राग सारंग

पुष्पगुच्छप्रियो माध्वीरस पान कुतूहलः। मनोजगर्वजनकः सारंगो रागनायक:॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (82) सारंग कौशिक के पुत्र हैं। उन्हें फूलों के गुच्छे प्रिय हैं और माधवी फूलों से निर्मित रस पीने के लिए उत्साहित हैं। कामदेव भी उनपर गर्व करते हैं और वे रागों के नायक हैं। राग सारंग एवं वृंदावनी सारंग एक ऐसा राग है जो शृंगार रस या दिव्य प्रेम को प्रकट करता है। इसे दोपहर में गाया जाता है एवं यह काफ़ी ठाट से सम्बंधित राग है।

130 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)

    श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।

  2. या रस कों हौं हीं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)

    श्री प्रिया-प्रियतम के अत्यंत गोपनीय और अनिर्वचनीय निकुंज-रस का गान करते हुए रसिक शिरोमणि कवि आनंदघन जी कह रहे हैं— इस परम अलौकिक और गूढ़ प्रेम-रस का बखान भला मैं अपनी तुच्छ वाणी से किस प्रकार कर सकता हूँ? परम पावन श्रीधाम श्रीवृंदावन में, यमुना जी के सुंदर तट पर श्रीराधा-मोहन जिस अंतरंग भाव से नित्य विहार करते हैं, वह वाणी से सर्वथा परे है।

  3. ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि - श्री सूरदास, सूरसागर (1108)

    ब्रह्मा कहते हैं— ब्रज की गलियों में बसने की रीति ऐसी ही होनी चाहिए जहाँ हम ब्रजवासियों और ग्वालों के जूठे पत्तलों से अन्न के दानों (सीथ) को चुन-चुनकर अपना पेट भरें।

  4. कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18)

    मैं इस पावन श्री वृन्दावन धाम को त्याग कर कहाँ जाऊँ? मुझ जैसे अधम और तुच्छ प्राणी के लिए श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई स्थान नहीं है।

  5. माधौ मोहिँ करौ वृंदावन रेनु - श्री सूरदास, सूरसागर (1107)

    ब्रह्मा जी विनयपूर्वक स्तुति करते हुए कहते हैं—“हे माधव! मुझे श्री वृन्दावन की पावन रज बना दीजिए। यह वही दिव्य धूल है, जिस पर आप अपने चरणों से विचरण करते हैं और प्रतिदिन वन-वन जाकर गौओं को चराते हैं।”

  6. बाँह डुलावति आवति राधा - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (826)

    श्री राधा अपनी भुजाएँ डुलाती (मटकाती) हुई आ रही हैं। वे अपने कमल-समान मुख को ढके हुए हैं और उसे पूरी तरह नहीं खोलतीं; उनके माथे का तिलक भी आधा मिट गया है।

  7. होरी में लाज न रहे प्यारी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वर्षोत्सव पद (35)

    हे प्यारी! इस होली के उत्सव में अब लज्जा और संकोच का कोई स्थान नहीं रह गया है। वह रसिया (कृष्ण) डफली बजाते हुए घूम रहा है और प्रेम भरी (ठिठोली वाली) गालियाँ गा रहा है।

  8. गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)

    हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निरंतर तुम्हारा ही यश गा रहे हैं। वे केवल तुम्हारे ही नाम का जाप कर रहे हैं और विरह में बिलख (रो) रहे हैं। काम ने श्याम को इतना व्यथित कर दिया है कि वे तुम्हारे प्रेम में पूरी तरह व्याकुल हो उठे हैं।

  9. छबीले नील घन की पूतरी - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली

    हे सखी! नील मेघ सदृश कोई छबीली रूप-मूर्ति (श्री कृष्ण) इस वृन्दावन में क्रीड़ा कर रही है। उनके अंग-अंग पर विविध आभूषण सुशोभित हैं, अधरों पर मधुर बंसी विराजमान है, और उनकी परछाईं तक की शोभा भी मन को मोहित कर लेती है।

  10. स्यामा तू करुना को सागर - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (186)

    हे श्यामाजू (श्री राधा)! आप अगाध करुणा की सागर हैं। आपकी दिव्य कान्ति को निहारकर रसिक-चूड़ामणि श्री कुंजबिहारी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

  11. कहों री जो कहिबे की होइ - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (182)

    हे सखी, चाहे कोई इसे कितना भी बताने का प्रयास करे, पर सत्य यही है कि श्री बिहारी–बिहारिणी जू का नित्य विहार ऐसा अद्भुत और विलक्षण रस से परिपूर्ण है, जिसकी गहराई को कोई भी पूर्णतः समझ नहीं सकता।

  12. डोल झूलें स्यामा स्याम सहेली - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (16)

    हे सखी ! दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम डोल झूल रहे हैं। नव-निकुंज मन्दिर में नवरंगी प्रियतम के संग गर्वोन्मत्त गर्वीली प्रिया विहार कर रही हैं।

  13. बेंनी गूँथि कहा कोउ जानें मेरी सी - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (70)

    हे प्यारी जू ! आपकी सौगन्ध खा कर कह रहा हूँ कि वेणी गूंथने की कला मेरे समान और कौन जानता है ? हे प्यारी! वेणी के बीच-बीच में सफेद, पीले एवं लाल फूलों की सज्जा मेरे सदृश दूसरा कोई नहीं बना सकता ।

  14. हमारी बृंदावन रजधानी - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि मुक्तावलि (9)

    श्री वृन्दावन समस्त तीर्थों का शिरोमणि, रसिकों की राजधानी है, जहाँ निधिवन के अधिपति, ब्रजराज लाड़िले श्रीकृष्ण नित्य विराजमान हैं, और श्री राधा रानी उनकी परमस्नेहवती पटरानी रूप में विराजमान हैं।

  15. नैंना प्रगट करत पिय प्रेमैं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (24)

    श्रीविपुलबिहारिनदासीजी श्री राधा से कह रही हैं कि आपके नेत्रों में तो प्रियतम के प्रति प्रेम स्पष्ट झलक रहा है। क्यों झूठमूठ में उत्तर प्रति-उत्तर देकर हमें आप बहकाने की चेष्टा कर रही हैं, इस मान का परित्याग करें।