शेष महेश दिनेश गणेश लौं - श्री प्रेम जी
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
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शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
श्रीवृंदावन की रज परम शुभता का मूल है। जिस रज का ध्यान मुनिजन लगाते हैं,जिसका स्पर्श ब्रह्मा आदि के लिए भी परम दुर्लभ है।
जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।
दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण अद्भुत रस को बरसाने वाली परम मंगलकारी जोड़ी हैं। नित्य मंगलमयी भूमि श्रीधाम वृंदावन में, प्रेम और रस की दिव्य होली नित्य ही उत्सव के रूप में खेली जाती है।
हे करुणा की अगाध समद्र, श्री राधा प्यारी जू! अब आपके चरण कमलों के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है, चाहे उनको प्राप्त करने के लिये मुझे करोड़ों जन्म ही क्यों न लेने पड़ें। यही मेरा दृढ़ निश्चय है।
अब अपनी भावना को सिद्ध करो और मानसी सेवा (मन से सेवा) की रीति अपनाओ। श्री राधा-कृष्ण दंपति के कुंजविहार में निष्काम भाव बनाकर प्रेम से उनकी सेवा करो।
श्री वृंदावन के वासी धन्य हैं, जिनकी प्रशंसा स्वयं शुकदेव जी, उद्धव जी, ब्रह्मा जी, लक्ष्मी जी, आदि करते हैं।
अष्ट सिद्धि एवं नव निधियों का दाता श्री राधा नाम है। श्री श्यामसुन्दर भुक्ति, मुक्ति एवं भक्ति (सब कुछ) श्री राधा के बल से ही प्रदान करते हैं।
श्री बरसाना धाम की जय हो जहाँ अष्ट सिद्धि एवं नवों निधि विचरण करते हैं, और जहाँ श्री लक्ष्मी जी दासी बनकर श्री राधारानी के महल की सेवा प्राप्ति हेतु दिन-रात घूम रही हैं।
श्री राधा प्यारी प्रकट हुई हैं, जो रूप की राशि हैं जिनके प्रत्येक अंगों की माधुरी परम अद्भुत है जिसका वर्णन करना असंभव है ।
ब्रज में जो आनन्द प्रत्येक घड़ी हो रहा है, वह आनन्द तीनों लोकों में नहीं है। यह गोप-नगरी धन्य है ।
श्री वृंदावन वनराज श्री राधा जू का है जहाँ की भूमि रत्नों से जटित एवं लताएं सोने के समान सजी हैं ।
अनुदिन श्रीराधा-नाम के भजन के प्राप्त होने पर कोटि कोटि श्रेष्ठ साधन भी परित्याज्य हो जाते हैं।
न ही मैं स्वर्ग के देवराज इन्द्र को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं भगवान ब्रह्मा और किसी अन्य देवी को प्रसन्न करना चाहता हूँ।
“राधा-राधा” का जप करते ही असंख्य बाधाएँ मिट जाती हैं। प्रेमघन नंदकुमार स्वयं सिद्धियों सहित भक्त के द्वार पर उपस्थित हो जाते हैं।
वृन्दावन जैसा वन नहीं, नंदगाँव जैसा गाँव नहीं, वंशी वट जैसा वटवृक्ष नहीं, और श्याम नाम जैसा कोई नाम नहीं है।
हे ब्रज की महारानी, श्री राधा! आपकी महिमा अपरम्पार है। आपकी दसियों के द्वार पर रिद्धि-सिद्धि बुहारी देती रहती हैं।
सब सुखों को प्रदान करने वाली और "पराभक्ति" में रति को बढ़ाने वाली, नव-कमल-दल-नयनी, उन श्यामा श्रीराधारानी की जय हो जो रसिक-लाल की मुकुट-मणि अर्थात् शिरोभूषण-स्वरूपा हैं।
श्री राधा मेरी सुख साज हैं, श्री राधा ही सिरताज हैं, श्री राधा समस्त इष्टदेवों में रत्न हैं, और श्री राधा ही सर्वस्व हैं।
जिनके ह्रदय में भगवान् का नाम नित्य विराजमान है उनके पीछे बेचारी अष्ट-सिद्धि और नवों निधि मुख से लार टपकाते हुए फिरती हैं ।