65 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. प्रिया बदन बिधु तन लखे - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (68)

    श्री प्रिया जी के मुख-रूपी चंद्रमा की ओर प्रियतम श्री कृष्ण के नेत्र चकोर के समान निरंतर एकटक निहारते रहते हैं। श्री राधा के अगाध सौंदर्य-रूपी मदिरा का निरंतर पान करके नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा छके रहते हैं।

  2. आरति कीजै सुंदरवर की - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (39)

    इन परम सुंदर युगल किशोर की आरती कीजिए। ये नवीन रसिक युगल, निकुंज के दो युगल चंद्रमाओं के समान हैं, जो भक्तों के हृदय के समस्त दुखों और अज्ञान रूपी अंधकार को हर लेने वाले हैं।

  3. आज सखि वन की सोभा देखि - श्री ठाकुर दास जी

    एक सखी दूसरी सखी से कहती है—"हे सखि! आज श्री वृन्दावन के वन की अनुपम शोभा तो देखो! श्री यमुना जी के पावन जल में निर्मल कमल के फूल अत्यंत खिले हुए हैं, जिनकी छटा देखते ही बनती है।"

  4. आजु बधाई वृंदावन सुख-सिंधु हिलोर - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (62)

    आज इस दिव्य वृन्दावन में बधाई है, जहाँ सुख का सागर निरंतर तरंगायित हो रहा है। प्रिया-लाल अपने तन और मन से उल्लासित हो रहे हैं, और कामदेव-रूपी मेघ गंभीर स्वर में गर्जना कर रहे हैं।

  5. प्यारी नख चन्दन कौं कीजिये चकोर मन - श्री प्रेम दास जी की वाणी (93)

    ऐसी कृपा हो कि मेरा मन प्यारीजू (श्री राधा) के नख-चंद्रिका में चकोर बन जाए, या मुझे राधेजू के मधुर यश का निरंतर गान करने वाली कोयल बनने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए।

  6. श्री राधावल्लभ लाड़िलो दुल्ह नित्य किशोर - ब्रज के दोहे

    लाड़िले श्री राधावल्लभ लाल नित्य किशोर दूल्हा हैं। वे कुंज बिहारी, श्री राधा प्यारी के मुख चंद्र को चकोर की भाँति अपलक नेत्रों से सदा निहारते रहते हैं।

  7. ललितमाधुरी लाल कब चरनन विसमृत परों - श्री ललित माधुरी

    हे युगल सरकार, श्री श्यामा-श्याम! कब मैं सब कुछ भुलाकर आपके चरणों में विश्राम करूँगा? कब मेरी चकोर जैसी आँखें आपके मनमोहक एवं रसाल नखचन्द्रों पर स्थिर होंगी?

  8. श्रीराधा रूप-लावण्य की वन्या - श्री ललित विहारिणी जी

    श्री राधा रूप एवं सौंदर्य की सदा प्रवाहित होने वाली नदी के समान हैं। वे सुंदर, सुकोमल, स्वर्ण के समान कांति वाली गोरी हैं जो श्री कृष्ण की प्रियतमा तथा कीर्ति जी की पुत्री हैं। [1]

  9. श्रीवृन्दावन सहज समाज - श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (2)

    अरी सखी, श्रीधाम वृन्दावन की स्वाभाविक शोभा-सम्पत्ति भी बड़ी मनोहारी है। यह नित्य है, इसका त्रिकाल में कभी विनाश नहीं होता। यह समस्त मायिक दोषों से रहित है और इसी भूतल पर सुशोभित हो रहा है। मणिमाणिक्यों से रचित खचित यहाँ की भूमि बड़ी सुन्दर है।

  10. जे जन रसिक चकोर, मीन चातक व्रत धारी - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (196)

    इस रस मार्ग में चलने के अधिकारी केवल वे रसिक जन हैं जो चकोर, मीन एवं चातक के समान अनन्य व्रत को धारण करते हैं । अनन्यता से विहीन अन्य जीव इस रस मार्ग के अधिकारी नहीं हैं।

  11. नेहिन की गति जानत भाखी - श्री किशोरी अलि जी, अष्टयाम प्रथम (36)

    प्रेमियों की गति प्रेमी ही जानते हैं। जैसे गंगा जी में रहने वाला पपीहा पक्षी भी साक्षात गंगा जी के पानी को छोड़कर स्वाति बूँद की ओर ही निहारता है।

  12. श्री चतुरदासजी की जीवनी

    श्री चतुरदासजी का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में किसी मथुरिया चतुर्वेदी परिवार में भाद्र शुक्ल 6, 1753 को हुआ था।

  13. ललित लता मन्दिर के आंगन - श्री रामराय जी, आदिवाणी (10)

    प्रातः काल के समय श्री राधा कृष्ण सुन्दर लता मंदिर के आंगन में विराजमान हैं। श्री प्रिया जी श्री कृष्ण की पीताम्बरी ओढ़े हुए हैं एवं श्री कृष्ण श्री प्रिया जी की नीली साड़ी ओढ़े हुए हैं।

  14. बार बार रीझि रीझि कहत विहारीलाल - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (287)

    श्री कृष्ण, प्रेम में उन्मत्त होकर, बार बार श्री प्रियाजी जी [श्री राधा] से कहते हैं कि हे प्यारी जू! वंशीवट की अद्भुत शोभा को निहारिये!