मोसों हँसि हो लाडिली हौं हँसिंहों तेहि सँग - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (40)
मेरे साथ श्रीलाड़िलीजी (राधा) हँसती-खेलती हैं और मैं भी उनके साथ हँसती हूँ। जब वे प्रेम में भरकर मुझे गुदगुदी करके हँसाती हैं, तब मैं भी उनके अंगों को गुदगुदी कर देती हूँ।
हृदय सर्वस्व श्री वंशी अलि जीद्वारा लिखा गया ग्रंथ है जिसमें उन्होंने अपने हृदय का सार लिखा है।
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मेरे साथ श्रीलाड़िलीजी (राधा) हँसती-खेलती हैं और मैं भी उनके साथ हँसती हूँ। जब वे प्रेम में भरकर मुझे गुदगुदी करके हँसाती हैं, तब मैं भी उनके अंगों को गुदगुदी कर देती हूँ।
श्रीवृषभानु-कुमारी श्रीराधा एवं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा नित्य-विहार-रस में निमग्न रहते हैं और अपनी सखियों के हृदयों को आनन्दरस में अभिषिक्त करते रहते हैं।
श्री राधा के कोमल, कमल-से हाथों को बार-बार थामकर, झूमते हुए नाचूँ और चरणकमलों को सच्चे (शुद्ध) मन से अपने नेत्रों से लगाऊँ।
मैं कुँवरि (श्री राधा) से प्रेमपूर्वक रूठ जाऊँ, तो श्री राधा ही मुझे मनाएँगी। परंतु यदि कभी श्री राधा मुझसे रूठ जाएँ, तो मैं उनके चरणों में गिरकर उन्हें मनाने के लिए हर संभव उपाय करूँगी, जिससे वे प्रसन्न हो जाएँ।
मेरी प्राणप्यारी, श्री लाड़ली प्यारी जू (श्री राधा), मुझ पर अपनी अनंत करुणा बरसाते हुए हँस-हँस कर मुझे बार बार गले से लगाती हैं और अपने अमृततुल्य खंडित पान (भोग लगाया हुआ) को प्रेमपूर्वक मुझे प्रदान करती हैं।
सुख की राशि किशोरी जब पौढ़ी होंगी, मैं कुछ भी नहीं बोलूँगा, उनको निहार-निहार कर मेरे ह्रदय में उनके मुख दर्शन की प्यास और-और बढ़ेगी।
इस एकांतिक निज महल के रस में प्रिया प्रियतम को रात-दिन नित्य विहार के अतिरिक्त अन्य कोई रस नहीं भाता । यहाँ प्यारी राधिका रस माधुरी से श्री कृष्ण का पोषण करती हैं एवं उनको निहार निहार कर श्यामसुन्दर जीवित रहते हैं ।
श्री राधा के अंगों को श्रृंगार कर, उनके चरणों में जावक लगाती हूँ। कभी कभी श्री राधा से ही प्रेमपूर्वक झगड़ा भी करती हूँ क्योंकि उनके अतिरिक्त मेरी और कहीं कोई ठौर नहीं है।
जब श्री राधा अपने पलंग पर शयन कर रही होंगी, तो वहीं पास में बैठकर उनके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाऊँगी । नेत्रों से अश्रु प्रवाहित करते हुए, श्री राधा के गुणों का गान करूँगी ।
श्री राधा का अनन्य भजन करके ही श्री राधा को प्राप्त किया जा सकता है जिसके पश्चात् वे नित्य ही हंस हंस कर निहारती हैं एवं निहाल करती रहती हैं ।
मेरे नयन, नासिका एवं सभी अंग राधिका हैं, श्री राधा ही मेरे हृदय और वचनों में संपूर्ण रूप से विराजती हैं। ऐसा अब मेरा सहज स्वभाव बन चुका है कि मैं श्री राधिका से एक पल को भी नहीं बिछुड़ सकता।
श्री धाम वृंदावन के नित्य विहार में ईश्वरत्व श्री राधा में है और दासत्व श्री कृष्ण में है । श्री राधा सदा अपनी कृपा दृष्टि डालकर श्री कृष्ण को निहाल करती रहती हैं ।
श्री वृषभानु कुँवरी श्री राधा ही मेरे जीवन की प्राण हैं । मैं इस वृंदावन धाम की शपथ ग्रहण कर कहता हूँ कि उनके अतिरिक्त मेरे ह्रदय में अन्य कोई नहीं निवास करता ।
श्री वंशी अलि जी के अनुसार स्वयं श्री ललिता जी ही श्री हित हरिवंश के स्वरूप में कुँवरि श्री राधा की चरण माधुरी को विश्व में प्रकाशित करने हेतु इस धरा पर प्रकट हुई थी।
श्री राधा के नयनों से श्री कृष्ण के नयन मिलते रहें, ह्रदय में ह्रदय समाया हो, भुजाओं से भुजाएँ लिपटी हों—बस यही (नित्य विहार) रस ह्रदय को भाता है।
हे सखी, मैं श्री राधा की ही अनन्य दासी हूँ, मेरे मन में श्री राधा के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री राधा के निज जन की सब प्रकार से केवल श्री राधा ही हैं।
यदि श्री राधा के चरणों का संग प्राप्त हो, तो नरक का वास भी मुझे प्रिय होगा। परंतु उनके चरणों के बिना, चाहे मुझे सुंदर निकुंज का वास ही क्यों न मिल जाए, ऐसा निकुंज मुझे एक क्षण के लिए भी स्वीकार नहीं।
मैं उन श्री लाल जी (श्री कृष्ण) को ही जानता हूँ जो श्री राधा के चरणों के अनन्य दास हैं, और उन गुरुदेव को ही जानता हूँ जो श्री राधा की अनन्य उपासना करे एवं करावे। इन पर ही मेरा दृढ़ विश्वास है, इनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को स्वप्न में भी नहीं जानता।
श्री राधा ही मेरा प्राण धन है, श्री राधा ही मेरा जीवन है एवं श्री राधा की गौर वर्ण की छवि ही मेरी आँखों में नित्य समाई हुई है ।
मेरी जिह्वा सदा “राधा” रटती है, मेरे कान सदा “राधा” सुनते हैं। मेरे नयन सदा श्री राधा को ही देखते हैं; श्री राधा के अतिरिक्त मेरी कोई गति नहीं है।