जदपि अपराध सतत बहु कीन्हो - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
यद्यपि मैंने निरंतर अनेक अपराध किए हैं, फिर भी हे कृपा के सागर श्री वृंदावन धाम! आपने मुझे अपनी शरण में लेकर यहाँ निवास प्रदान किया है।
ब्रज के पद विशेष रूप से ब्रज भाषा में रचित गेय काव्य हैं, जिनमें भावों को संक्षिप्त, सरल और मधुर रूप में व्यक्त किया जाता है। इन्हें प्रायः विभिन्न रागों में गाया जाता है, जिससे इनकी रसात्मकता और भी बढ़ जाती है। ब्रज के रसिक संतों ने अपने गहन भावों को मुख्यतः पदों में ही पिरोया है, जो संगीत के माध्यम से सहज ही हृदय तक पहुँचते हैं।
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यद्यपि मैंने निरंतर अनेक अपराध किए हैं, फिर भी हे कृपा के सागर श्री वृंदावन धाम! आपने मुझे अपनी शरण में लेकर यहाँ निवास प्रदान किया है।
मेरा मन श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्त हो गया है।
अति चतुर और सुंदर सखी श्री ललिता जी अपने हाथों में वीणा लेकर खड़ी होकर मधुर सुरों में गा रही हैं। शय्या पर लेटे हुए श्री श्यामा-श्याम इस मधुर तान को सुन रहे हैं, जिससे उनके कानों में इस संगीत को सुनने की रुचि और अधिक बढ़ रही है।
हे श्री राधे! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे श्री वृन्दावन में अखण्ड वास प्राप्त हो। मुझे अपने निज कुञ्ज-भवन में स्थान देकर अपनी निज सेवा प्रदान कीजिए।
इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं।
श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।
नवल किशोरी (श्री राधा) कुंजों से अपने पायलों की रुनझुन ध्वनि करती हुई आ रही हैं और धीरे-धीरे अपने पग धर रही हैं।
(एक सखी कहती है) हे श्री राधा! मैं आपके मन की बात भली-भाँति जानती हूँ। अपने प्रियतम (श्री कृष्ण) के विनय भरे वचन सुनकर आपका हृदय द्रवित हो जाता है क्योंकि आप अपने प्रेम के सच्चे प्रण का पोषण करने वाली हैं।
हे मन! अब तू श्री वृन्दावन में ही अखंड वास कर। संसार की व्यर्थ आशाओं को छोड़कर अब केवल अपनी स्वामिनी श्री राधा महारानी के चरणों का ही अनन्य आश्रय धारण कर।
हे बाँकें बिहारी जी! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। हे तीनों लोकों के मुकुटमणि प्रभु! आप सदैव से ही दीन-दुखियों की लाज रखते आए हैं। हे स्वामी! जो भी जीव आपकी शरण में आया, आपने उसे अपनी परम पावन ठौर (शरण) प्रदान की है।
मैं विविध प्रकार की लताओं के कुंजों की बार–बार बलैया लेता हूँ | मैं वृक्षों में लिपटी हुई लता एवं लताओं में फूले हुए विविध प्रकार के फूल तथा फूलों पर मँडराते हुए भौंरों के झुण्ड़ों की बार – बार बलैया लेता हूँ | मृगों के नेत्रों के समान चंचल तरंगों से युक्त मृगनयनी वृषभानुनन्दिनी की बार – बार बलैया लेता हूँ | लोकातीत प्रेम की अन्तरंग लीलाओं के माधुर्य में उन्मत्त रसिक – शिरोमणि श्यामसुन्दर की बलैया लेता हूँ | अंधकार में भी विविध प्रकार की मणियों से जटित गहनों के प्रकाश की बिजली के समान चमक की बार – बाए बलैया लेती हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्रेम के अमृत के रस की सार – स्वरूपा प्रिया – प्रियतम की अनोखी जोड़ी को देखते हुए बार – बार बलिहार जाता हूँ |
