रसना! श्रीराधाबल्लभ कहि री - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (205)
हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर।
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हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर।
भगवान कहते हैं— मेरे परम पावन धाम ब्रज की प्राप्ति न तो पुण्य कर्मों से होती है, न दान से, न तपस्या से और न ही स्तुति-प्रार्थनाओं से। विविध प्रकार के योग-साधनों द्वारा भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दिव्य धाम केवल मेरी अहैतुकी कृपा और अनुग्रह से ही प्राप्त होता है।
उस व्रजधाम में नंदकुमार श्रीकृष्ण, जिनका श्रीविग्रह नित्य आनंदमय है, जो आत्माराम और आप्तकाम हैं, वे केवल प्रेम में रंगे हुए भक्तों द्वारा ही साक्षात् अनुभव किए जाते हैं।
मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है।
जो मनुष्य चाहे गूंगे, मूर्ख, अंधे, बहरे हों अथवा तप तथा नियमों से रहित हों— वे भी यदि ब्रज में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो मेरे दिव्य लोक को प्राप्त होते हैं।
वेदों को भी भगवान का रहस्य नहीं मिल पाया और पुराण उन्हें खोजते-खोजते स्वयं पुराने (जीर्ण-शीर्ण) हो गए, फिर भी वे ईश्वर की थाह न पा सके। स्मृतियों ने भी उन्हें समझने के प्रयास में अपनी सुध-बुध खो दी, पर इन ग्रंथों मात्र से प्रभु की प्राप्ति न हुई। सार यह है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल निष्काम प्रेम और शरणागति से ही संभव है।
भगवान का सुमिरन आठों पहर, अर्थात् प्रत्येक श्वास के साथ निरंतर करते रहना चाहिए, और एक क्षण के लिए भी उन्हें नहीं भूलना चाहिए। चारों वेद, अठारह पुराण तथा समस्त धर्मग्रंथों का यही सार है।
नारायण कहते हैं - हे नारद! पुण्यक्षेत्र भारत में ‘वृन्दावन’ नाम पड़ने का एक अत्यन्त गूढ़ कारण कहता हूँ—तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो। श्रुति में वर्णित श्री राधा के सोलह पवित्र नामों में से एक नाम ‘वृन्दा’ है। इस वन में श्री राधा सदा रमणीय क्रीड़ा करती हैं, इसी कारण यह ‘वृन्दावन’ नाम से प्रसिद्ध हुआ है।
यदि मथुरा (ब्रज) पहुँचकर भी कोई अन्य स्थान की इच्छा करे, तो उस दुर्बुद्धि व्यक्ति को अभी पूर्ण ज्ञान कहाँ है? वह तो अपनी अज्ञानता ही प्रकट करता है।
जो मनुष्य एक हजार युगों तक एक पैर पर खड़ा रहता है (तपस्या करके), उससे कहीं अधिक फल मथुरा (ब्रज) निवासी प्राप्त करता है ।
भगवान शंकर नारद जी से अनन्य भक्ति के विषय में कहते हैं - मनुष्य को सदैव केवल अपने उपास्य देव की ही अनन्य शरण लेनी चाहिए और किसी अन्य साधन को नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि अनन्य-भक्ति से ही जीव की जन्मों की बिगड़ी बात बनेगी । ऐसा भक्त अन्य देव की पूजा न करे, अन्य को प्रणाम न करे, न ही अन्य का स्मरण करे । वह न तो अन्य को देखे, न अन्य के यश गावे और न ही अन्य की कभी निन्दा करे, और न ही अन्य का प्रसाद ग्रहण करे, न ही अन्य की माला आदि धारण करे। अपने इष्टदेव के अतिरिक्त अन्य किसी का वार्तालाप, वंदन, या बाह्य व्यवहार को पूर्ण रूप से त्याग देना चाहिए । जैसे चातक पक्षी अत्यन्त प्यासा होने पर भी नदी या समुद्र का जल नहीं पीता और केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा-बून्द ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार जीव को भी केवल अपने इष्टदेव की ही शरण में जाना चाहिए।
मेरे नयनों के तारे, मेरे प्राणप्यारे नंदलाल ही मेरे सुख-दाता और दुख-हरने वाले हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं — “हे पार्थ! तीनों लोकों में यह पृथ्वी, जिसमें वृन्दावन स्थित है, विशेष रूप से धन्य है। वृंदावन में भी वहाँ रहने वाली गोपियाँ धन्य हैं, और उन गोपियों में भी विशेष रूप से शोभायमान मेरी प्रिया श्री राधा अति धन्य हैं।”
श्री राधा श्रीकृष्ण की उपासना करती हैं, और श्रीकृष्ण श्रीराधा की उपासना करते हैं — दोनों एक-दूसरे के आराध्य और आराधक हैं। संतजन सदा कहते हैं कि दोनों में पूर्ण समानता है अथवा कोई भेद नहीं है।
अरे मन! तू श्री वल्लभ (श्री वल्लभाचार्य / श्रीकृष्ण) के गुणों का प्रेमपूर्वक गान कर। तू वेद-पुराण पढ़ने में अपना समय व्यर्थ क्यों कर रहा है?
स्त्रियाँ, म्लेच्छ, पशु, पक्षी, अथवा मृग—जो भी ब्रज में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे सब परम गति को प्राप्त कर लेते हैं।
सभी वेद, पुराण और स्मृतियाँ उसी प्रभु की महिमा का बखान करते हैं, जिसकी सेवा सभी सुर-नर-मुनि आदि करते हैं। अरे महामूर्ख मन! तू उस परम प्रभु का स्मरण क्यों नहीं करता?
हे जीव! जिस मथुरा (ब्रज मंडल) में त्रैलोक्य प्रकाशक गोपी एवं गोविन्द विराजमान हैं, तुम वहाँ वास करो! वास करो!
हे स्वामिनी श्री राधे! यदि मेरे कर्म उत्तम ना हों, तो ही मैं आपकी साहिबिनी रूप शरणागति को त्यागकर अपनी स्वेच्छा से चलने का दुस्साहस करूँगा। अर्थात् यदि मेरी दुर्गति निश्चित हो, तभी मैं आपकी आज्ञा को त्यागकर अपने मन से चलूँगा । पुराण भी बारम्बार उद्घोष करते हैं कि जो शरणागत होता है, केवल वही दिव्यता को प्राप्त करता है, अन्य कोई नहीं।
जो भी ब्रज में मृत्यु को प्राप्त करते हैं, भले ही साँप के काटने से, जंगली पशुओं द्वारा, अग्नि में जलकर, जल में डूबने से अथवा किसी भी प्रकार की अकाल मृत्यु से, वे सभी मेरे दिव्य धाम को प्राप्त होते हैं।