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  1. तन वन सरस सुहावनों तरु बेली फल फूल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (28)

    वृक्षों, लताओं, फलों और पुष्पों से सदा सरस एवं मनोहर बने हुए श्रीधाम वृंदावन में श्यामा-कुंजबिहारी (प्रिया-प्रियतम), दोनों परस्पर समरस भाव से एवं नित्य-किशोर स्वरूप में सदा नित्य विहार करते रहते हैं।

  2. प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)

    हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ।

  3. प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला - श्री पुरुषोत्तम जी

    नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।

  4. मैं जानी मैं जानी लडैती जू - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (55)

    हे लाड़िली जू! अब मैंने आपके वास्तविक स्वरूप और महिमा को जान लिया है। हे किशोरी जी! आप अत्यंत उदारमयी हैं और विलक्षण प्रेम एवं आनंद की अक्षय निधि हैं।

  5. पंच रसन में मुख्य है उत्तम रस श्रृंगार - श्री सरस माधुरी

    भक्ति के पाँच मुख्य रसों में 'श्रृंगार रस' ही सर्वोपरि और उत्तम है। साधक को अपने हृदय में सहचरी भाव धारण कर, उन सुकुमार युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निष्काम सेवा करनी चाहिए।

  6. ब्रह्मा इंद्र कहैं हम चाहैं - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (7)

    ब्रह्मा और इन्द्र कहते हैं—हमें ब्रह्मलोक अथवा स्वर्गलोक के सम्राट की पदवी नहीं चाहिए। यदि ब्रज में एक वृक्ष बनने का भी सौभाग्य मिल जाए, तो हम सदा वहीं बने रहना चाहेंगे।

  7. रस मत्त बिहारिनि प्यारी है - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (69)

    श्री कुंजबिहारिन (श्री राधा) प्यारी प्रेमोन्माद में उन्मत्त रहती हैं। उनका रूप अद्भुत उज्ज्वलता से युक्त है; केवल थोड़ी सी दृष्टि से निहारने मात्र से ही श्री कृष्ण उनके अधीन हो जाते हैं।

  8. कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)

    प्रिया-प्रियतम अपनी अंतरंग केलि में, तन और मन से एक होकर अत्यंत मनोहर लग रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग की शोभा परम मधुर है, और कुंज-महल ही उनकी केलि का निज धाम है।

  9. रूप प्रिया कौ कहन कौं - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार सभा मण्डल (39)

    श्री प्रियाजी (श्री राधा) के रूप का वर्णन करने की सामर्थ्य मेरी अल्प बुद्धि में कहाँ है? जिनके नयनों की केवल एक कटाक्ष-मात्र से स्वयं सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण भी मोहित होकर उनके चरण कमलों में विभोर होकर लोटने लगते हैं।

  10. स्यामा तू करुना को सागर - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (186)

    हे श्यामाजू (श्री राधा)! आप अगाध करुणा की सागर हैं। आपकी दिव्य कान्ति को निहारकर रसिक-चूड़ामणि श्री कुंजबिहारी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

  11. रूप की रासि किसोर-किसोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (44)

    रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]

  12. सहज बिहार निरन्तर मेरौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (103)

    प्रिया-प्रियतम की कृपा से उनका नित्य विहार मुझे अब सहज उपलब्ध है। दोनों प्रिया-प्रियतम तन-मन से एक होकर विहरण करते हैं, और हर क्षण प्रेम और भी अधिक गहरा होता रहता है।

  13. कीट पतंग पिपीलिका मरकट भृंग मयूर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (97)

    चाहे कीड़ा, पतंगा, चींटी, बन्दर, भौंरा या मोर—जो भी देह मिले, मुझे स्वीकार है। बस, हे युगल-बिहारी! मुझे वृन्दावन की धूल (तुम्हारी चरण-रज) बना दीजिए—वहीं का कण बनकर रहूँ।

  14. लडैती आनंद निधि सुखरासी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (2)

    नित्य विहारिणी श्रीराधा आनंद की निधि और सुख का अगाध सागर हैं। वह महाप्रेम से भरी हुई, सहज रूप से छबीली एवं सदा अपने प्रियतम कुंजबिहारी के निकट रहती हैं।

  15. पशु पक्षी पाषाण हों - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (91)

    हे ललित किशोरी (श्रीराधा)! कृपा कर मुझे ब्रज की गलियों में कुछ भी बना दें— चाहे पशु, पक्षी, पत्थर, तृण या ब्रजरज का एक धूलिकण ही क्यों न हो। चाहे कोई कुआं, बावड़ी या निर्जीव वस्तु ही क्यों न बना दो, बस एक ही विनती है — ब्रजधाम की रज को छोड़ कहीं और जन्म या वास न देना।

  16. सुर-नर-किन्नर-उरग हू - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (6)

    चाहे देवता हों या मनुष्य, किन्नर हों या नाग — सभी प्राणी यही कहते हैं कि यदि उन्हें ब्रज की रेणु (रज) मिल जाए, तो उनका जीवन धन्य हो जाए और उनका भाग्य सफल कहलाए।

  17. जुगल बिहारी विरह में - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (98)

    युगल विहार करने वाले श्री राधा-कृष्ण का वियोग अब और सहन नहीं होता। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे किशोरीजी! कृपा कर अब मुझे वृन्दावन का वास प्रदान कीजिए ।

  18. प्यारी तेरी छबि पर रबि ससि वारौं - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (251)

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! तुम्हारे अनुपम सौंदर्य पर तो मैं सूर्य और चंद्रमा को भी अर्पण कर दूँ। निकुंज महल में सुंदर शय्या पर विराजित तुम्हारे संग प्रियतम की छवि को सदा, एकटक निहारा करूँ — यही मेरी अभिलाषा है।