श्री वागीश शास्त्रीजी

ब्रज के रसिक भक्त श्री वागीश शास्त्री जी

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  1. राधाधीनः सदा ब्रूते पश्यत्यथ - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.44)

    श्री कृष्ण सदा श्रीराधा के अधीन होकर ही बोलते, देखते और सुनते हैं। श्रीराधा के अधीन होकर ही हँसते, गाते और नाचते हैं अर्थात् उनकी प्रत्येक क्रिया श्री राधा के वशीभूत ही है।

  2. अन्तरायान् रसास्वादे-दोषान् - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (4)

    श्री राधा अपनी अहैतुकी कृपा से भक्तों के रसास्वादन (दिव्य प्रेम-रस) में आने वाली बाधाओं तथा काम, क्रोध आदि दोषों सहित समस्त पापों का समूल नाश कर देती हैं; इसलिए उन्हें “राधा” कहा जाता है।

  3. यस्याः स्ववशगः कृष्णो - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.104)

    रसस्वरूप श्रीकृष्ण सदा श्रीराधारानी के अधीन रहकर उनके रस की वृद्धि करते रहते हैं, उनके नेत्रों के कटाक्ष और भृकुटि-विलास के अनुसार (भौंहों के संकेत पर) सदा कठपुतली की भाँति नृत्य करते हैं।

  4. पुज्यं तच्चरणं ब्रजेन्द्रविपिनं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.44)

    वे चरण परम पूज्य हैं, जो श्रीव्रजेन्द्रनन्दन के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन की यात्रा करते हैं। वह रसना धन्य है, जो इस रसमन्दिर वृन्दावन की स्तुति करती है। वह हृदय परम पवित्र है, जो इस परम मनोरम विपिन का सदा चिन्तन करता है। तथा जो मनुष्य श्रीवृन्दावन में निवास करता है, वह तो ब्रह्मा और शिव आदि के लिए भी सम्माननीय है।

  5. तादत्ते्ऽर्पितवस्तूनि राधासंकेतमन्तरा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.45)

    श्रीकृष्ण को अर्पित की गई वस्तुओं को भी वे श्री राधा के संकेत के बिना स्वीकार नहीं करते। श्री राधा के बिना केवल श्रीकृष्ण की आराधना को दोषकारक माना गया है।

  6. वृद्धयर्थात् राधधातोश्व राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (5)

    ‘राधा’ शब्द ‘राध्’ धातु से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है वृद्धि करना या उन्नति देना। इसी कारण भक्तजन श्रीराधा को ब्रह्म से भी अधिक गुण सम्पन्न मानते हैं। श्रीराधा स्वयं वर्धमान रहती हुई अपने भक्तों के भी भाव (रस) आदि की वृद्धि सदा करती रहती हैं ।

  7. वृन्दावनं तद्गतवस्तुजातं सर्व नमस्यं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.54)

    श्रीवृन्दावन और उसकी समस्त वस्तुएँ नमस्कार करने योग्य हैं। उनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये । जो निन्दा करते हैं, उन अपराधियोंका संग मुझे स्वप्न में भी प्राप्त न हो ।

  8. वृन्दारण्यलतागृहेषु वसतां गोविन्दलीलासुधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.65)

    जो श्रीवृन्दावनके लता-गृहों में निवास करते हैं, श्रीगोविन्दकी लीलासुधाको पान करके अविरल अश्रु बहाते रहते हैं, (निरन्तर) प्रेम से सुमधुर श्रीराधा-नाम का गान करते हैं, अधखुले नेत्रों से श्रीवृन्दावन की गलियों में विचरते है तथा जिनको अपने शरीरकी किंचिन्मात्र भी सुध नहीं है, अतएव जो कभी लड़खड़ाते हैं, कभी भावावेश में गिर भी जाते हैं ऐसे (प्रेमोन्मत्त) महात्माओंका जो जीवन हैं, वही वास्तव में धन्य जीवन है !

  9. रसस्वरूपः श्रीकृष्णः रसिकस्तु - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (6)

    श्रुतियों ने भगवान् को रस स्वरूप आनन्द स्वरूप बताया है, रस का भोक्ता नहीं बताया। रसभोक्ता रसिक तो उनको श्रीराधा ने बनाया है। भागवत में श्रीशुकदेवजी ने कहा है कि श्रीकृष्ण तो आत्मरत और आत्माराम हैं, उनको रमण तो राधा ने कराया है। "तया" यह हेतु के अर्थ में तृतीया विभक्ति है - ऐसा विद्वानों का मत है। भक्तों को भी प्रेमदान करके उनको रसिक (रसभोगी) राधा ही बनाती हैं ।

  10. रे चित्त मा त्यज वनं वृषभानुजाया - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.61)

    हे चित्त ! तुझसे मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि तू श्रीवृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) के इस श्रीवृन्दावन धाम को कभी न छोड़ना। यदि तुझे ब्राह्मण से लेकर श्वपच पर्यन्त के घर सदैव भिक्षा माँगनी पड़े तो माँग लेना और उनके उच्छिष्ट को भी खा लेना; परंतु श्रीवृन्दावन से बाहर अन्य स्थान मे कदापि न जाना ।