श्री हरिराम व्यास जी (श्री विशाखा अवतार), वृन्दावन रस की महिमा का बखान करते हुए बताते हैं कि मुझे केवल वृन्दावन रस ही सुहाता है। मैं बार बार उन पर बलिहारी जाता हूँ, जो वृन्दावन रस की चर्चा करते हैं। किसी प्रकार का सांसारिक कर्म तो दूर परन्तु वेद, शास्त्र एवं उनके भाष्य जिनमें राधा कृष्ण का वृन्दावन रस न झलके, उनमें भी मेरी रूचि नहीं है। यह रस चर्चा का विषय नहीं परन्तु अनुभव रूप है। साक्षात श्री कृष्ण की कृपा तभी मानना, यदि कोई रसिक जीवन में आये एवं वृन्दावन रस के विषय में बताये। बहुत ही दुर्लभ एवं भाग्यशाली वह जीव हैं जिनके हृदय में यह वृन्दावन रस प्रकट हो गया है।
अरी माई ! मेरा तो ग्राम बरसाना है | राधा ठकुरानी जो प्रेम की निधि एवं आनन्द की खान हैं, वे ही हमारी महारानी हैं | यहाँ गह्वरवन, वृषभानुकुण्ड एवं प्रेम – सरोवर आदि दिव्य स्थान हैं | ब्रह्मा, विष्णु, शंकर से भी अप्राप्य श्री वृन्दावन धाम हमारी राजधानी है | जहाँ हम किशोरी जी के साथ दिन – रात विविध कुंजों में रास का रसास्वादन करते रहते हैं | ब्रह्म श्रीकृष्ण ही वहाँ किशोरी जी के लिये झाड़ू लगाते हुए मार्ग साफ करते हैं तथा उनकी प्रतीक्षा करते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम भी ‘राधे, राधे’ कहते हुए प्रेम – रस – में उन्मत्त वहाँ डोला करते हैं |
अरे मन ! तू राधा-कृष्ण के चरण-कमलों की शरण में जा, तथा राधा-कृष्ण का स्वरूप अपने हृदय में रखकर उनके विविध नाम गुणादिकों को प्रेम-विभोर होकर गाता हुआ निरन्तर वृन्दावन में ही निवास कर | प्रेम प्राप्त सखी भावयुक्त महापुरुषों की शरण होकर उस दिव्य प्रेमामृत का पान कर, जो तेरे जीवन का सर्वस्व है |
कुंजबिहारी की भावना है प्यारी जी आप मुझे अंग संग कर कुंजों विहार कर रही हैं , मैं आप की बलायें यानि बलिहारी पर लेता हूँ, आप अपनी कृपालुता बरसाती रहें , आप इसी भांति रहें , बोलें , गाती रहें ।
भजो मन राधा राधा राधा, राधा राधा राधा। रसना नित रस पिवु बिनु बधा, नाम सुधा रस राधा, राधा राधा। श्रवण सुनहु नित लीला राधा, अगनित गुन गन राधा, राधा राधा राधा।
वृंदावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं। इन्हीं के बल पर मैंने लोक, वेद और कुल की सभी मर्यादाओं का त्याग कर दिया है।
युगल सरकार कुंज में नृत्य कर रहे हैं। ललितादिक सखियाँ बार–बार बलिहार! बलिहार! कह–कहकर विभोर हो रही हैं।
अर्थात रसिक संत श्री कृपालुजी महाराज कहते हैं कि अरे मन दिव्य वृन्दावन की अलौकिक बहार देख, जहाँ पर प्रिया-प्रियतम नित्य ही विहार करते हैं। जहाँ जड़-चेतन समस्त जीव चिन्मय हैं, जहाँ की महारानी राधा ठकुरानी हैं, जहाँ नित्य ही बसंत) ऋतू का निवास है तथा जहाँ खिले हुए कुन्द, केवड़ा, कर्णिकार, कचनार आदि फूलों पर भौंरे गुंजार किया करते हैं। जहाँ मोर, कोयल, तोते आदि भी निरन्तर ‘राधे-राधे’ पुकारा
लाल जी प्रिया जी से कह रहे हैं- हे प्यारी जी ! आपके रस भरे नयनों में मैं अपनापन देख रहा हूँ | क्या आप भी मेरे नयनों में उसी भाँति अपनापन देख रही हैं या नहीं ?