राधामाधव अद्भुत जोरी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)
रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।
राग केदारौ का नाम भगवान शिव के केदार से लिया गया है। माना जाता है कि राग केदार भगवान कृष्ण को बहुत प्रिय है। अधिकतर, राग केदारौ को रात्रि के पहले प्रहर में गाया जाता है।
70 संकीर्तन उपलब्ध हैं
रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।
कुंज की इस दिव्य रजनी (रात्रि) में प्रियतमा श्री राधा और प्रियतम श्री लाल (कृष्ण) रस-विलास कर रहे हैं। वे मुख से मुख जोड़कर परस्पर प्रेम की क्रीड़ा कर रहे हैं, जहाँ उनके नूपुरों के स्वर और कंगनों की खनक से एक मधुर संगीत उत्पन्न हो रहा है।
श्री श्यामा (राधा) नित्य नवीन, अनुपम नागरी हैं, जो रूप और गुणों की खान हैं। वे अत्यन्त सुभग, ललित और राजराजेश्वरी स्वरूपा हैं ।
आज श्री कुंजेश्वरी रानी, श्री राधा, परम सुशोभित हो रही हैं। उनके बिखरे केश, सुगंधित पुष्पों से सजी हुई सुंदर वेणी में गुँथे हुए, मंद-मंद लहरा रहे हैं।
श्री श्यामसुंदर हर्षोल्लास से भरकर श्री राधिका संग होली खेल रहे हैं। एक ओर गोपियों के दल उत्सुकता से जुटे हैं, तो दूसरी ओर ग्वालबालों का समूह चांचरी की ताल पर नृत्य एवं क्रीड़ा में मग्न है।
हे प्यारीजू (श्री राधा), आपके प्रत्येक हाथ में चार चूड़ियाँ सुशोभित हैं। एक बहुमूल्य हीरे का हार आपके गले की शोभा बढ़ा रहा है, और आपकी नथ से मोती झूल रहे हैं।
आज प्रियतम (कृष्ण) प्रिया (राधा) के संग स्वर की गति में होड़ करते हुए अति उत्साह में भरकर नव-निकुंज के मध्य स्थित हैं, जहाँ वे सुरों के सूक्ष्म भेद-विभेदों को प्रकट कर रहे हैं।
गिरधारी लाल कुंजबिहारी श्री कृष्ण इतने सुन्दर हैं की उनके अंग-अंग पर करोड़ों कामदेव न्योंछावर हैं।
हे प्यारी ! आपके चरणारविंद से नूपुर ध्वनि की सुंदर झंकार का श्रवण कर, श्रीवृन्दावन की समस्त अचल सम्पत्ति चलायमान हो रही है एवं चलायमान अचल हो रहे हैं। खग- मृग आदि पक्षीगण एवं अन्य जन्तु मुनियों की भाँति रस-समाधि में तदाकार हो रहे हैं।
नंदनंदन श्री कृष्ण पर बार-बार बलिहारी जाइए । श्यामसुंदर की मनोहर छवि को निहार-निहार कर सुख का पान कीजिए।
ये ब्रजवासी श्री हरि के प्यारे हैं। वे हरि में हैं, और हरि उनमें सदा रहते हैं, एक क्षण को भी नहीं बिछड़ते।
श्रीप्रिया-प्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंबित नेत्र, देखने वाले के नेत्रों में मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीश्यामाश्याम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं।
हे श्री राधे, मैं बिनामोल का आपका सेवक हूँ, जैसा आप चाहे वैसा करें, लेकिन मुझे मुरली प्रदान कर दीजिये, मैं आपसे विनती करता हूँ।
सब सांसारिक प्रपंचों को त्याग कर श्री हरि का भजन करो । किसी अन्य का भजन करने से काम नहीं चलेगा, और न ही यह भव जंजाल मिटेगा ।
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू! आपकी चितवनि अर्थात् पलकें बाण के समान हैं एवं भौंहें धनुष के समान हैं जिसके प्रहार से कोई नहीं बच सकता । यदि एक साथ इस धनुष के बाण छूट जायें तो ऐसा रस बरसता है मानो इंद्र के क्रोध से भयंकर बादल बरसने लगें ।
जब श्री राधिका ने श्री कृष्ण की मुरली सुनी तो अपने भवन से समस्त काज को त्याग कर वे वन की ओर चल पड़ी।
श्री प्रिया प्रियतम कुंज मंडप में बैठे हैं । श्री कृष्ण चन्द्र दूल्हा बने हैं और श्री राधिका दुल्हन ।
अरी सखी! कुंजों में बज रही मुरली की धुन सुन, श्री हरि ने रास रचाया है । प्रत्येक कुंज में वृक्ष एवं लताएँ प्रफुल्लित हैं एवं रास मण्डल सोने एवं मणियों से जटित है ।
एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुमने किस कारण अपने प्रियतम से मान किया हुआ है ? प्रियतम श्याम सुंदर तो सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं एवं तुम्हारी ही शरण में हैं, उनके ह्रदय का ख़्याल कीजिए ।
प्रियाजी की मनुहार करते हुए लाल निवेदन कर रहे हैं कि आपके चरणारविन्द में मैं नत हूँ, कृपया आप रूठें नहीं ।