सिद्धांत के दोहा एवं साखी [रूप सखी]

सिद्धांत के दोहा एवं साखी, ग्रंथ श्री रूप सखी जी की वाणी में श्रीरूप सखी जू द्वारा लिखित सिद्धांत के दोहों का संकलन है। रचैयता: श्री रूप सखी

22 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)

    जो स्वामी हरिदास जी के अनन्य जन हैं, वे युगलवर, श्री श्यामा कुंज बिहारी के नित्य विहार रूपी रस-केलि में ही अपने मन को लगाते हैं तथा युगल किशोर दंपति की रूप-रस माधुरी का नित्य अपने नयनों से पान करते रहते हैं।

  2. रतन-खचित वृदाविपुन भूमि लता-द्रुम रंग - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (22)

    श्रीधाम वृंदावन की दिव्य भूमि रत्नों से जड़ित है, जहाँ रंग-बिरंगी लताएँ और विविध रंगों के वृक्ष सौंदर्य बिखेर रहे हैं। उसी परम पावन भूमि पर श्री स्वामी हरिदास जी के लाड़ले श्यामा-कुंजबिहारी, प्रेम-केलि में उन्मत्त होकर नित्य विहार रस बरसा रहे हैं।

  3. श्री हरिदास अनन्य जै, जिनकै प्रेम प्रधान - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (31)

    जो रसिकजन स्वामी श्री हरिदास जी के पूर्ण रूप से अनुगामी होते हैं, उनकी प्रधानता केवल प्रेम की ही होती है । वे सखीभाव को अंगीकार कर, प्रिया-प्रियतम को नित्य लाड़ लड़ाते हुए, उनकी रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं ।

  4. श्री स्वामी हरिदास के नवल निकुंज बिहार - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (44)

    श्री स्वामी हरिदास जी के परम लाड़िले, नवीन निकुंजों में नित्य विहार करने वाले बांके बिहारी ही सिरमौर हैं। उनकी छवि का छींटा पाकर ही दशावतार प्रकाश पाते हैं।

  5. स्यामा स्याम निकुंज निधि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (37)

    रसिक सिरमौर स्वामी श्री हरिदास जी के लाड़ले ठाकुर-ठकुरानी श्री श्यामा कुंजबिहारी निकुंज की निधि हैं। श्री रूप सखी जी कहते हैं कि उन दोनों की सुंदर छवि मेरे हृदय में सदा समायी हुई है, उनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को नहीं जानता।

  6. श्री हरिदास अनूप अलि रसिक रूप बलिहार - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (47)

    रूप सखी कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी अद्वितीय हैं, मैं उनपर बार बार बलिहार जाता हूँ। वे इक-टक श्यामा कुंजबिहारी के अखंड नित्य विहार को ही अपलक नेत्रों से निहारते रहते हैं।

  7. चरण कमल चित लाई कै गाऊँ गुन सुख-रासि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (52)

    अपने चित्त को श्री प्रिया-प्रियतम के चरण कमलों में लगाकर उनके गुणों का गान करूँ, जो सुखों की राशि हैं। ऐसे आनंद निधि और नित्य कृपा बरसाने वाले श्री चरणों से अपने हृदय को प्रेम रूपी धन से प्रकाशित करूँ।

  8. श्री वृंदावन दंपति, जो चाहै रस रीति - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (49)

    जिसको श्री वृंदावन धाम की नित्य दंपति श्री बिहारी बिहारिनी जू की रस रीति प्राप्त करनी हो उसे श्री स्वामी हरिदास जी के चरणों से प्रेम बढ़ाना चाहिए ।

  9. रतन खचित भुव जगमगति - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (91)

    ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी के आराध्य श्री बिहारी-बिहारिणी जू श्री वृंदावन के निभृत निकुंजों में तमाल और बेलि के समान आलिंगनबद्ध होकर अनवरत केलि करते हैं, जहाँ की भूमि जगमगाते रत्नों से जटित है।

