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  1. जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    श्रीवृंदावन की रज परम शुभता का मूल है। जिस रज का ध्यान मुनिजन लगाते हैं,जिसका स्पर्श ब्रह्मा आदि के लिए भी परम दुर्लभ है।

  2. जाकी कृपा सों नित्य दिव्य ब्रजमंडल माँहि - श्री गिरिराज गोस्वामी 'अनन्त' (गोकुल)

    जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।

  3. नागिरि नागर भाव तैं मंगल रूप रसाल - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (92.2)

    दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण अद्भुत रस को बरसाने वाली परम मंगलकारी जोड़ी हैं। नित्य मंगलमयी भूमि श्रीधाम वृंदावन में, प्रेम और रस की दिव्य होली नित्य ही उत्सव के रूप में खेली जाती है।

  4. कोटि जन्म लगि यह हठ मोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (331)

    हे करुणा की अगाध समद्र, श्री राधा प्यारी जू! अब आपके चरण कमलों के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है, चाहे उनको प्राप्त करने के लिये मुझे करोड़ों जन्म ही क्यों न लेने पड़ें। यही मेरा दृढ़ निश्चय है।

  5. करो भावना सिद्धि अब सेव मानसी रीति - श्री सरस माधुरी

    अब अपनी भावना को सिद्ध करो और मानसी सेवा (मन से सेवा) की रीति अपनाओ। श्री राधा-कृष्ण दंपति के कुंजविहार में निष्काम भाव बनाकर प्रेम से उनकी सेवा करो।

  6. अष्ट सिद्धि नव निद्धि जिहीं - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (14.2)

    श्री बरसाना धाम की जय हो जहाँ अष्ट सिद्धि एवं नवों निधि विचरण करते हैं, और जहाँ श्री लक्ष्मी जी दासी बनकर श्री राधारानी के महल की सेवा प्राप्ति हेतु दिन-रात घूम रही हैं।

  7. चाहौं नहिं प्रसन्न कियो इन्द्र सुरराज जो है - श्री सुंदरी कुंवरी जी

    न ही मैं स्वर्ग के देवराज इन्द्र को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं भगवान ब्रह्मा और किसी अन्य देवी को प्रसन्न करना चाहता हूँ।

  8. जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (52)

    सब सुखों को प्रदान करने वाली और "पराभक्ति" में रति को बढ़ाने वाली, नव-कमल-दल-नयनी, उन श्यामा श्रीराधारानी की जय हो जो रसिक-लाल की मुकुट-मणि अर्थात् शिरोभूषण-स्वरूपा हैं।

  9. श्रीराधे सुख साज मेरे, राधे सिरताज मेरे - श्री लालदास (शुक सम्प्रदाय के रसिक संत)

    श्री राधा मेरी सुख साज हैं, श्री राधा ही सिरताज हैं, श्री राधा समस्त इष्टदेवों में रत्न हैं, और श्री राधा ही सर्वस्व हैं।