मन में बसी बस चाह यही - ब्रज के सवैया
हे राधा कृष्ण! अब मेरे मन में बस यही चाह है कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन रूपी मंदिर में तुमको बिठलाकर, तुम्हारा मनमोहक रूप निहारा करूँ ।
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हे राधा कृष्ण! अब मेरे मन में बस यही चाह है कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन रूपी मंदिर में तुमको बिठलाकर, तुम्हारा मनमोहक रूप निहारा करूँ ।
कोई छत्र लेकर खड़ी है, कोई दर्पण लेकर खड़ी है, कोई वीणा लेकर मधुर संगीत गा रही है।
श्री राधिका-माधव की शोभा बड़ी ही अद्भुत एवं अलौकिक है। सखियाँ प्रेमपूर्वक उनका श्रृंगार कर आरती कर रही हैं।
मैं बृषभानु की लाड़िली पुत्री, बरसाने वारी राधे की आरती करता हूँ। राधा रानी दिव्य धाम वृंदावन में रत्न जड़ित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं।
प्रभु की आरती करनी हो तो ऐसी करो, हृदय-रूपी स्थिर और विशाल थाल सजाकर, उसमें प्रेम-रूपी दीपक को प्रज्ज्वलित कर रख दो।
श्री ललिता आदि सखियाँ मनोहारिणी कुँवरि श्री राधा की आरती कर रही हैं, जिनके रूप-सौंदर्य की आभा करोड़ों सूर्य के समान उज्ज्वल है।
गो. श्रीराधालाल जी का जन्म 1885 की आश्विन बदी तृतीया के दिन वृन्दावन में हुआ था। इनके पिता गो. श्रीगोवर्द्धनलाल जी श्रीराधावल्लभ मन्दिर के रासवंशीय सेवाधिकारी थे।
माध्वगौड़ेश्वराचार्य परम सन्त पूज्य पाद गोस्वामी श्री गल्लू जी महाराज के पिता का नाम श्रीरमण दयालजी महाराज था । श्री गल्लू जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी सन् 1827 में हुआ था । इनके एकमात्र पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी जी हुये । श्रीराधाचरण जी की माँ का नाम श्रीमती सूर्यादेवी गोस्वामी था ।
हे प्राणनाथ, हे ब्रजनाथ, हे नंदनंदन श्रीकृष्ण! मेरे हृदय की पीड़ा को हर लीजिए। मैं भवसागर में डूब रहा हूँ—दौड़कर मुझे अपनी करुणामयी भुजाओं में भरकर सदा के लिए अपना बना लीजिए।
श्री परमानंददास जी ब्रज के रसिक संत थे और पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में से एक थे । श्री परमानंद दास जी अपने द्वारा रचित छंदों का बड़े मधुर राग में गान और कीर्तन करते थे ।
कल्याण पुजारी जी दृढ व्रत धारण करनेवाले भक्त हैं जो नवल किशोर श्री श्यामाश्याम के अनन्य रस-उपासक हैं । इनके मुख से मधुर वाणी निकलती थी जो सबके मन का हरण कर लेती थी एवं सुख देनेवाली थी ।
प्रातः काल में ही श्री जुगल किशोर की मंगल आरती कीजिये जिनके अंग रूप एवं रस से छके हुए हैं । ऐसी अद्भुत छवि को अपने नेत्रों में सदा के लिए भर लीजिये ।
मदनगोपाल की आरती करनी चाहिये। देवऋषि नारद, वेदव्यास एवं शुकदेवजी जब विश्वास पूर्वक इस बात को कहते हैं तब (मदनगोपाल की आरती करके) बिना श्रम के रससिन्धु का पान क्यों नहीं करते?
श्री प्रियाकान्त जू मंदिर श्री राधा कृष्ण को समर्पित है जिसे 2009 में विश्व शांति चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री देवकीनंदन ठाकुर द्वारा स्थापित किया गया था, और इसे पूरा होने में लगभग सात साल लगे ।
राधावल्लभ संप्रदाय के गोस्वामी श्री हित रूपलाल जी ने अपने सहचरी वपु से श्री श्यामा श्याम की एक लीला का दर्शन किया, जिसे वे स्वयं वर्णन कर रहे हैं
श्री गोपालदास जी "लघु सखी" राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षित एक परम भक्त थे। इनका जन्म पंजाब में 1940 के आसपास अनुमानित होता है।
श्री वनचन्द्र गोस्वामी जी श्री हित हरिवंश महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र थे। इनका जन्म चैत्र कृष्ण छठ 1528 में देववन में हुआ था।
श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी महाराज अखिल भारतीय जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठ (सलेमाबाद, किशनगढ़) के एक सुप्रतिष्ठित आचार्य थे। इनकी विद्वत्ता और भक्ति भावना इनकी वाणी के अनुशीलन से स्पष्ट हो सकती है।
श्री युगल किशोर श्यामा श्याम की आरती कीजिए एवं संध्या, दोपहर एवं भोर में नख से सिख तक अंगों की पुनः पुनः बलैया लीजिए ।
श्री चतुर्भुजदास जी का जन्म 1597 में ब्रज के जमुनावता ग्राम में हुआ था। इनके पिता अष्टछाप के महान कवी श्री कुम्भनदास जी थे।