कबधौं हृदै क्यारी में प्रेम - ब्रज के कवित्त
हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी?
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हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी?
श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उन्हें श्री विट्ठलविपुल देव जी तथा श्री बिहारिन देव जी का पूर्ण सत्संग प्राप्त हुआ है। ऐसे अनन्य रसिकों के प्रभाव से श्री प्रिया-प्रियतम के प्रति जो अनन्य अनुराग प्रकट हुआ है, उससे उनका चित्त नित्य प्रफुल्लित और आनंदित रहता है।
जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में नवीन पत्ते और पुष्पों के समूह खिले हुए हैं, और वहाँ शीतल, मंद तथा सुगंधित त्रिविध पवन धीरे-धीरे बह रही है।
हे प्यारी जू! आपका यह सुहाग अत्यंत सहज और स्वाभाविक है। अपने प्रियतम के साथ आपका यह सुखद मिलन सदा अविचल बना रहे, यही सुख हमारे प्राणों और जीवन का एकमात्र आधार है।
जो कोई अपने मन को श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में सदा लगाए रखता है, आनन्दस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर उस पर अपार प्रेम की वर्षा करते हैं।
कुंजबिहारी श्री कृष्ण रस के सागर में मग्न होकर निरंतर प्रेम-रस का ही पान करते हैं। उनकी आपसी बातचीत और समस्त हाव-भाव भी केवल रस से ही ओत-प्रोत हैं तथा वे परस्पर एक-दूसरे को अत्यंत अनुराग और रसपूर्ण दृष्टि से निहारते हैं।
साधक को भगवान से विमुख (अधर्मी) जीवों का संग छोड़ने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा कहे गए शब्द तीखे बाणों के समान हृदय को छलनी कर देते हैं। उनके साथ अनजाने में होने वाले मिलन, दर्शन अथवा स्पर्श से भी सर्वथा भयभीत रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा असत्-संग भगवद-प्राप्ति के मार्ग में निश्चित ही एक बहुत बड़ा अवरोध बन जाता है।
यदि कोई भेड़ का बच्चा (भोली भेड़) सिंह बनना चाहे, तो केवल इच्छा करने से वह सिंह नहीं बन सकता। सिंह तो वही बन सकता है जिसने अपने चारों ओर की सभी बाड़ें (बंधन और सीमाएँ) तोड़ दी हों। जो अनेक धर्मों-कर्मों, विधि-निषेधों, सांप्रदायिक विकृतियों अथवा बन्धनों में फँसा हुआ हो, वह सिंह के समान दृढ़ व्रत रखने वाले अनन्य रसिकों की भला क्या समानता करेगा। वास्तविक रसिक तो वही होता है जिसने समस्त बन्धनों को तोड़कर केवल एकमात्र प्रिया-प्रियतम से ही अनन्य सम्बन्ध जोड़ लिया हो।
वह समय कब आएगा जब मैं अत्यन्त दीन होकर रसिक महापुरुषों के चरणों में गिरकर विलाप करूँगा? और वह अवस्था कब प्राप्त होगी जब अपने प्रियतम के दर्शन के बिना मैं जल के बिना तड़पती हुई मछली के समान व्याकुल हो जाऊँगा?
श्री राधा श्रीकृष्ण के हृदय की अधीश्वरी हैं और श्रीकृष्ण श्री राधा के हृदय के अधीश्वर हैं। वे परस्पर एक-दूसरे के हृदय में विराजमान हैं। इसी एकात्म भाव के कारण वे एक-दूसरे के वर्ण के अनुरूप वस्त्र धारण करते हैं (अर्थात् श्री राधा नीले वस्त्र तथा श्रीकृष्ण पीले वस्त्र धारण करते हैं) और साथ-साथ एक ही चाल से विहार करते हैं।
जब परम स्नेही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने अत्यधिक प्रेम के साथ अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह का सारा दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।
जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।
श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं— हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं।
श्री प्रिया-प्रियतम के अत्यंत गोपनीय और अनिर्वचनीय निकुंज-रस का गान करते हुए रसिक शिरोमणि कवि आनंदघन जी कह रहे हैं— इस परम अलौकिक और गूढ़ प्रेम-रस का बखान भला मैं अपनी तुच्छ वाणी से किस प्रकार कर सकता हूँ? परम पावन श्रीधाम श्रीवृंदावन में, यमुना जी के सुंदर तट पर श्रीराधा-मोहन जिस अंतरंग भाव से नित्य विहार करते हैं, वह वाणी से सर्वथा परे है।
आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।
हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।
मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।
हे प्यारी जू, मेरी प्रार्थना पर विचार कीजिए - आपकी यह मृदुल एवं माधुर्यमयी मूर्ति की छटा रात-दिन मेरे हृदय में सदा बनी रहे और यह छवि मेरे ध्यान से टालने पर भी कभी न टले।