मुकट की छाँह मनोहर कीन्हैं - श्री सहजो बाई
श्री श्यामसुन्दर अपने सुन्दर मुकुट की छाया से शोभायमान होकर निकुञ्ज से बाहर आ रहे हैं और अपनी प्रियतमा श्री राधा (भावती) को साथ लिए हुए हैं।
श्री सहजो बाई, एक रसिक भक्त, शुक संप्रदाय से संबंधित श्री चरण दास की शिष्या थी ।
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श्री श्यामसुन्दर अपने सुन्दर मुकुट की छाया से शोभायमान होकर निकुञ्ज से बाहर आ रहे हैं और अपनी प्रियतमा श्री राधा (भावती) को साथ लिए हुए हैं।
जो मनुष्य संसार में स्वयं को साधु कहलाता है, किंतु उसका आचरण दुष्ट व्यक्तियों के समान होता है, जो निरर्थक वाद-विवाद और कुतर्क में उलझा रहता है, अहंकार से फूला फिरता है तथा बड़ी-बड़ी डींगें हाँकता रहता है, वह वास्तव में साधु नहीं, बल्कि कुतर्की है।
सहजोबाई कहती हैं कि हे मूर्ख! समय बीतता जा रहा है, इसलिए अवसर रहते 'हरि-हरि' नाम का जप कर लो। अपने मन को एकाग्र कर इस बात पर विचार करो कि जो दिन एक बार बीत गए, वे फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे।
जागृत अवस्था में निरंतर प्रभु का स्मरण बना रहे और निद्रा के समय भी उन्हीं की लौ (चिंतन) लगी रहे। सहजो बाई जी कहती हैं कि इस प्रकार भक्ति सदैव बनी रहनी चाहिए, एक क्षण को भी खंडित नहीं होनी चाहिए अर्थात् वह प्रेम का तार कभी किसी परिस्थिति में टूटना नहीं चाहिए।
यह शरीर पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। अतः अपने प्रियतम (परमात्मा) से मिलने का दृढ़ संकल्प कर लेना चाहिए और प्रमाद की नींद में सोए नहीं रहना चाहिए।
भगवान का सुमिरन आठों पहर, अर्थात् प्रत्येक श्वास के साथ निरंतर करते रहना चाहिए, और एक क्षण के लिए भी उन्हें नहीं भूलना चाहिए। चारों वेद, अठारह पुराण तथा समस्त धर्मग्रंथों का यही सार है।
सहजोबाई कहती हैं कि यह संसार अगाध भवसागर के समान है, जिसमें अज्ञान का घना अँधकार बरस रहा है। ऐसे अंधकारमय सागर से केवल नाम-रूपी जहाज ही ऐसा साधन है, जो जीव को सुरक्षित रूप से पार उतार देता है।
हे गुरुदेव! मैं आपका बालक हूँ, और आप मेरी सच्ची माता हैं, जो प्रत्येक क्षण मेरी रक्षा करती हैं।
जो भगवान के प्रेम में दीवाने हो जाते हैं, उनके लिए संसार का दृष्टिकोण बदल जाता है। सहजोबाई कहती हैं — अब उन्हें राजा और रंक में कोई भेद दिखाई नहीं देता, सबमें केवल उनके प्रभु ही व्याप्त दिखाई देते हैं।
सच्चे प्रेमी भक्त के लक्षण बताते हुए सहजो बाई कहती हैं कि कभी वह भक्त प्रेम-भाव में इतना डूब जाता है कि स्तब्ध रह जाता है और उसे बाहर की कोई सुधि नहीं रहती। कभी-कभी वही प्रेम का वेग उसे सहसा गाने के लिए प्रेरित करता है। कभी वह आँखें मूँदकर ध्यान में लीन हो जाता है, और कभी अपनी चेतना में लौटकर बाह्य जगत की सुधि में आ जाता है।
परम प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में रंगा हुआ जीव संसार, शरीर और परमार्थ की स्मृति से परे हो जाता है। उसे न जग की परवाह रहती है, न वैकुंठ/मुक्ति आदि की चाह। उसे अपने शरीर तक की भी सुध नहीं रहती ।
श्रीकृष्ण की लटकती हुई मुकुट की छवि मन को मोह लेती है। नटवर नागर श्रीकृष्ण नृत्य करते हुए इतने सुंदर लग रहे हैं जिससे साक्षात कामदेव भी भी मोहित हो जाए । उनके कुंडल झिलमिला रहे हैं और पलकें चंचलता से फड़क रही हैं।
सुमिरन चुपचाप, छिपा कर मन ही मन करना चाहिये। न जीभ हिलनी चाहिये और न होंठ हिलने चाहिए। सुमिरन इस प्रकार करना चाहिये कि केवल सुमिरन करने वाले को और जिसका सुमिरन किया जा रहा है यानी उस प्रभु को पता हो। संसार को जताने के लिये सुमिरन करना तो अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाना है।
जो जीव प्रभु के प्रेम में उन्मत्त हो जाते हैं, उनके लिए जात-पांत, ऊँच-नीच का भेद मिट जाता है। सहजोबाई कहती हैं—संसार उन्हें बावरा कहता है, परंतु वे लोक और वेद की सीमाओं से परे हो जाते हैं।
जो प्रभु-प्रेम में मतवाले होते हैं, उनकी बातें सांसारिक लोगों को अटपटी और विचित्र लगती हैं। वे पल भर में प्रभु की याद में अश्रु बहाते हैं, तो अगले ही क्षण हँसने लगते हैं।
ऐसा सुमिरन (स्मरण) कीजिए जिससे तुम्हारा ध्यान सदा ही सहजता से बना रहे। जीभ या तालु का उपयोग किए बिना, केवल मन को लगाकर भगवान की प्रेमाभक्ति में लीन हो जाओ।
जो भगवान के प्रेम में दीवाने हो चुके हैं, वे नियम और धर्म की सीमाओं से परे हो जाते हैं। यद्यपि संसार उन पर हँसता है, फिर भी उनका मन सदा आनंद में मग्न रहता है।
हे पतित पावन, श्री लाल बिहारी, श्रीकृष्ण! आप समस्त गुणों से पूर्ण हैं, जबकि मैं केवल दोषों से भरा हुआ हूँ। मैंने आपकी शरण में रहते हुए भी अनगिनत पाप किए हैं।
मनुष्य मरते हुए भी दुःखी एवं जीते हुए भी दुःखी रहता है, सब साधनों से युक्त राजा भी दुखी रहता है। श्री सहजोबाई कहती हैं कि केवल साधु ही सुखी है, जिसने नित्यविहार पा लिया है।
हे परम कृपालु, श्री श्याम श्याम! अब आप अपनी ओर निहारो । मेरे अवगुणों को न देखते हुए आप अपनी प्रतिष्ठा पर विचार कीजिए ।