विनय [श्री ललित किशोरी]

विनय श्री ललित किशोरी द्वारा रचित अभिलाष माधुरी का एक भाग है जिसमें बहुत सुंदर प्रार्थना एवं विनती के पद हैं । रचैयता: श्री ललित किशोरी

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  1. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  2. राधेराधे नामकी जकलागै ये वीर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)

    हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।

  3. वौरी ह्वै मग डोलिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)

    हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।

  4. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  5. कालीदह कूल कुंजके माहीं - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (28)

    मेरी यही अभिलाषा है कि मैं कालीदह के तट पर स्थित कुंजों में एक भ्रमरी बनकर वृक्षों की डालियों पर निवास करूँ अथवा निधिवन का तोता या कोयल बन जाऊँ और मधुर स्वर में निरंतर 'राधा' नाम का ही गान करूँ।

  6. कवधौं कृपा लाड़िली ह्वै है - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (124)

    प्यारी श्री लाड़िलीजू (श्री राधा) की मुझ पर कब कृपा होगी, कि मैं भी सदा के लिए श्री वृन्दावन में वास करूँगा? कब मैं इन आँखों से श्यामाश्याम की उस अनुपम अथवा परम सुंदर छवि के दर्शन कर सकूँगा?

  7. राधा नाम सों चित रांच - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (202)

    अपने मन को श्री राधा-नाम में पूर्णतः रमा दो। अपने भीतर के कागज़ (अंतःकरण) पर निर्मल और प्रेमपूर्ण रुचि के साथ राधा-नाम की रेखाएँ अंकित कर दो।

  8. ऐसी को करिहै श्रीराधा - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (292)

    हे श्रीराधे! इस पूरे ब्रह्मांड में ऐसी परम कृपालुता से युक्त कौन हो सकता है, जो अपने नाम के केवल ‘रा’ अक्षर के उच्चारण मात्र से अपनी शरणागत दासी के हृदय का अंधकार मिटा दे।

  9. जमुना-पुलिन कुंज गहबर की - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)

    ऐसा कब होगा कि मैं यमुना-तट के किसी एकांत कुंज में किसी वृक्ष पर कोयल बनकर कूकूं, अथवा श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों का भौंरा बनकर मधुर-मधुर गुंजार उन्हें सुनाऊं।

  10. प्यारीजू कौन तिहारी खोट - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (68)

    हे प्यारीजू (राधे)! आपमें कोई भी दोष नहीं है (अर्थात् आपकी कृपा में कोई कमी नहीं है)। दोष तो मुझमें ही है, क्योंकि मैं तो अवगुणों की मोट (गठरी) हूँ।

  11. हेस्वामिनि श्रीकुंजविहारिनि - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (122)

    हे स्वामिनी, श्री कुंज विहारिणी (श्री राधा)! कृपा करके शीघ्र मेरी सुध लें। मुझे सेवा की रीति कुछ भी नहीं आती, मेरी भूल को क्षमा कर दें।

  12. श्यामा पग लवलीन हो, उन्हीं के हाथ विकाय - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (236.2)

    श्रीकृष्ण स्वयं को केवल उन्हीं के हाथों में बेचते हैं जो श्रीराधा के चरणों की भक्ति में स्वयं को पूर्णतः तल्लीन कर देते हैं। ऐसे प्रेमी भक्तों के हाथों में श्रीकृष्ण प्रेमवश बिना मोल के बिक जाते हैं।

  13. स्वामिनि हौं पतितन शिरताज - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81)

    हे स्वामिनी, मैं पतितों में सिरताज हूँ। इस जगत में मैं तुम्हारी कहलाती हूँ, परंतु फिर भी विमुखों की भाँति इधर-उधर भटक रही हूँ और कोई लज्जा तक नहीं आती।

  14. कवधौं सेवाकुंज में ह्वैंहों श्यामतमाल - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (56)

    मैं श्री वृंदावन के सेवा कुंज में कब ऐसा श्याम तमाल वृक्ष बन जाऊँगा, जिसकी लताओं को पकड़कर युगल सरकार श्री श्यामा-श्याम प्रेम भरी लीलाएँ करते हुए विश्राम करेंगे?

  15. श्रीराधारानी श्रीवन दृग दरसावौ - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (15)

    हे श्री राधारानी! कृपा करके मुझे श्रीवृन्दावनधाम का दर्शन प्रदान करें जिससे मैं आपके चरणचिह्नों से चिन्हित वृंदावन की रज को अपने समस्त अंगों से स्पर्श करा सकूँ ।

  16. येहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (84)

    हे मेरी स्वामिनी (श्री राधा), हे गजगामिनी (मस्त हाथी के समान चाल वाली), हे मन को मोहित करने वाली, श्री राधे! प्रियतम रसिक लाल श्री कृष्ण केवल आपके ही हैं और आपके वचनों को ही मानते हैं।

  17. मिलिहै कब अंग छार ह्वै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (74)

    ऐसा कब होगा कि मेरा यह शरीर श्री वृंदावन धाम की परम पावन रज में विलीन हो जाएगा, जिससे मेरे जीवन के आधार, श्री युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) के चरण-कमल मुझ पर पड़ेंगे?

  18. मेरे मन सब भाँति बिगारी - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (1)

    मेरे मन ने हर किसी से सब भाँति बिगाड़ ली है। वेदों एवं शास्त्रों की मर्यादा तथा लोक-लाज, कुल आदि की मर्यादाओं से मुख मोड़कर, उसे अपने ह्रदय से सदा-सदा के लिए निकाल कर फैंक दिया है।