रसनिधि कहते हैं कि इस बात के सभी भगवान के भक्त एवं भागवत आदि पुराण ग्रंथ गवाह हैं ।

  7. भूले तैं करतार के रागु न आवै रास - श्री रसनिधि

    यदि मनुष्य भजन गाते हुए खड़ताल को भूल जाय तो राग की लय भंग हो जाती है। ठीक उसी प्रकार, यदि मन को उस करतार (भगवान) में न जोड़ा जाए और केवल इन्द्रियाँ ही संलग्न हों, तो वह वास्तविक भक्ति कहलाने योग्य नहीं रहती और न ही उसमें रस प्रकट होता है।

  8. नेत नेत कहि निगम पुनि जाहि सकै नहिं जान - श्री रसनिधि

    जिस ब्रह्म का वेदादि शास्त्र ‘नेति नेति’—‘कहीं आदि-अंत नहीं है’ ऐसा कहकर कुछ भी जानने में असमर्थ हैं, वही पूर्ण परब्रह्म भगवान ब्रज में श्रीकृष्ण के मनोहर रूप में प्रकट हुए हैं।

  9. गंग प्रगट जिहि चरण तैं - श्री रसनिधि

    रसनिधि कहते हैं कि श्री कृष्ण के जिन चरणों से गंगा प्रकट हुई और उसने सारे संसार को पवित्र कर दिया, मैंने भगवान के उन्हीं चरणों का सहारा ले लिया है।

  10. जिन बारे नँदलाल पै, अपने मन धन ल्याइ - श्री रस निधि जी

    जिन भक्तों ने अपना तन, मन और धन श्रीकृष्ण पर पूर्णतः समर्पित कर दिया है, उनकी महिमा अपरंपार है। उनके विषय में कुछ भी वर्णन करना मेरे सामर्थ्य से परे है।

  11. अद्भुत गति यह रसिकनिधि, सरस प्रीत की बात - श्री रस निधि जी

    रसनिधि जी कहते हैं— श्रीकृष्ण की मधुर प्रीति अत्यंत अद्भुत है। सामान्यतः अंधकार काले रंग से बढ़ता है, किंतु यहाँ साँवले श्यामसुंदर का स्मरण होते ही हृदय का अज्ञान-तिमिर नष्ट हो जाता है। यही प्रेम की विलक्षणता है।

  12. रसनिधि मन मधुकर रमहिं, जो चरनांबुज माहिं - श्री रस निधि जी

    रसनिधि कहते हैं कि जिनका मन रूपी भौंरा श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों में रम जाता है, उनके लिए संसारी लोगों के लिए सदा बंद रहने वाला प्रभु का स्वरूप सहज ही खुल जाता है और दृश्यमान संसार बंद हो जाता है।

  13. को अवराधे जोग तुव, रहु रे मधुकर मौन - श्री रस निधि जी

    गोपियाँ कहती हैं — "हे मधुकर (उद्धव)! तुम चुप हो जाओ, तुम्हारे इस योग (निर्गुण उपासना) की आराधना भला यहाँ (प्रेम भूमि ब्रज में) कौन करेगा? जिनके मन श्री कृष्ण के पीतांबर के छोर (पल्लू) से बँध चुके हैं, भला उन मनों को वहाँ से छुड़ाकर कौन कहीं और लगा सकता है?"

  14. रोम रोम जो अघ भर्यो पतितन में सिरनाम - श्री रसनिधि जी

    हे प्रभु! मेरे रोम-रोम में पाप भरे हुए हैं; मैं पापियों में शिरोमणि हूँ। रसनिधि कहते हैं, हे प्रभु! ऐसे मुझ पापी का निर्वाह करना तो आपका ही काम है।