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  1. परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)

    जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।

  2. जब परसे प्यारी-चरन परम-प्रीति - श्री सूरदास, सूर सागर (3446.36)

    जब परम स्नेही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने अत्यधिक प्रेम के साथ अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह का सारा दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।

  3. छिन छिन परसत चरणकर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

    श्री कृष्ण क्षण-क्षण में श्री राधा के श्री चरणों को अपने हाथों से स्पर्श कर रहे हैं, और क्षण-क्षण में उनकी बलैयां ले रहे हैं (न्योछावर हो रहे हैं)। वे बार-बार दीनतापूर्वक विनती करते हुए (हाहा खाते हुए) कह रहे हैं कि हे प्रियतमे! अब अपना यह मान त्याग दो।

  4. कण-कण पै वारौं यहाँ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर, सोहनी महिमा (435.8)

    श्री हित भोरी सखी जी कहती हैं — अरी सोहनी! मैं इस वृन्दावन की पावन रज के कण-कण पर अपने कोटि-कोटि तन, मन और प्राण न्यौछावर कर देने को तत्पर हूँ और तू इस दिव्य रज को हटाकर दूर फेंकने का प्रयास कर रही है। तू किंचित विचार कर और मेरी इस बात को मान ले।

  5. तुम जान अयोग्य बिसारो मुझे - ब्रज के सवैया

    हे कृष्ण, चाहे तुम मुझे अयोग्य जानकर भुला भी दो, तथापि मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मैं तुम्हें कभी न भूलूँ। मैं सदा तुम्हारे दिव्य गुणों का गान करूँ, निरंतर तुम्हारा ही ध्यान करूँ, और जब तुम मुझसे मान करो, तब मैं प्रेमपूर्वक तुम्हें मनाता रहूँ।

  6. ढिंग विलास-गढ़ दान-गढ़ और मान-गढ़ नाम - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (23)

    बरसाना के विलासगढ़, दानगढ़ और मानगढ़ नामक दिव्य लीला-स्थलों में गौरवर्णी श्री राधा की प्रेम-घटा निरंतर उमड़ती रहती है, जहाँ श्री कृष्ण, चातक के समान, उस प्रेम-रस का निरंतर पान करते रहते हैं।

  7. ब्रह्मा इंद्र कहैं हम चाहैं - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (7)

    ब्रह्मा और इन्द्र कहते हैं—हमें ब्रह्मलोक अथवा स्वर्गलोक के सम्राट की पदवी नहीं चाहिए। यदि ब्रज में एक वृक्ष बनने का भी सौभाग्य मिल जाए, तो हम सदा वहीं बने रहना चाहेंगे।

  8. तोसी न निहारी मैं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (58)

    हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प्रकार मान करना—यह अद्भुत कला तुमने कहाँ से सीखी है?

  9. मान अपमान अभिमान तजि करि वृन्दावन वास - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.83)

    मान, अपमान और अहंकार को त्यागकर श्री धाम वृन्दावन में वास करो। वहाँ की परम मंगलकारी रज में रज बनकर रहो, तभी मन में दिव्य प्रेम का प्रकाश प्रकट होगा।

  10. भजनी क्यों डरिहै उपहासहि - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी

    भजन करने वाला व्यक्ति संसार के उपहास या आलोचना से क्यों डरे? वह तो अपनी वस्तु (भगवत्प्रेम/भगवद्प्राप्ति) के लिए सब सहता है। इसलिए यदि उसे लोकनिंदा और त्रास सहना भी पड़े, तो वह चिंता नहीं करता और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है।

  11. प्यारी तोहि कैसै कै मान मनाऊँ - श्री रामराय जी, आदिवाणी (37)

    हे प्यारीजू! तुम्हारे मान (रूठने) को मनाने का मैं हर संभव प्रयास कर रहा हूँ, किंतु मैं पूर्णतः विवश हो चुका हूँ। तुम्हारी राजधानी वृन्दावन में वास करते हुए हर क्षण कोई न कोई नई युक्ति गढ़ता हूँ, परंतु वह भी निष्फल ही सिद्ध हो रही है।

  12. हौं तेरे वारनें मंद गति चलि - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (12)

    अपनी प्राणसखी श्रीराधा से प्रेम-लीला की चातुर्यपूर्ण योजना करते हुए सहचरी (विठ्ठल विपुल) मधुर वाणी में कहती है — हे सखी! मैं तो आप पर बलिहार जाती हूँ। चलिए अब धीरे-धीरे प्रियतम की ओर चलते हैं।

  13. मान बडाई ईर्षा हरष शोक दुखदाय - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (3)

    हे चतुराई की शिरोमणि, लाडिली श्रीराधे! अभिमान, प्रशंसा, ईर्ष्या और सांसारिक हर्ष-शोक आदि केवल दुखदायी हैं। कृपा कर मुझे इन सब दोषों से बचाकर, अपने चरणकमलों की भक्ति में सदैव लगाए रखो।

  14. नैंना प्रगट करत पिय प्रेमैं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (24)

    श्रीविपुलबिहारिनदासीजी श्री राधा से कह रही हैं कि आपके नेत्रों में तो प्रियतम के प्रति प्रेम स्पष्ट झलक रहा है। क्यों झूठमूठ में उत्तर प्रति-उत्तर देकर हमें आप बहकाने की चेष्टा कर रही हैं, इस मान का परित्याग करें।

  15. मोरकुटी और दान मान गढ़ - रसिक वाणी

    बरसाना के दिव्य स्थानों जैसे मोरकुटी, दानगढ़, मानगढ़ और विलासगढ़ आदि में प्रेमपूर्वक विचरण कर, परमानंद को प्राप्त करना चाहिए। गह्वर वन की लताओं की मधुर छाया में बैठकर “श्री राधा राधा” जपना चाहिए।