श्री हित रूपलाल

श्री हित रूपलाल, वृंदावन धाम के रसिक संत, श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बंधित हैं ।

25 लेख उपलब्ध हैं

  1. हिंडोरे झूलत री सुरंग चूनरी पहिरें - श्री हित रूप लाल

    सुंदर रंगों वाली चुनरी धारण किए श्री प्रिया जी मनोहर हिंडोले में झूल रही हैं। उनके प्रियतम लाल बिहारी बड़े अनुराग और उत्साह से उन्हें झुला रहे हैं और प्रेमवश बार-बार उन पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं। श्री राधा के अनुपम सौंदर्य की लहरें चारों ओर छा रही हैं।

  2. जिनके देह नेह रस भीने - श्री हित रूप लाल

    जो बड़भागी जन प्रभु के प्रेम-रस में भीग जाते हैं, उनके नेत्र प्रेम के नशे में मतवाले हो जाते हैं । उस प्रेम रस के प्रभाव से वे सांसारिक संबंधों से अनभिज्ञ हो जाते हैं ।

  3. बिनु सिर प्रेमी रहै निरंतर - श्री हित रूप लाल

    सच्चे प्रेमी सदा ही बिना सिर (अर्थात् अहंकार को त्याग) के रहते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रियतम को अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपना सिर भी समर्पित कर दिया है।

  4. प्रथमहि भावुक भाव विचारै - श्री हित रूप लाल

    श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी कहते हैं कि रस उपासक को भजन आरंभ करने से पूर्व अपने सहज सखी भाव का विचार करना चाहिए। अपने श्री गुरु की कृपा मानकर, अपने मन से उसे नव किशोर अवस्था वाली सहचरी के रूप में अनुभव करना चाहिए।

  5. विपिन वर राज विहारिनि राजै - श्री हित रूपलाल जी

    सर्वोकृष्ट श्री वृंदावन धाम पर विराज रही श्री कुंज बिहारिनी श्री राधिका का ही राज है जहां श्री कुंज बिहारी (कृष्ण) राधा रानी की इस आशा से सेवा करते हैं कि श्री बिहारिनी (राधा) जी उनपर भी कृपा की दृष्टि डालेंगीं ।

  6. तेजोमय अरु अमृतमय, आनन्दमय निज धाम - श्री हित रूपलाल जी, श्री वृंदावन रहस्य सर्वतत्वसार

    श्री प्रिया-प्रियतम का निज धाम तेजोमय, अमृतमय, आनंदमय, शोभामय, रसमय एवं सुखद है, जिसका नाम श्री वृंदावन है।

  7. श्रीजमुना जी वा पार है मान सरोवर स्वक्ष - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (87)

    श्री यमुना जी के उस पार अत्यंत निर्मल और पावन मान सरोवर स्थित है। यहाँ गंगा और यमुना का मिलन साक्षात् प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।

  8. ब्रह्मादिक वंदन करत और न कोऊ समतूल - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (159)

    वह श्री वृन्दावन धाम, जिसका वंदन ब्रह्मा आदि देवता भी करते हैं और जिसकी समानता किसी अन्य स्थान से नहीं की जा सकती—वहीं साक्षात प्रभु श्री कृष्ण, श्री राधा की वेणी गूँथने के लिए पुष्प चुनते हैं।

  9. देखी कहुँ गलिन में मो प्राण जीवनी - श्री हित रूपलाल जी

    हे सखी, क्या तुमने मेरी प्राणप्यारी श्री राधा को ब्रज गलियों में देखा है ? हे प्यारे की जीवनी, मेरी भूल को आप क्यों देखती हो, आप क्यों लताओं में दूर चली गयी, मुझे अपना दर्शन दीजिये आनन्दनी श्री राधा ।

  10. बडौ रास मंडल इहां सेवित हित हरिवंश - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (42)

    श्री वृन्दावन में ‘बड़ा रास-मंडल’ नामक एक अत्यंत पावन स्थान है, जहाँ श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधा-कृष्ण की सेवा की थी। इसी स्थान पर एक बार रास-लीला के समय, जब श्री राधारानी की पायल टूट गई थी, तब श्री हरिराम व्यास जी ने अपना जनेऊ तोड़कर उनके चरणों में अर्पित कर दिया था।

  11. श्री हित रूपलाल जी की जीवनी

    1681 ई. के वैशाख कृ० 7 को श्रीहित हरिवंशजी महाराज के कुल में गोस्वामी श्रीरूप लालजी का जन्म हुआ। इनके पिता गोस्वामी श्रीहरिलालजी तथा माता श्रीकृष्णकुँवरि थीं।

  12. पग-पग कोटि प्रयाग सम - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (187)

    कोटि-कोटि तीर्थों से संपन्न तीर्थराज प्रयाग भी श्री वृन्दावन के केलि-कुञ्जों में पग-पग पर शरण ग्रहण करता है; इसलिए जगत की समस्त मृग-तृष्णाओं का त्याग कर श्री वृन्दावन का आश्रय लेना और वृन्दावन-रस का ग्रहण करना चाहिए।