राग केदारौ

राग केदारौ का नाम भगवान शिव के केदार से लिया गया है। माना जाता है कि राग केदार भगवान कृष्ण को बहुत प्रिय है। अधिकतर, राग केदारौ को रात्रि के पहले प्रहर में गाया जाता है।

70 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. राधामाधव अद्भुत जोरी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)

    रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।

  2. बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (32)

    कुंज की इस दिव्य रजनी (रात्रि) में प्रियतमा श्री राधा और प्रियतम श्री लाल (कृष्ण) रस-विलास कर रहे हैं। वे मुख से मुख जोड़कर परस्पर प्रेम की क्रीड़ा कर रहे हैं, जहाँ उनके नूपुरों के स्वर और कंगनों की खनक से एक मधुर संगीत उत्पन्न हो रहा है।

  3. आजु बनी री कुञ्जेश्वरी रानी - श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी

    आज श्री कुंजेश्वरी रानी, श्री राधा, परम सुशोभित हो रही हैं। उनके बिखरे केश, सुगंधित पुष्पों से सजी हुई सुंदर वेणी में गुँथे हुए, मंद-मंद लहरा रहे हैं।

  4. खेलत मोहन राधा गोरी - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (976)

    श्री श्यामसुंदर हर्षोल्लास से भरकर श्री राधिका संग होली खेल रहे हैं। एक ओर गोपियों के दल उत्सुकता से जुटे हैं, तो दूसरी ओर ग्वालबालों का समूह चांचरी की ताल पर नृत्य एवं क्रीड़ा में मग्न है।

  5. बनी री तेरे चारि चारि चूरी करनि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (50)

    हे प्यारीजू (श्री राधा), आपके प्रत्येक हाथ में चार चूड़ियाँ सुशोभित हैं। एक बहुमूल्य हीरे का हार आपके गले की शोभा बढ़ा रहा है, और आपकी नथ से मोती झूल रहे हैं।

  6. बदी पिय आजु प्रिया सों होड़ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (39)

    आज प्रियतम (कृष्ण) प्रिया (राधा) के संग स्वर की गति में होड़ करते हुए अति उत्साह में भरकर नव-निकुंज के मध्य स्थित हैं, जहाँ वे सुरों के सूक्ष्म भेद-विभेदों को प्रकट कर रहे हैं।

  7. तेरे नूपुर - धुनि री प्यारी स्रवन सुनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (33)

    हे प्यारी ! आपके चरणारविंद से नूपुर ध्वनि की सुंदर झंकार का श्रवण कर, श्रीवृन्दावन की समस्त अचल सम्पत्ति चलायमान हो रही है एवं चलायमान अचल हो रहे हैं। खग- मृग आदि पक्षीगण एवं अन्य जन्तु मुनियों की भाँति रस-समाधि में तदाकार हो रहे हैं।

  8. दरपन में प्रतिबिंब ज्यौं - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (60)

    श्रीप्रिया-प्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंबित नेत्र, देखने वाले के नेत्रों में मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीश्यामाश्याम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं।

  9. प्यारी तेरी बॉफिन बान सुमार - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (37)

    श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू! आपकी चितवनि अर्थात् पलकें बाण के समान हैं एवं भौंहें धनुष के समान हैं जिसके प्रहार से कोई नहीं बच सकता । यदि एक साथ इस धनुष के बाण छूट जायें तो ऐसा रस बरसता है मानो इंद्र के क्रोध से भयंकर बादल बरसने लगें ।

  10. सुनि धुनि मुरली बन बाजै - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (52)

    अरी सखी! कुंजों में बज रही मुरली की धुन सुन, श्री हरि ने रास रचाया है । प्रत्येक कुंज में वृक्ष एवं लताएँ प्रफुल्लित हैं एवं रास मण्डल सोने एवं मणियों से जटित है ।

  11. मानुनी मानु कीओ किह काज - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (18)

    एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुमने किस कारण अपने प्रियतम से मान किया हुआ है ? प्रियतम श्याम सुंदर तो सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं एवं तुम्हारी ही शरण में हैं, उनके ह्रदय का ख़्याल कीजिए ।