मुकट की छाँह मनोहर कीन्हैं - श्री सहजो बाई
श्री श्यामसुन्दर अपने सुन्दर मुकुट की छाया से शोभायमान होकर निकुञ्ज से बाहर आ रहे हैं और अपनी प्रियतमा श्री राधा (भावती) को साथ लिए हुए हैं।
कुंकुमांकित वक्षोजौ पुरुषेण समास्थिता। संगीतरसिका राजत्यसावरी मुनेर्मते॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (141) राग असावरी, राग दीपक की पत्नी हैं। वे अपने पति के संग आनंद परायण हैं, उनका वक्षस्थल कुमकुम रंजीत है। ऋषि नारद के अनुसार, वे संगीत की एक श्रेष्ठ श्रोता हैं। राग आसावरी को दिन के दूसरे प्रहर में गाया जाता है।
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श्री श्यामसुन्दर अपने सुन्दर मुकुट की छाया से शोभायमान होकर निकुञ्ज से बाहर आ रहे हैं और अपनी प्रियतमा श्री राधा (भावती) को साथ लिए हुए हैं।
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।
हे राधे, मैं सदा-सदा की आपकी दासी हूँ। कृपया मुझे अपने महल की टहल प्रदान कर, मेरे भाव का पोषण कीजिए एवं, मुझे अपनी निज सेवा प्रदान करें।
हे सखी, सौंदर्य की पराकाष्ठा (श्री कृष्ण) को निहारो! प्रत्येक अंग से अमित माधुरी छलक रही है जिसको निहार कर साक्षात कामदेव भी लज्जित हो रहा है ।
समस्त गुणों की ख़ान, रसिकों के मन को मोहने वाली मनोहारिणी, सर्व शिरोमणि, परम भोली श्री राधा की जय हो ।
नंद लाल श्री कृष्ण से प्रेम करो! वह ही केवल हैं जो अच्छे और बुरे समय में जीव के साथ सदा रहते हैं । उनकी कृपा से ही हम जीवित हैं ।
श्री श्यामसुंदर को वशीभूत करने वाली, उन नवल गोरी श्री राधा की जय हो, जो साखियों के प्राणों की आधार हैं ।
अरे मन! तू “राधा राधा” नाम का भावपूर्ण भजन कर क्यूँकि इसका भजन निरंतर शुकदेव, शिव, नारद, सनकादिक एवं ब्रह्मा जी भी करते हैं ।
हे मन! "श्री राधा राधा" नाम का रटन कर इसका निरंतर अपनी रसना से पान कर एवं दृढ़ता पूर्वक इस नाम की शरण ग्रहण कर ।
राजा वृषभानु की पुत्री श्री राधा को निहारो जिनकी नैंन मृग के समान मोहक हैं, जिनका अद्बुत रूप सौंदर्य है एवं जिनका अंग अंग सुंदरता की खान है ।
श्री नंददास जी एक सखी रूप से अन्य सखी से कहते हैं कि - हे सखि ! जब से कानो में कृष्ण का नाम सुना है , तब से मैं अपना घर संसार भूल, बाँवरी बन गयी हूँ ।
श्याम सुंदर से कभी नेह मत करना क्यूँकि उनका मन और शरीर दोनों ही काले हैं। वह मन मोहक एवं सलोने हैं, यदि आपने उनसे प्रीति की तो वह तुम्हारा सब कुछ ले लेंगे ।
हे श्री राधा, आज मुझपर अपनी करुणा दृष्टि कीजिये । अपनी एवं अपने (निज) प्रियतम श्री कृष्ण की चरण रज की रति मुझे प्रदान कीजिये ।
जब से श्री राधा नाम का श्रवण किया है तब से आनंद हृदय में किसी भी प्रकार समाता नहीं और बाहर उछल आता है।
आज सब जन राजा श्री वृषभानु के प्रांगण में बधाई गीत गाकर उत्सव मना रहे हैं जहाँ रानी कीर्ति की कोख में समस्त गुणों से युक्त, सुख की खानी स्वरूपा एक पुत्री [श्री राधा] ने जन्म लिया है ।
श्री कृष्णदास जी कहते हैं "ब्रज की गोपियाँ श्री कृष्ण दर्शन के लिए व्याकुल चित्त हैं, इसलिए बार-बार वे सब पनघट पर आती हैं और अपने सर पर यमुना जल से भरी मटकी रखती हैं।"
प्यारौ श्री राधा नाम धन्य धन्य (परम पूजनीय) है। इस दिव्य श्री राधा नाम को जब जीव आठों याम हृदय से धारण कर लेता है तब सहज ही श्याम सुंदर का हृदय में प्रादुर्भाव हो जाता है।
श्यामा श्याम पर बलिहार जाइए, सुख एवं दुःख त्याग कर वृंदावन में रहिए ।
प्रस्तुत पद में श्री सूरदास जी, राधा माधव की मिलन लीला का वर्णन करते कहते हैं कि, "श्री राधा और श्री कृष्ण जब मिलते हैं (राधा कृष्ण बन जाते हैं और कृष्ण राधा बन जाती हैं ) तो उनके रूप एक समान हो जाते है
श्री हरिराम व्यास कह रहे हैं की स्वयं को न्यौछावर करते हुए श्री वृन्दावन धाम का वास करुँगा। परम पवित्र श्रीयमुना जी में स्नान करुँगा और ब्रजवासीयों की जूठन को प्रशाद रूप में ग्रहण करुँगा। बंसीवट के परम रमणिक भूमी में भ्रमण करुँगा और लताओं के सुन्दर कुंजों का त्याग कर कहीं और नहीं जाउँगा। जब भी श्री राधा मान लीला करेंगी तो मैं उन्हें बड़े प्रेम पूर्वक मनाउँगा।