23 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (961)

    वृषभानु की लाड़ली श्री राधा बसंत ऋतु में क्रीड़ा कर रही हैं, जहाँ उनके नवल प्रियतम श्यामसुन्दर भी विराजमान हैं। सखियाँ हर्ष से खिल उठी हैं। मृदंग, ताल और नगाड़े आदि वाद्य बज रहे हैं, और सुख की खान श्री राधा महारानी क्रीड़ा के लिए महल से बाहर पधारी हैं।

  2. कीरति कें कन्या भई - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (19)

    महारानी कीरति को एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ है, जिनके दर्शन के लिए व्रज के समस्त गोप-गोपीजन उमड़े हुए हैं। सभी हर्ष में नाच रहे हैं, कूद रहे हैं, मंगल गीत गा रहे हैं, और दही-माखन आदि लुटा रहे हैं।

  3. अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, प्रेम पचासा (42)

    हे सखी, अब तो मैं ब्रज मंडल में बदनाम हो चुकी हूँ। गुरुजनों की लज्जा आदि खो चुकी हूँ, अब चाहे वे मुझसे नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे कोई परवाह नहीं।

  4. चंद की कलासी, नवलासी सखी संगबारी - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (48)

    चन्द्र के समान, नवल सखियों के संग सुसज्जित श्री राधिका की छवि अद्वितीय है। स्वर्ग की अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी, पार्वती देवी एवं अन्य ऐसी कौन सी देवी है जिसकी उपमा श्री राधा से की जाए (अर्थात् उनके समक्ष सबकी छवि फीकी दिखती है)।

  5. प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (121)

    श्री प्रिया जू (श्री राधा) की चितवन सहज में ही प्रेम प्रदान करने वाली है । एक नयन कटाक्ष ही चित्त को हर लेता है, प्राणों में आनंद का संचार करता है एवं उसमे विभिन्न रंग भर देता है, जिससे सखियाँ अपनी देह की सुधि भूल जाती हैं ।

  6. कुंज की कुटीर दोऊ आली री उमंग भरे - श्री रामसखी जी, श्री भक्तिरस मंजरी

    अरी सखी, श्री वृन्दावन के कुञ्ज कुटीर में दोनों युगल किशोर श्री श्यामाश्याम उमंग से भरे हुए मधुर गान कर रहे हैं एवं सखियाँ उन्हें मंद गति से झूला झूला रही है।

  7. सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (29)

    आज मार्ग में मैंने देखा की श्री राधा कृष्ण कुञ्ज से आ रहे हैं, जिनकी छबि अति सुन्दर एवं अनुपम है, जो मेरे ह्रदय को बहुत भाति है ।

  8. कृष्ण नाम जबतें श्रवण सुन्यो री आली - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (54)

    श्री नंददास जी एक सखी रूप से अन्य सखी से कहते हैं कि - हे सखि ! जब से कानो में कृष्ण का नाम सुना है , तब से मैं अपना घर संसार भूल, बाँवरी बन गयी हूँ ।

  9. श्याम सों नेह कबहु न कीजै - श्री चतुर्भुज दास जी

    श्याम सुंदर से कभी नेह मत करना क्यूँकि उनका मन और शरीर दोनों ही काले हैं। वह मन मोहक एवं सलोने हैं, यदि आपने उनसे प्रीति की तो वह तुम्हारा सब कुछ ले लेंगे ।

  10. श्री नंददास जी की जीवनी

    श्रीनन्ददासजी आनन्दनिधि रसिक प्रभु के प्रेम में मिले हुए थे; श्री युगल लीला रसरीति पद ग्रन्थ की रचना में बड़े प्रवीण हुए; तथा भक्तिरसयुक्त सरस उक्ति युक्ति कथन और गान में अति उजागर थे।

  11. प्रेमपूरि पूरित प्रतेक नेत्र भंगिनीम - श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (4)

    आपकी प्रत्येक आँखें प्रेम रूप की पूर्णता से चंचल हैं। आपका ह्रदय सदैव नंदनंदन श्री कृष्ण संग के प्रेम के रंग से रंगा हुआ है। आप अति प्रवीणता से अपने समस्त सखी समूह पर शासन करतीं हैं।

  12. आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (10)

    आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है।