हृदय सर्वस्व

हृदय सर्वस्व श्री वंशी अलि जीद्वारा लिखा गया ग्रंथ है जिसमें उन्होंने अपने हृदय का सार लिखा है।

34 लेख उपलब्ध हैं

  1. मोसों हँसि हो लाडिली हौं हँसिंहों तेहि सँग - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (40)

    मेरे साथ श्रीलाड़िलीजी (राधा) हँसती-खेलती हैं और मैं भी उनके साथ हँसती हूँ। जब वे प्रेम में भरकर मुझे गुदगुदी करके हँसाती हैं, तब मैं भी उनके अंगों को गुदगुदी कर देती हूँ।

  2. श्री वृषभान कुमार नित नाम कुँवर नंदनन्द - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (4)

    श्रीवृषभानु-कुमारी श्रीराधा एवं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा नित्य-विहार-रस में निमग्न रहते हैं और अपनी सखियों के हृदयों को आनन्दरस में अभिषिक्त करते रहते हैं।

  3. हौं रूसोंगी कुँवरि सों, कुँवरि मनावै मोहि - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (39)

    मैं कुँवरि (श्री राधा) से प्रेमपूर्वक रूठ जाऊँ, तो श्री राधा ही मुझे मनाएँगी। परंतु यदि कभी श्री राधा मुझसे रूठ जाएँ, तो मैं उनके चरणों में गिरकर उन्हें मनाने के लिए हर संभव उपाय करूँगी, जिससे वे प्रसन्न हो जाएँ।

  4. हंस हंस कंठ लगाय है मोको मेरी जीव - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (46)

    मेरी प्राणप्यारी, श्री लाड़ली प्यारी जू (श्री राधा), मुझ पर अपनी अनंत करुणा बरसाते हुए हँस-हँस कर मुझे बार बार गले से लगाती हैं और अपने अमृततुल्य खंडित पान (भोग लगाया हुआ) को प्रेमपूर्वक मुझे प्रदान करती हैं।

  5. हौं कहि हों नाहिंन कछू पोढ़ी कुंवर सुखरास - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (43)

    सुख की राशि किशोरी जब पौढ़ी होंगी, मैं कुछ भी नहीं बोलूँगा, उनको निहार-निहार कर मेरे ह्रदय में उनके मुख दर्शन की प्यास और-और बढ़ेगी।

  6. नाहीं और रस की तहाँ खटक कहूँ दिन रात - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (1)

    इस एकांतिक निज महल के रस में प्रिया प्रियतम को रात-दिन नित्य विहार के अतिरिक्त अन्य कोई रस नहीं भाता । यहाँ प्यारी राधिका रस माधुरी से श्री कृष्ण का पोषण करती हैं एवं उनको निहार निहार कर श्यामसुन्दर जीवित रहते हैं ।

  7. राधा अंग सिंगार हौं, जावक दैहौं पाँव - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (38)

    श्री राधा के अंगों को श्रृंगार कर, उनके चरणों में जावक लगाती हूँ। कभी कभी श्री राधा से ही प्रेमपूर्वक झगड़ा भी करती हूँ क्योंकि उनके अतिरिक्त मेरी और कहीं कोई ठौर नहीं है।

  8. राधा पलिका पौढ़ि है बैठि पलोटों पाइ - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (41)

    जब श्री राधा अपने पलंग पर शयन कर रही होंगी, तो वहीं पास में बैठकर उनके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाऊँगी । नेत्रों से अश्रु प्रवाहित करते हुए, श्री राधा के गुणों का गान करूँगी ।

  9. राधा ही के भजन से पाऊँ राधा बाल - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (32)

    श्री राधा का अनन्य भजन करके ही श्री राधा को प्राप्त किया जा सकता है जिसके पश्चात् वे नित्य ही हंस हंस कर निहारती हैं एवं निहाल करती रहती हैं ।

  10. नैनन नासिका राधिका - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (30)

    मेरे नयन, नासिका एवं सभी अंग राधिका हैं, श्री राधा ही मेरे हृदय और वचनों में संपूर्ण रूप से विराजती हैं। ऐसा अब मेरा सहज स्वभाव बन चुका है कि मैं श्री राधिका से एक पल को भी नहीं बिछुड़ सकता।

  11. ईश्वर ताई कुंवरि मै - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (7)

    श्री धाम वृंदावन के नित्य विहार में ईश्वरत्व श्री राधा में है और दासत्व श्री कृष्ण में है । श्री राधा सदा अपनी कृपा दृष्टि डालकर श्री कृष्ण को निहाल करती रहती हैं ।

  12. कुंवर लली वृषभान की मेरे जीवन प्रान - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (22)

    श्री वृषभानु कुँवरी श्री राधा ही मेरे जीवन की प्राण हैं । मैं इस वृंदावन धाम की शपथ ग्रहण कर कहता हूँ कि उनके अतिरिक्त मेरे ह्रदय में अन्य कोई नहीं निवास करता ।

  13. श्री ललिता हरिवंश वपु - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (16)

    श्री वंशी अलि जी के अनुसार स्वयं श्री ललिता जी ही श्री हित हरिवंश के स्वरूप में कुँवरि श्री राधा की चरण माधुरी को विश्व में प्रकाशित करने हेतु इस धरा पर प्रकट हुई थी।

  14. नयन ही में नयन रहें हिय में हियो समाय - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (8)

    श्री राधा के नयनों से श्री कृष्ण के नयन मिलते रहें, ह्रदय में ह्रदय समाया हो, भुजाओं से भुजाएँ लिपटी हों—बस यही (नित्य विहार) रस ह्रदय को भाता है।

  15. राधा चेरी हों सखी मेरे मन नहिं आन - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (33)

    हे सखी, मैं श्री राधा की ही अनन्य दासी हूँ, मेरे मन में श्री राधा के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री राधा के निज जन की सब प्रकार से केवल श्री राधा ही हैं।

  16. नरक परन आछो लगे कुंवरि चरन के हेत - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (26)

    यदि श्री राधा के चरणों का संग प्राप्त हो, तो नरक का वास भी मुझे प्रिय होगा। परंतु उनके चरणों के बिना, चाहे मुझे सुंदर निकुंज का वास ही क्यों न मिल जाए, ऐसा निकुंज मुझे एक क्षण के लिए भी स्वीकार नहीं।

  17. लालन सोई प्रिया पद गुरु सोई प्रिया उपास - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (24)

    मैं उन श्री लाल जी (श्री कृष्ण) को ही जानता हूँ जो श्री राधा के चरणों के अनन्य दास हैं, और उन गुरुदेव को ही जानता हूँ जो श्री राधा की अनन्य उपासना करे एवं करावे। इन पर ही मेरा दृढ़ विश्वास है, इनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को स्वप्न में भी नहीं जानता।