चाचा वृंदावन दास

चाचा वृंदावन दास, वृंदावन के एक रसिक, राधा वल्लभ सम्प्रदाय एवं श्री हित हरिवंश महाप्रभु के अनुयायी थे ।

48 लेख उपलब्ध हैं

  1. कानन मो गति कानन मो पति - श्री वृंदावन दास जी

    यह दिव्य कानन (श्री वृन्दावन अथवा बरसाना धाम) ही मेरी एकमात्र गति (आश्रय) है, यही मेरा स्वामी (पति) है, और यही मेरी माता, पिता तथा भाई है। मैं इस पावन कानन में नित्य निर्भय होकर वास करूँ, और मेरा यह मन इस कानन को त्यागकर कभी भी किसी अन्य स्थान पर न भटके।

  2. श्री राधा हौं जानति तो मन की - श्री वृंदावन दास जी

    (एक सखी कहती है) हे श्री राधा! मैं आपके मन की बात भली-भाँति जानती हूँ। अपने प्रियतम (श्री कृष्ण) के विनय भरे वचन सुनकर आपका हृदय द्रवित हो जाता है क्योंकि आप अपने प्रेम के सच्चे प्रण का पोषण करने वाली हैं।

  3. नमो नमो जु भक्ति रिझवार - श्री वृंदावन दास जी

    मैं उन भगवान शिव को बार-बार नमस्कार करता हूँ जो केवल भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं। जिनका नाम जगत में 'गोपेश्वर' (गोपियों के ईश्वर) के रूप में प्रसिद्ध है, वे ही इस वृंदावन के रक्षक (कोतवाल) हैं।

  4. जो मारग खोजत फिरत अजहूँ शेष महेश - चाचा वृन्‍दावनदासजी, रसिक अनन्य परचावली (32)

    जिस वृन्दावन-रस रूपी मार्ग को ब्रह्मा, शेष, शिव आदि भी खोजते फिरते हैं, उसी अद्भुत मार्ग को आपने इस पृथ्वी पर दुर्लभ से सुलभ बना दिया। हे रसिक-शिरोमणि, श्रीहित हरिवंश महाप्रभु! आपकी जय हो।

  5. आगे की आगे गई अब न रुखाई देहु - श्री वृंदावन दास चाचा जी, विवेक लक्षण बेली (106)

    जो बीत गया सो बीत गया प्रभु, कृपा कर अब कठोरता न दिखाइए। श्री हित वृंदावन दास जी विनयपूर्वक प्रार्थना करते हैं कि अपने इस दास की लाज को अपने हृदय में धारण कर उस पर कृपा कीजिए।

  6. तरनि तनैया तीर सन्तनि की रहै भीर - श्री वृंदावन दास चाचा जी

    श्री धाम वृन्दावन में सूर्य पुत्री श्री यमुना के पावन तट पर सदा संतों की पंक्तियाँ सजी रहती हैं। मोर अपने नर्तन से और तोते मधुर कलरव से वातावरण को रसमय बनाते हैं। यही है श्री राधाजू का परम पावन निज धाम।

  7. राधापति गति एक तुम मोकौं और न ठाउँ - श्री वृंदावन दास चाचा जी, विवेक लक्षण बेली (107)

    हे राधा पति (श्रीकृष्ण)! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं । आपके अतिरिक्त मेरे लिए दूसरी कोई ठौर नहीं है। श्रीहित वृंदावन दास कहते हैं: “मैं बार बार बलिहारी जाऊँ, कृपया मुझे अपने श्रीवृंदावनधाम की निकुंज सेवा का सौभाग्य प्रदान करें।”

  8. श्री राधा कौ वृन्दावन रसमय - श्री हित वृंदावन दास

    श्री राधा का वृंदावन अति रसमय है, जो मोहन (श्रीकृष्ण) को अत्यंत प्रिय है। प्रीतम श्रीकृष्ण की वृंदावन के प्रति ऐसी अनन्य निष्ठा है कि वे एक पग भी वृंदावन की सीमा के बाहर नहीं रखते।

  9. राधिका छबीली प्रानप्यारी वृषभानुसुता - श्री वृंदावन दास चाचा जी

    राधिका - श्री कृष्ण की आराध्या, छबीली - अनुपम छवि को धारण करने वाली, प्रानप्यारी - श्री कृष्ण को अपने प्राणों से अधिक प्यारी, वृषभानुसुता - वृषभानु जी की पुत्री, लाड़िली - श्री कृष्ण एवं समस्त परिकर के लिए लाड़ की भाजन एवं अत्यन्त दुलारी, नवेली - नित्य नवीन रूप माधुर्य धारण करने वाली, अलबेली - सुन्दर छवि से श्री कृष्ण एवं समस्त परिकर को आकर्षित करनेवाली, ठकुरानी - सर्वोपरि महारानी।

  10. जुगल भजन भींज्यौ रहै हिये गहगह्यौ नेह - श्री वृंदावन दास चाचा जी, विवेक लक्षण बेली (41)

    ऐसा भक्त जो सदा युगल सरकार के भजन में लीन रहता है और जिसका हृदय गूढ़ प्रेम से ओत-प्रोत रहता है, वह तीनों लोकों को पवित्र कर देता है।

  11. वंदौं सुमति रसज्ञ जन - श्री हित वृन्दावन दास जी

    मैं उन सुंदर मति वाले, रसमर्मज्ञ करुणा धाम रसिक जनों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने युगल श्री श्यामा श्याम के मिलन हेतु वाणी रूपी नेत्र बनाये हैं अर्थात् जिनकी वाणी युगल स्वरूप के दर्शन कराने में सक्षम है।

  12. हियके लोचन गड़ी रूपकी चटक विकट है - श्री वृंदावन दास चाचा जी

    हित रूप लालजी की ह्रदय की आँखें श्री राधा के रूप पर अटकी हुई हैं, और उनके ह्रदय की चाह इतनी गहरी है कि कोई उसे समझ नहीं सकता। वे “हा राधा, हा राधा” यही रटते जा रहे हैं।

  13. वानी पाती प्रेमकी, व्यौरौ लिख्यौ बनाइ - श्री वृंदावन दास चाचा जी

    रसिक संतों द्वारा रचित वाणियाँ प्रेम के द्वारा भेजी हुई वह पाती (पत्री) है जिसमें सब बातें विस्तार पूर्वक लिखी हुई हैं । इस पाती को पढ़कर और समझकर जो चलते हैं, वे प्रियतम के घर अवश्य पहुँचते हैं ।

  14. अक्षर धुरकी पालकी आई रसिकन लैन - श्री वृंदावन दास चाचा जी

    रसिक संतों द्वारा लिखित वाणियाँ रूपी पालकी रसिक साधकों को लेने के लिए ही इस लोक में आई है। जिन्होंने इन्हें देखकर 'वाह वाह' किया, वे तो यहीं रह गए, और जो उस पर चढ़ गए (वाणियों में प्रेम से डूब गए), वे रसमय धाम में पहुँच गए।