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  1. मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

    मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।

  2. मोतिन के बोरे नहीं हंसन की नहि पांत - श्री बिहारिन देव, रसोपासना तिलक

    हीरे बोरे भरकर नहीं मिलते, न ही हंस पंक्तियों में चलते हैं । शेरों की भी भेड़ों-सी भीड़ नहीं होती, वैसे ही वास्तविक रसिकों की कोई जमात नहीं होती —वे अत्यंत दुर्लभ एवं छिपे हुए होते हैं ।

  3. आजु बनी अति सारंग नैनी - श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी

    सारंग के समान नेत्रों वाली श्रीराधा आज अत्यंत सुंदर बनी हैं। कामदेव को भी मोहित करने वाले श्रीकृष्ण भी राधा के सौंदर्य में पूर्णतः रच-पचकर, उनके बालों की वेणी सजाने में लगे हैं।

  4. मेरे संत चरण रज अंजन - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (99)

    रसिक संतों के चरणों की रज ही मेरे लिए ह्रदय की आँखों को प्रकाश देने वाला अंजन है जिससे तीनों ताप एवं समस्त अंधकार का नाश हो जाता है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य जैसे शत्रुओं के दल के दल विदलित हो जाते हैं ।

  5. श्री परमानंद दासजी की समाधि, सुरभि कुंड, गोवर्धन

    श्री परमानंददास जी ब्रज के रसिक संत थे और पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में से एक थे । श्री परमानंद दास जी अपने द्वारा रचित छंदों का बड़े मधुर राग में गान और कीर्तन करते थे ।

  6. आरती मदन गोपाल की कीजियै - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (18)

    मदनगोपाल की आरती करनी चाहिये। देवऋषि नारद, वेदव्यास एवं शुकदेवजी जब विश्वास पूर्वक इस बात को कहते हैं तब (मदनगोपाल की आरती करके) बिना श्रम के रससिन्धु का पान क्यों नहीं करते?

  7. प्रेम की पिपासा बढ़ी देख निज प्रेमियों की - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (18)

    श्री राधा कृष्ण ने जब देखा कि उनके निज प्रेमियों की पिपासा बढ़ गई है तो उन्होंने अगाध प्रेम का समुद्र सीमा तोड़ कर बहा दिया।

  8. श्री रामराय जी की जीवनी

    श्री रामराय जी का प्राकट्य रावी नदी के तट पर बसे लाहौर नगरी में सारस्वत ब्राह्मण कुल में 1483 वैशाख शुक्ल 11 को मध्यान काल में हुआ ।

  9. तेरे चरण कमल में श्याम लिपट जाऊँ रज बन के - श्री चन्द्रसखी जी

    हे श्री श्यामसुंदर, मेरी यह कामना है की मैं आपके चरणों की रज बनकर सदा उन्हीं से लिपटी रहूँ । आपके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, सुन्दर तिलक धारण है, सुन्दर गोल कपोल है,जो की मनहरण है ।

  10. मैं जु मोहन सुन्यौ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (13)

    मैंने मदनगोपाल के मोहक वेणुनाद को सुना है। इस अद्भुत नाद को सुनकर आकाश में स्थित मुनियानों (विमानों) में बैठी हुई देवताओं की स्त्रियाँ थकित हो गईं।

  11. स्वामी श्री भगवत रसिक जी की जीवनी 

    अनन्य रसिकाचार्य श्री स्वामी हरिदास जी की परंपरा में यों तो अनेकानेक समर्पित भक्त और साधक हो चुके, उन सब में श्री भगवतरसिक जी का अपना विशिष्ट महत्व और स्थान है।

  12. श्रीहित कमलनैंन जी की जीवनी

    गोस्वामी कमलनैंन जी श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के वाणीकारों में अन्यतम हैं। इनका जन्म श्रीहित कुल में 1635 की आषाढ़ कृष्णा पंचमी के दिन वृन्दावन में हुआ था।

  13. श्री किशोरदास जी की जीवनी 

    मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।