ब्रज विहार

ब्रज विहार वृंदावन के रसिक संत श्री नारायण स्वामी की प्रसिद्ध रचना है। उन्होंने विभिन्न दोहे लिखे हैं जो श्री युगल सरकार और श्री वृंदावन धाम को समर्पित हैं। लेखक: श्री नारायण स्वामी

49 लेख उपलब्ध हैं

  1. प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)

    हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ।

  2. प्राणनाथ या जगत में सो अभागिनी नार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, रास पंचाध्यायी लीला (11)

    एक गोपी कहती है—हे प्राणनाथ (श्री कृष्ण)! इस संसार में वह स्त्री (अथवा जीव-रूपी नारी) अत्यंत अभागिनी है, जो आपको त्यागकर पुनः सांसारिक कुटुंब और परिवार के सुखों की चाहना करती है।

  3. सघन बन झूलें दोऊ सुकुमार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24)

    वृंदावन के हरे-भरे, सघन वन में युगल किशोरी श्री राधा-कृष्ण एक संग झूला झूल रहे हैं। उनके हृदय हर्षोन्माद से भरे हुए हैं, वे बार-बार एक-दूसरे की छवि निहार रहे हैं, और प्रत्येक क्षण उनका प्रेम और अधिक बढ़ता जा रहा है।

  4. पंकज विषधर मीन मृग - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (94)

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! कमल, सर्प, मछली, मृग, बाण, खंजन पक्षी और बादाम — ये सब तुम्हारी आँखों के बिना मूल्य के गुलाम हैं, क्योंकि तुम्हारे नेत्रों की अनुपम छवि ने इनकी शोभा को अर्थहीन कर दिया है।

  5. मोहि मति रोकै री तू एरी ब्रज नागरी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)

    जब श्री कृष्ण माननी श्री राधा से मिलने पहुंचते हैं तो श्री राधा की एक सखी उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक देती हैं ।

  6. निरख निरख शोभा हर्ष - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (93)

    श्री राधा की अद्भुत रूप माधुरी को निहार कर श्री कृष्ण के हृदय को अपार आनंद होता है । तब माननी श्री राधा को मनाने के लिए वे अत्यंत विनम्र होकर, डरते-डरते श्री राधा से विनती करने लगते हैं। ऐसी सर्वोच्च स्वामिनी, वृंदावन की अधिष्ठात्री किशोरीजी की जय हो!

  7. साँवरे क्यों मोसों रिस मानी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (8)

    हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ।

  8. प्यारी जी तिहारे बिन कल न परत है - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (16)

    हे प्यारी जू [श्री राधा], आपके बिना मुझे एक क्षण को भई चैन चैन नहीं मिलता। मंदिर, अटारी, सुंदर चित्रों से सजी फुलवारी—इनमें से कोई भी मुझे प्रिय नहीं लगता।

  9. लीला युगलस्वरूप की, दुख भंजन सुख दैन - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वंशी लीला (13)

    युगल सरकार (श्री राधा कृष्ण) की लीलाएं दुखों को दूर करती हैं और सुख प्रदान करती हैं। जो लोग इन लीलाओं का नित्य श्रवण एवं गान करते हैं, वे चैन (आनंद) पाते हैं।

  10. प्रिय प्रीतम के गुण ललित, निगमागम को सार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, रास पंचाध्यायी लीला (26)

    प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) के गुण मनोहर हैं जो वेदों एवं शास्त्रों का सार हैं । जो भी इनका गान एवं श्रवण करता है वह निश्चित ही भव से पार हो जाता है ।

  11. या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3)

    हे सखी, मेरे मन ने सांवरे सलोने कृष्ण चन्द्र से प्रीति जोड़ ली है। अब मैं कुल की मर्यादा का पालन न करने के कलंक से नहीं डरूंगी, जो अब मेरा मन कहेगा, वही करूँगी।

  12. नारायण वृन्दाविपिन, निशिदिन रहत वसन्त - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विलास, वसन्त लीला (1)

    श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि श्री धाम वृंदावन में बसंत निशिदिन (सदैव) बसंत रहता है जहां दिव्य युगल सरकार, राधा कृष्ण, दोनों आनंदचित्त होकर अनंत क्रीड़ाएँ करते रहते हैं ।

  13. बिघन हरन मंगल करन - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (116)

    युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के चरण समस्त विघ्नों का हरण करने वाले एवं सदा मंगल करने वाले हैं । श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि अपने निज जनों के जीवन के प्राणों के आधार हैं ।