आज बंशीवट वरषत रंग यमुना - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (20)
आज बंशीवट पर प्रेम-रस की वर्षा हो रही है। यमुना जी के तट पर अत्यंत सुखद और शीतल मंद समीर बह रही है तथा विभिन्न प्रकार के पक्षी मधुर कलरव कर रहे हैं।
ब्रज विहार वृंदावन के रसिक संत श्री नारायण स्वामी की प्रसिद्ध रचना है। उन्होंने विभिन्न दोहे लिखे हैं जो श्री युगल सरकार और श्री वृंदावन धाम को समर्पित हैं। लेखक: श्री नारायण स्वामी
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आज बंशीवट पर प्रेम-रस की वर्षा हो रही है। यमुना जी के तट पर अत्यंत सुखद और शीतल मंद समीर बह रही है तथा विभिन्न प्रकार के पक्षी मधुर कलरव कर रहे हैं।
हे सखी! साँवरे (श्रीकृष्ण) के दर्शन किए बिना मुझे तनिक भी चैन नहीं पड़ता। प्रत्येक क्षण मेरा मन व्याकुल रहता है, क्योंकि मेरे नेत्र उनके अनुपम रूप के दर्शन के लिए निरन्तर प्यासे हैं।
हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ।
एक गोपी कहती है—हे प्राणनाथ (श्री कृष्ण)! इस संसार में वह स्त्री (अथवा जीव-रूपी नारी) अत्यंत अभागिनी है, जो आपको त्यागकर पुनः सांसारिक कुटुंब और परिवार के सुखों की चाहना करती है।
हे लाल (प्रियतम)! आओ, हम श्री यमुना के तट पर मिलकर वसंत खेलें। वन के निकुंजों में नई ऋतु आई है और नये-नये फूल खिल उठे हैं।
मनमोहन श्रीकृष्ण जैसा सुन्दर और कोई नहीं। मेरे अनुमान से तो उनकी समानता कोई दूसरा नहीं कर सकता।
हे कुंजबिहारी! मुझे नहीं पता कि श्री वृषभानु की चंद्रमुखी पुत्री, श्री राधा, तुमसे किस कारण रूठ गई हैं।
वृंदावन के हरे-भरे, सघन वन में युगल किशोरी श्री राधा-कृष्ण एक संग झूला झूल रहे हैं। उनके हृदय हर्षोन्माद से भरे हुए हैं, वे बार-बार एक-दूसरे की छवि निहार रहे हैं, और प्रत्येक क्षण उनका प्रेम और अधिक बढ़ता जा रहा है।
हे प्यारी जू (श्री राधा)! कमल, सर्प, मछली, मृग, बाण, खंजन पक्षी और बादाम — ये सब तुम्हारी आँखों के बिना मूल्य के गुलाम हैं, क्योंकि तुम्हारे नेत्रों की अनुपम छवि ने इनकी शोभा को अर्थहीन कर दिया है।
जब श्री कृष्ण माननी श्री राधा से मिलने पहुंचते हैं तो श्री राधा की एक सखी उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक देती हैं ।
श्री राधा की अद्भुत रूप माधुरी को निहार कर श्री कृष्ण के हृदय को अपार आनंद होता है । तब माननी श्री राधा को मनाने के लिए वे अत्यंत विनम्र होकर, डरते-डरते श्री राधा से विनती करने लगते हैं। ऐसी सर्वोच्च स्वामिनी, वृंदावन की अधिष्ठात्री किशोरीजी की जय हो!
हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ।
हे प्यारी जू [श्री राधा], आपके बिना मुझे एक क्षण को भई चैन चैन नहीं मिलता। मंदिर, अटारी, सुंदर चित्रों से सजी फुलवारी—इनमें से कोई भी मुझे प्रिय नहीं लगता।
युगल सरकार (श्री राधा कृष्ण) की लीलाएं दुखों को दूर करती हैं और सुख प्रदान करती हैं। जो लोग इन लीलाओं का नित्य श्रवण एवं गान करते हैं, वे चैन (आनंद) पाते हैं।
प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) के गुण मनोहर हैं जो वेदों एवं शास्त्रों का सार हैं । जो भी इनका गान एवं श्रवण करता है वह निश्चित ही भव से पार हो जाता है ।
चाहे तू योग किया कर, अथवा भृकुटी के मध्य उसका ध्यान किया कर, अथवा चाहे तू उसका नाम, रूप मिथ्या जान कर उसे निहारने की कोशिश किया कर।
हे सखी, मेरे मन ने सांवरे सलोने कृष्ण चन्द्र से प्रीति जोड़ ली है। अब मैं कुल की मर्यादा का पालन न करने के कलंक से नहीं डरूंगी, जो अब मेरा मन कहेगा, वही करूँगी।
आज रसिया (श्री कृष्ण) को नारी बनाओ । उनके कटि में लहंगा, उर में कंचुकी एवं शीश पर चुनरी उड़ा दो ।
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि श्री धाम वृंदावन में बसंत निशिदिन (सदैव) बसंत रहता है जहां दिव्य युगल सरकार, राधा कृष्ण, दोनों आनंदचित्त होकर अनंत क्रीड़ाएँ करते रहते हैं ।
युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के चरण समस्त विघ्नों का हरण करने वाले एवं सदा मंगल करने वाले हैं । श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि अपने निज जनों के जीवन के प्राणों के आधार हैं ।