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  1. मेरी कुल पूजि तुहीं मानी - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)

    हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।

  2. चन्द्रिका की चटक मुकुट की - श्री रसिक गोविंद

    आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।

  3. गीता ओ भागौत कौ कान्त - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (6)

    श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि भले कोई श्री गीताजी और श्रीमद्भागवत महापुराण का कितना ही बड़ा उपदेश क्यों न दे, किन्तु यदि उनका हृदय पत्थर के समान कठोर है, तो वे रसोपासना के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ सकते। इस अनन्य रसिकों के देश (नित्य वृन्दावन) में प्रवेश केवल प्रेममय हृदय वाले रसिक ही कर सकते हैं।

  4. राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)

    श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।

  5. मोकौ लै एकान्त में मिलि - श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (06)

    श्री नागरीदास कहते हैं कि उन्हें संसार की कोलाहलपूर्ण वृत्तियों से दूर, ब्रज के किसी गोपनीय एकान्त कुंज में ऐसे अनुभवी रसिक संतों का प्रेमपूर्वक संग कब प्राप्त होगा, जो श्री युगल सरकार की नित्य निकुञ्ज-लीलाओं का मधुर रसास्वादन करते हैं, तथा जिनके संग बैठकर नव-निकुञ्जों की गोपनीय एवं रसपूर्ण लीलाओं का श्रवण करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त होगा?

  6. नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

    आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।

  7. लाल संग लै पौढी ललनां - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (65)

    परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।

  8. वंदे श्री वृंदावन धाम - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (3)

    मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।

  9. रूप-सरोवर लाडिली फूले सहज सरोज - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (12)

    हमारी लाडिलीजी (श्री राधा) साक्षात् रूप-सौंदर्य का अथाह सरोवर हैं, जिसमें उनके विभिन्न अंग — दो हस्तकमल, दो चरण कमल, एक नाभि कमल, दो नयन कमल, एक मुख कमल और उन्नत उरोज कमल — ये दस कमल, सदा सहज खिले रहते हैं।

  10. कौन कहै को सुनें लाल कछुवै नहिं जानत - श्री मनोहर दास, रसिक कर्णाभरण (163)

    कौन कहे और कौन सुने, लालजी (श्री कृष्ण) को श्री राधा के अतिरिक्त कुछ भी सुध-बुध नहीं है। वे अपनी प्राणप्रिया, एकमात्र स्वामिनी श्री राधिका जू के अभाव में इस समस्त संसार को सर्वथा शून्य और सारहीन अनुभव करते हैं।

  11. कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (06)

    श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती है।

  12. रसिक शिरोमनि सांवरो गौरी अद्भुत रूप - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (2)

    रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर और अद्भुत रूप-लावण्य से युक्त गौरवर्णा श्री राधा, श्रीधाम वृन्दावन के गहन कुंजों में युगल रूप से विविध रसपूर्ण लीलाओं में नित्य विहार करते हैं।

  13. नामी नाम न भावई - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (132)

    स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विहार के अतिरिक्त उन्हें अपना नाम सुनना भी सुहाता नहीं। श्री श्यामा-कुंजबिहारी का सर्वस्व और जीवन-प्राण केवल यह नित्य-विहार ही है।

  14. कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (5)

    श्रीयुगल सरकार न तो द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत और न ही विशिष्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों की सीमाओं में आबद्ध हैं। वे वेदों के समस्त तार्किक विवादों से परे, पूर्णतः स्वतंत्र और रसमय हैं। रसिकों के लिए तो केवल श्यामा-श्याम की यह परम-प्रिय जोड़ी ही एकमात्र उपास्य और आधार है।

  15. प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला - श्री पुरुषोत्तम जी

    नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।

  16. हमरी बात भली बनी भई लडैती प्रान - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (279)

    जगत में हमारी बात बहुत ही सुन्दर बन गई क्योंकि स्वयं सर्वोपरि श्रीनित्यविहारिनीजू (श्री राधा) हमारी प्राण-स्वरूप हो गई हैं। रसिक-शिरोमणि श्यामा प्यारी जू के मिलने से हमें अति ही सुख प्राप्त हो गया है।

  17. रसिकवर रसिकनी रस रासि - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (74)

    परम रसिकों में श्रेष्ठ श्री कृष्ण और रसिक शिरोमणि श्री राधा साक्षात् रस की राशि हैं। वे दोनों ही अत्यंत चतुर रसिक हैं और समस्त रसिक जनों के जीवन के आधार हैं, जो सदैव परस्पर हास-विलास में मग्न रहते हैं।

  18. राधामाधव अद्भुत जोरी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)

    रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।

  19. मैं जानी मैं जानी लडैती जू - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (55)

    हे लाड़िली जू! अब मैंने आपके वास्तविक स्वरूप और महिमा को जान लिया है। हे किशोरी जी! आप अत्यंत उदारमयी हैं और विलक्षण प्रेम एवं आनंद की अक्षय निधि हैं।