किशोरी मेरी हरो विरह की - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)
हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।
श्री रूप माधुरी जी की वाणी शुक संप्रदाय के वृंदावन के रसिक संत श्री रूप माधुरी शरण जी द्वारा लिखित ग्रंथ है।
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हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।
गोरे अंगों वाली श्रीराधिका अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय का हार हैं। वे सबके मन को मोहने वाले (मनमोहन) श्रीकृष्ण के मन को भी मोहने वाली हैं तथा अत्यंत कृपालु और परम उदार हैं।
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।
‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।
श्री रूपमाधुरी जी प्रार्थना करते हैं कि जो सदैव रस-विलास में निमग्न रहती हैं और जिनकी अनुपम छवि प्रत्येक क्षण नवीन एवं अद्भुत प्रतीत होती है, ऐसी श्री राधाजू का वह परम विलक्षण स्वरूप उनके हृदय में सदा के लिए निवास करे।
श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं।
राधेकृष्ण का नाम निरन्तर बोलो। संसार के व्यर्थ वाद-विवाद से मुख मोड़ लो और हरि की चर्चा में अपना मुख खोलो।
कुंजमहल की स्वामिनी, सबकी अधीश्वरी और साहिबनी, सबमें श्रेष्ठ शिरोमणि श्री राधा हैं। वे आनंद की मूल स्रोत हैं, अत्यन्त कोमल हृदय वाली और सदा दीन-दुखियों पर कृपा करने वाली हैं।
हे श्यामा जू, मुझे केवल आपके श्री चरण-कमलों का ही आसरा है। इसी कारण अब मैं निश्चिन्त हूँ, जन्म-मरण का अब कोई भय नहीं।
हे साधकों! यह विचार मैंने मन ही मन बहुत बारीकी से परखा है — जिसने भी भगवान से कुछ माँगा है, उसमें बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। जिसका चित्त श्री हरि के प्रेम में वास्तविक रंगा होता है, उसे विषय-भोग तुच्छ लगते हैं।
यदि कोई “श्री राधा” नाम का सतत जप करने का नियम दृढ़ता से धारण कर ले, तो शीघ्र ही उसके हृदय में श्री राधा का दिव्य रूप प्रकाशित होने लगे और नेत्रों में प्रेम झलकने लगे ।
मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो।
अब मेरी सुरत (चेतना) रस में रम गई है । राधा-कृष्ण की युगल छवि मेरे नेत्रों में समा गई है और मेरा हृदय उनके प्रेम की डोरी में बँध गया है।
जिन रसिकों के हृदय में प्रिया प्रियतम की अनन्य भक्ति है, ऐसे रसिकों के दर्शन का भरपूर लाभ लेकर मन को तृप्त करना चाहिए।
हे युगल सरकार! आप सब कुछ जानते हैं। कृपया मुझे वृंदावन वास वरदान कीजिए, क्योंकि मेरे हृदय को अब और कुछ भी नहीं भाता है ।
जिसका तन-मन अपने प्राण-जीवन-धन (श्री श्यामा-श्याम) के प्रेम में सदा उन्मत्त रहता है, वही सच्चा (शूरवीर) रसिक है। चाहे वह घर में रहे या वन में, उसका मन सदैव प्रेम में ही मगन रहता है।
मेरी मदन मोहन (श्रीकृष्ण) से एक अंतरंग यारी बन गई है। उनके टेढ़े मुकुट की लटक मेरे हृदय में ऐसे बस गई है कि अब उनके अतिरिक्त मेरी किसी और से लगन ही नहीं रही।
हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।
वास्तविक रसिक वही है जो प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) के प्रेम में निरंतर डूबा रहता है एवं प्रशंसा तथा निंदा, दोनों को समान मान उनसे उदासीन रहता है।