  11. रादाने धारणे धा च इति धातुद्वयादपि - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (10)

    ‘रा’ दानार्थक (दान करने की धातु) और ‘धा’ धारणार्थक (धारण करने अथवा रक्षा करने की धातु)—इन दोनों धातुओं से ‘राधा’ नाम की उत्पत्ति मानी जाती है। यह तथ्य भक्तों में श्रेष्ठ जनों को अवश्य जानना चाहिए।

  12. रे चित्त चिन्तय चिरं वृषभानुपुत्रिं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.67)

    अरे मेरे चित्त! तू सदा श्री वृषभानु नंदिनी श्रीराधा का ही चिन्तन किया कर — उन्हें एक क्षण के लिए भी कभी न भूलना, यही मेरी अभिलाषा है। हे रसने! तू ‘राधा’ — इस सरस, मधुर नाम का जप निरंतर करती रह तथा हे देह ! तू श्रीराधा की परम पावन चरण-रज से लिप्त होकर, इस रसरूपा श्री वृंदावन में सदाकाल प्रेमपूर्वक निवास कर।

  13. निरञ्जनं निर्गुणमद्वितीयं वदन्ति - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.63)

    विद्वान् लोग परम तत्त्वको निरञ्जन, निर्गुण और अद्वितीय बताया करते है; उनके लिये वह तत्त्व वैसा ही हो। परंतु मैंने तो अपने लिये श्रीवृन्दावनको ही परम तत्त्व निश्चित किया है; क्योंकि उसका श्रीअंग श्रीराधा के श्रीचरण-चिह्नोंसे भूषित है ।

  14. न विषय भोगो भाग्यं कीर्तिर्वा विस्तृता लोके - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.62)

    विषय-भोगों का बहुलता से सुलभ होना सौभाग्य नहीं है, संसार में कीर्ति का विस्तार हो जाए—यह भी सौभाग्य नहीं है। असली सौभाग्य है श्रीवृन्दावन वास प्राप्त हो जाए, जिसकी ब्रह्मा-इन्द्र आदि भी अभिलाषा करते हैं ।

  15. अदेयं चापि या दत्ते-दत्वा रक्षां करोति या - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (11)

    श्री राधा अपने भक्त (नाम-आराधक) को अदेय वस्तु भी दे देती हैं और उस वस्तु की रक्षा भी करती हैं । राधा योगक्षेम करने वाली हैं, भक्तों को ऐसा अनुभव भी होता है ।

  16. अर्धोन्मीलितलोचनस्य पिबतो राधेति नामामृतम् - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.35)

    अधखुली आँखों से देखता, ‘श्रीराधे! श्रीराधे!!’ इस नाम-अमृत का पान करता, नेत्रों से प्रेम के आँसू बहाता, सारे अंगों से पुलकित होता, कहीं लड़खड़ाता, कहीं गिरता और पड़ता हुआ मैं (देह की सुध-बुध खोकर) श्रीवृंदावन की गलियों में स्वच्छंद विचरूँ और इसी अवस्था में मेरे परम सुखदायक दिन व्यतीत हों—ऐसा शुभ समय कब आएगा?

  17. तेनापि सहसा प्रोक्तं तत्र वासेऽतिदुष्कर - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.21)

    श्री वृंदावन में वास करना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि धाम में रहने पर जो धाम अथवा धाम वासियों में दोष देखने लगते हैं वे पतित हो जाते हैं।

  18. राधा साध्यं साधनं यस्य राधा मन्त्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (20)

    जिस जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही जिसका जीवन है। वाणी में भी जिसके राधा नाम है, ऐसे परम भाग्यशाली जीव के लिए कोई भी पुरुषार्थ शेष नहीं रहता ।

  19. योऽभूद् व्रजस्योज्ज्वलकामकेल्या - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.33)

    हे श्रीवनराज (श्री वृंदावन)! तुम्हारी रसरंगमयी भूमि में जो ब्रज की उज्जवल कामकेली का रास-रसोत्सव हुआ था, उस रस को श्री राधा और श्री कृष्ण तुम्हारे बिना (वृंदावन के अभाव में) कुरुक्षेत्र में परस्पर मिलकर भी नहीं पा सके। (अर्थात् हे वृंदावन, इस रस के तो एक मात्र तुम्हीं अधिष्ठान हो)

  20. विष्णुश्चक्रधरः प्रयाति पुरतः - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (1)

    जो व्यक्ति मार्ग में गमन करते हुए केवल ‘राधा’ नाम का स्वच्छन्द उच्चारण करता है उसका बहुमान करते हुए आगे-आगे चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान, पीछे पीछे शूलधारी श्रीशिवजी, वाम भाग में पाशहस्त श्रीवरुणदेव और दक्षिणभाग में वज्रधारी इन्द्रदेव चलते हैं, तथा अप्सरायें आगे-आगे नृत्य करती हैं और देवाङ्गनायें कल्पवृक्ष के फूलों की वर्षा हर्ष से करती हैं।