श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी

श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी गौड़ीय संप्रदाय के रसिक संत श्री गदाधर भट्ट जी द्वारा लिखित श्री श्यामा श्याम की दिव्य लीलाओं की काव्य रचना है।

17 लेख उपलब्ध हैं

  1. है हरि तें हरिनाम बड़ेरो - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (15)

    भगवान हरि से भी बड़ा उनका ‘नाम’ है; हे मूर्ख! तू इस सत्य को स्वीकार करने में संकोच क्यों करता है? इसका प्रमाण देख—मुचकुंद को भगवान ने साक्षात् दर्शन दिए, फिर भी उन्हें आगे तपस्या करने की आज्ञा मिली; अर्थात् दर्शन के बाद भी उन्हें पूर्ण विश्राम नहीं मिला।

  2. देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (68)

    अरी सखी! देखो, ब्रज की हर एक गली में आनंद के सागर स्वयं हरि, प्रेमपूर्वक होली खेल रहे हैं। मधुर गीतों, हास-परिहास और लीलाओं के मध्य, हजारों सखाओं के संग वे रंगों की इस उत्सवमयी रसधारा में मग्न हो रहे हैं।

  3. यह सुख जो हृदय रहे - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (52.13)

    जब श्री प्रिया-प्रियतम का वृंदावन रस हृदय में रहता है, तब वह हृदय की समस्त मलिनताओं एवं विकारों को स्वतः ही भस्म कर देता है, जिसके फलस्वरूप चित्त इधर-उधर विचलित नहीं होता।

  4. अंग अंग प्रेम बरखत, सकल सुखकी मूरि - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (38.9)

    जिनके अंग अंग से प्रेम बरसता है, वे ही समस्त सुखों की मूल हैं । श्री गदाधर भट्ट जी ऐसी श्री राधा के चरणों की रज को अपने सिर पर सदा रखते हैं ।

  5. सखी, हौं स्‍याम रंग रँगी - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (34)

    हे सखी मैं श्यामसुंदर के रंग में रंगी हूं । श्री श्याम सुंदर के सुंदर स्वरूप को निहार कर मैं बिक चुकी हूँ, और उसकी रूप माधुरी में सराबोर हो चुकी हूँ ।

  6. श्री वृंदावन योगपीठ गोविंद निवासा - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, योग पीठ (54)

    श्री वृंदावन धाम गोविंद से मिलन का उनका प्रकट निज निवास स्थल है, वहाँ श्री गदाधर भट्ट जी चरण-शरण में रहकर सेवा की आशा कर रहे हैं।

  7. हों व्रज मागनों जू व्रज तजि अंत न जाऊँ जू - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, उपदेश पद (11)

    मैं केवल ब्रज का वास माँगता हूँ और ब्रज को त्यागकर कभी कहीं नहीं जाऊँ। इस भूमंडल पर भले ही बड़े-बड़े धनवान, राजा, दानी और सुजान हों, परंतु न तो किसी के आगे हाथ फैलाऊँ और न ही किसी के आगे सिर झुकाऊँ। मैं इसी प्रकार ब्रज के बल पर इस अभिमान में नित्य रहूँ।

  8. देखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (57)

    हे सखी, बसंत के इस मौसम में श्री कुंजबिहारी को मूर्ति की भाँति अर्थात् अहर्निश निहार। उनके तरुण एवं नित्य नवीन तन से रस की वर्षा हो रही है।

  9. नित्यानंद कदम्ब केलि वृंदावन शोभा - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, योग पीठ (14)

    श्री वृन्दावन की वह दिव्य शोभा, जहाँ कदम्ब के वृक्षों के नीचे श्री राधा-कृष्ण की नित्य आनंदमयी लीलाएँ (केलि) होती रहती हैं, अत्यंत अद्भुत है। उस अनुपम छवि को निहारने के लिए करोड़ों-करोड़ इंद्र (देवराज) भी स्वयं को दरिद्र (रंक) मानकर उस रस को पाने का लोभ करते हैं।

  10. अंग संग सो प्रेम बरखत सकल सुख की मूरि - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी

    श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि जिनके अंग-संग से साक्षात प्रेम की ही वर्षा होती है, जो समस्त सुखों की आधार हैं, ऐसी श्री राधे जू की चरण-रज मैं अपने सिर पर सम्पूर्ण रूप से धारण करता हूँ।

  11. युगल वर आवत हैं गठ जोरें - श्री गदाधर भट्ट

    युगल वर श्री श्यामा श्यामा एक दूसरे का आलिंगन कर आ रहे हैं, जिनके संग श्री वृषभानु नंदिनी [श्री राधिका जू] सुशोभित हो रही हैं, जिसको निहार कर श्री ललिता इत्यादि सखियाँ अपने प्राणों को न्यौछावर करती हुई तृण तोड़ रही हैं ।

  12. सुन्यो चतुर चौंसठ कला तदपि भोरी

    इससे बड़ा आश्चर्य मैंने कहीं नहीं देखा कि श्री राधे, आप चौंसठ कला में चतुर होते हुए भी अत्यंत भोरी हो। केवल आप ही अलबेली सरकार हो, आप जैसा तो कोई भी नहीं है ।

  13. जयति श्री राधिके सकल सुख साधिके - श्री गदाधर भट्ट

    हे श्री राधिके, आप समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं, आप नित्य यौवन अवस्था को प्राप्त हुई मुकुट मणि हैं। आप श्री कृष्ण के नीले घन समान तन के रूप की चातकी हैं एवं श्री कृष्ण चंद्र मुख के किरण की चकोर हैं (श्री कृष्ण चंद्र मुख को चकोर की भाँति देखती रहती हैं) ।