rasik
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निरतत रसिक सदा उजियारी थेई - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण सदा परम उज्ज्वल कांति से प्रकाशित होकर नृत्य कर रहे हैं। वे 'थेई-थेई' शब्द का मधुर उच्चारण करते हुए समस्त ब्रज-युवतियों के मन का हरण कर लेते हैं तथा करोड़ों कामदेवों के मद का नाश करने वाले हैं।
गुन रूपकी अवधि राधिका - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)
गुण और सौंदर्य की पराकाष्ठा श्री राधिकाजू ने रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण का तन, मन, धन, यौवन, आभूषण और प्राण—सब कुछ उनकी प्राणप्रिया श्रीराधाजी के लिए ही समर्पित है।
प्यारी तू अद्भुत छबि की - श्री रूप सखी जी,श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (181)
हे प्यारी जी (श्रीराधाजू)! आप अद्भुत रूप-सौंदर्य की राशि हैं। आपके अत्यंत मनोहर मुखारविंद की दिव्य आभा पर शरद पूर्णिमा के करोड़ों चंद्रमा भी न्योछावर हैं।
चकित नैन लखि बैन भये - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (70)
रास के अवसर पर श्रीप्रियाजी के अद्भुत रूप-लावण्य के दर्शन कर श्रीलालजी माधुर्य-रस के सागर में डूब जाते हैं।
रसिक रसीली रसभरी रसरूपा रस - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (02)
समस्त रसिकों को परम रस प्रदान करने वाली श्रीराधारानी स्वयं रसस्वरूपिणी और दिव्य प्रेम-रस की सारस्वरूपा हैं। वे ही समस्त रसिकों की एकमात्र जीवन-प्राण तथा समस्त सखियों की परम स्वामिनी हैं।
श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
श्री वृन्दावन धाम पूरी तरह से श्री राधाजी के स्वरूप से ओत-प्रोत है, जहाँ प्रतिदिन, हर क्षण और आठों पहर निरंतर केवल 'राधा-राधा' नाम का ही संकीर्तन होता रहता है।
पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)
प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।
आरति आनि सहचरिज साजी मनिमय - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)
सहचरियों ने आकर प्रियालाल की अद्भुत आरती सजाई है, जिसमें मन रूपी थाल है, प्रेम रूपी बाती है और लाड़िली-लाल को रस-विलास कराने की अनन्त रुचियों का घी और कपूर सुशोभित हो रहे हैं।
पिय तेरी चितबन ही में - गोस्वामी श्री हरिराय जी
हे प्रियतम! तुम्हारी चितवन में ही कोई अद्भुत जादू है। जब से मैंने तुम्हारे इस लावण्यमयी सुंदर मुख के दर्शन किए हैं, तब से मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ भूल गई हूँ।
राधा मंगल-मालती सरस मधुब्रत - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (90)
परम-हितकारी श्रीराधा मालती के फूल के समान हैं, जिनके रस का पान करने के लिए श्यामसुन्दर भ्रमर के सामान सदा मंडराते रहते हैं। श्री धाम वृन्दावन में यमुना के तट पर सदा सुशोभित रहने वाली यह युगल जोड़ी रसिकों का जीवन-प्राण है।
घुँघरारी अलकावली मुख पै देत बहार - ब्रज के दोहे
श्री कृष्ण के मुखमंडल पर सुशोभित घुँघराले बालों की लटें अद्भुत सौंदर्य की छटा बिखेर रही हैं। रसिकों के मीन रुपी मन को आकर्षित कर फँसाने के लिए ये अलकें अत्यंत नुकीले काँटों के समान हैं।
आज समाज सहज मन भायौ - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (65)
आज रंग महल की सहचरी-समाज का यह रस स्वाभाविक रूप से मन को बहुत प्रिय लग रहा है, जहाँ गौर वर्ण वाली अत्यंत भोली सुकुमारी किशोरी श्रीराधा ने श्री कृष्ण को देखकर हर्षित होते हुए उन्हें गले से लगा लिया है।
धन-जोवन-जन-ज्ञान-बल सब गुमान के - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (2)
धन, यौवन, स्वजन, ज्ञान और बल—ये सभी केवल अहंकार (गुमान) उत्पन्न करने के मूल कारण हैं. श्री कान्त किशोर जी कहते हैं कि इन साधनों के बल पर श्री वृन्दावन की रसमय केलि कदापि प्राप्त नहीं की जा सकती।
बेननि के नैननि सों दरस्यो - श्री वल्लभ रसिक जी, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी (54)
रसिक वाणी रूपी नेत्रों के माध्यम से मैंने श्रीयुगल सरकार के दिव्य स्वरूप का साक्षात् दर्शन किया है, और अब अपने नेत्रों की मूक भाषा व प्रेमाश्रुओं द्वारा उनके उस अनुपम रूप-सौंदर्य का वर्णन किया है।
रंग सरोवर श्री बिपुन प्रिया-लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (38)
श्रीवृंदावन रूपी रंग-सरोवर में श्रीप्रिया और लाल जी दोनों सुंदर हंसों के समान क्रीड़ा कर रहे हैं। रसिक रूपी कमलों के मुकुटमणि ये दोनों युगल परस्पर एक-दूसरे के अधर-सुधा के अत्यंत मधुर रस का आचमन कर रहे हैं।
लेत परस्पर अंग सुवास मन - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (19)
श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर एक-दूसरे के अंगों की दिव्य सुगंध का रसास्वादन कर रहे हैं, जिससे उनके मन में अलौकिक प्रेम-काम की तरंगें उठ रही हैं और इस दिव्य रस के अतिरिक्त उन्हें अन्य किसी भी बाहरी वस्तु का भान नहीं है।
जय श्रीराधावल्लभलाल श्रीवृन्दावन - 'मगन अली' (श्री वासुदेवजी)
श्री राधावल्लभ लाल की जय हो, जो श्री वृन्दावन में यमुना जी के तट पर सर्वदा निवास करते हैं।
जासौं सपरस चाहिए तासौ अपरस - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (21)
जिन रसिकों एवं महापुरुषों का हमें नित्य संग करना चाहिए, उनसे तो लोग प्राय: सदा दूर रहते हैं और जिन सांसारिक वासनाओं से युक्त लोगों से दूर रहना चाहिए, उनसे चुंबक की तरह मन चिपका रहता है।
ओर मिले वन ना मिले - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (16)
जिसके हृदय में निरन्तर यह विचार और उत्कण्ठा बनी रहती है कि चाहे संसार की अन्य वस्तुएँ मिलें या न मिलें, पर मुझे श्री धाम वृन्दावन वास अथवा आश्रय अवश्य ही प्राप्त हो, ऐसे व्यक्ति की चरण-रज को ढूँढ़कर, बार-बार अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए।
कुँवरि छबीली अमित छबिछिन -छिन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत (1.54)
नित्य-किशोरी श्री राधा का सौंदर्य असीम और अपार है, जो प्रत्येक क्षण नित-नवीन रूप धारण करता रहता है। उनका दर्शन करके रसिक-शिरोमणि श्री श्यामसुंदर भी स्तब्ध होकर चित्रलिखित (चित्र की भाँति अचल) खड़े के खड़े रह गए हैं।