  10. भजन न कीनों मैं कछू, जानत नाहिन जोग - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (91)

    न तो मैंने कोई भजन किया है और न ही मुझे योग आदि का ज्ञान है । मुझे तो केवल रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी की अहैतुकी कृपा का ही बल है, जिसके प्रभाव से मैंने सहज ही नित्य-विहार-रस का आस्वादन कर लिया है।

  11. श्री स्वामी हरिदास की, सरिवर रसिक न और - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (36)

    अनन्य नृपति रसिक-शेखर ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी समस्त रसिकों के सिरमौर हैं, जिनकी समानता किसी भी रसिक से की नहीं जा सकती, क्योंकि वे समस्त रसों के मुकुटमणि रस प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस का ही अखंड रूप से अवलोकन करते हैं।

  12. स्वामी बिना बिहार नहि, साधन करो अनेक - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (56)

    ललिता-अवतार, रसिक अनन्य नृपति, श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा के बिना श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार की प्राप्ति असंभव है, चाहे कोई असंख्य साधन क्यों न कर ले। जैसे धान के बिना भूसी कूटने से कुछ नहीं मिलता, वैसे ही उनकी कृपा बिना साधना निष्फल है।

  13. जाँचें और न देव कौ, नहीं तीरथ वृत आस - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (61)

    वृन्दावन के एकांत निकुञ्जों में नित्य-विहार करने वाले श्री बिहारी-बिहारिन के सिवा हमारा न तो किसी अन्य देवता से कोई संबंध है और न किसी तीर्थ-व्रत आदि में कोई आश्रय। हम तो पूर्णतः स्वामी हरिदास जी के महल के आश्रित हैं और उनके चरण-कमलों में ही अपना अटल और अनन्य विश्वास रखते हैं।

  14. श्री स्वामी जू के सरन नित, रूपसखी विश्राम - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (8)

    मैं सदा ललिता-अवतार श्री स्वामी हरिदास जू की शरण में रहकर श्री वृन्दावन धाम में श्री श्यामा-श्याम की दिव्य जुगल-केलि का निरंतर दर्शन करता रहूँ—यही मेरी अभिलाषा है।

  15. श्री वृंदावन बास वर, दियो न अनतहि जांउ - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (73)

    हे प्रभु! मुझे श्री वृंदावन का वास जो सर्वोपरि है उसे प्रदान कीजिए, जिसे पाकर मैं अन्यत्र कहीं न जाऊं। रसिक शिरोमणि ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी महाराज जी की कृपा से मैं श्यामा-कुंजबिहारी का निरंतर 'नित्य-विहार' का ही गुणगान करता रहूँ।

  16. नित्य विहार अखंड है - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (78)

    श्री स्वामी हरिदास जी की उपासना में प्रिया-प्रियतम का अखंड नित्य-विहार ही प्रधान उपास्य तत्त्व है और वही उनका निज धर्म है। जहाँ अवतार-कथा का प्रवेश हो जाता है, उसे इस उपासना से भिन्न मार्ग मानना चाहिए, क्योंकि वहाँ नित्य-विहार खंडित हो जाता है।

  17. मेरी स्वामिनी लाड़िली, लाड़ लड़ाऊँ भाई - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (60)

    अरे भाई, मेरी आराध्या, मेरी सर्वस्व स्वामिनी तो एकमात्र श्री राधा महारानी जू ही हैं, और उन्हीं को मैं नित्य लाड़ लड़ाता हूँ। न मैं किसी अन्य के गुण जानता हूँ और न दोष; मेरा संग केवल रसिक-अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी से है।

  18. श्री स्वामी हरिदास को - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (4)

    जो जन अनन्य रूप से ललिता-अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के सच्चे भाव से अनुगत होता है, वह सखी-भाव को प्राप्त होकर सदा श्री श्यामा-श्याम के अद्भुत नित्य-विहार का दर्शन करता रहता है।