सब तजि कीजिये सतसंग भक्ति - श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा (31)
अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के अटूट व अखंड प्रेम को दिलाने वाला है।
श्री किशोरी अलि बरसाना में श्री राधारानी के दर्शन एवं कृपा प्राप्त कर गह्वर वन में ही नित्य निवास करते थे । इनके गुरु श्री वंशी अली जी थे जिन्होंने ललित संप्रदाय की स्थापना की थी।
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अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के अटूट व अखंड प्रेम को दिलाने वाला है।
अनेक महापुरुषों का यह मत है कि व्रज में किसी वृक्ष, लता, तृण अथवा अन्य रूप में जन्म प्राप्त होना अथवा वास करना यह तो महान सौभाग्य की बात है ही, तथापि, रसिकों की दृढ़ मान्यता यह भी है कि उनकी इस भौतिक देह का विसर्जन भी इसी चिन्मय व्रज-रज के अंक में ही संपन्न होना चाहिए।
श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं— हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं।
श्री राधा का मुखमण्डल अत्यन्त सुन्दर तथा चन्द्रमा के समान मनोहर है। वे परम चतुर, विवेकशील और सुजान हैं। समस्त स्त्रियों में वे शिरोमणि हैं तथा अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के प्राणों की भी प्राणस्वरूपा हैं।
श्री अलि किशोरी जी कहते हैं कि हमारी सामर्थ्य तो केवल इतनी ही है कि हम किसी प्रकार अपने इस चंचल मन को स्वामिनी श्री राधा प्यारी में लगाने का प्रयास करते हैं; परन्तु हमारी लाड़ली जू इतनी परम करुणामयी और वात्सल्यमयी हैं कि वे हमारे इस लघु प्रयास पर ही रीझकर, अत्यंत प्रेमपूर्वक हमें अपने श्रीकंठ (गले) से लगा लेती हैं।
वृषभानु दुलारी श्रीराधा और नंदनंदन श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की जय-जयकार हो, जो रसिक जनों के मन को निरंतर प्रेम-रस में रंगते रहते हैं।
मेरा मन वृषभानु की दुलारी, श्री राधा में रम गया है। वे माता कीर्ति के कुल का गौरव बढ़ाने वाली, समस्त दुखों का नाश करने वाली और श्रेष्ठ बरसाने में वास करने वाली हैं। वे गौर वर्ण की हैं और भोली छवि वाली हैं जो सदा किशोर अवस्था में रहती हैं, जिनकी टेढ़ी भौंहें और तीखे नेत्र अत्यंत चित्ताकर्षक हैं।
गोस्वामी श्री हित हरिवंश जी ने भी अपने एक पद में उद्घोष किया है कि जब तक जीव श्री वृन्दावन की दिव्य रज का सेवन (आश्रय) नहीं करता, तब तक उसे दिव्य और शाश्वत सुख की प्राप्ति संभव नहीं है।
श्री हित हरिवंश गोस्वामी जी के बिना श्री राधा की अनन्य और अंतरंग उपासना का वास्तविक रहस्य कौन जान सकता है? और श्री स्वामी हरिदास जी के बिना युगल-स्वरूप को नित्य हृदय में धारण करने की सामर्थ्य किसमें है?
हे बिहारी जी! आप अनोखे बाँके हैं। विविध प्रकार के अनोखे ख्याल लीलाएँ करते-करते कहीं मुझे धोखे में भूल तो नहीं गए?
सांसारिक सुखों को त्यागकर ऐसा प्रयत्न करो कि रसिकों की राजधानी श्रीधाम वृंदावन में रसिकों के संग वास मिल जाए। फिर वहाँ की लताओं-पाताओं के मध्य विराजित श्री श्यामा-श्याम की लीलाओं का नेत्र भरकर अवलोकन करो।
जिन-जिन अपराधी जीवों ने सिर झुकाकर और रसना से आपका नाम उच्चारित किया, उन्हें आपने अपने निज परिकर में स्थान देकर अपनी सेवा का अधिकारी बना लिया।
पुरी, मधुपुरी (मथुरा) और द्वारका आदि जितने भी पवित्र तीर्थ स्थल हैं, ये सब प्रभु के चरणचिह्नों से पावन माने जाते हैं। परंतु यह वृन्दावन धाम साक्षात रस (प्रेम-रस) से अंकित है, इसी कारण इसे रसधाम भी कहते हैं।
हे परम सिरताज श्रीराधे! तुम्हारे दर्शन की उत्कंठा मेरे हृदय में अत्यंत तीव्र हो गई है। अब दया कर मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि अवश्य ही डालो!
श्री राधा प्राणों से भी अधिक प्रिय, प्राणों की स्वामिनी, अत्यंत लाड़ली एवं सदा सुकुमार अवस्था वाली हैं। लाड़ली जी ‘अलक लड़ैती’ (लाड़ लड़ाने योग्य) हैं, एवं परम उदारता एवं करुणा की साक्षात मूर्ति हैं ।
हम तो केवल नाम के भक्त हैं। रसिक संतों की संगति को त्यागकर, हम संसार और बिमुखों की ओर ही भागते रहे। [1]
श्री राधा, जो श्रीकृष्ण की गुरु हैं, परम ज्योति स्वरूपा हैं, बहु-प्रशंसित हैं, यमुना तट पर विहार करती हैं, जो कृष्णस्वरूप की सार हैं, जिनकी दीर्घ भुजाएँ श्रीकृष्ण के गले में आलिंगनबद्ध हैं — वही कृष्णप्रिया श्री राधा मेरे हृदय में सदा वास करें।
श्रीराधा का रूप-सौंदर्य ऐसा है कि साक्षात रूप भी उनके अनुपम रूप-सौंदर्य की तुलना में फीका लगता है। वे समस्त संसार को उज्ज्वल करने वाली तथा जगजीवन श्रीकृष्णचंद्र की महारानी हैं। उनका रूप प्रतिक्षण वर्धमान है, जिनके अंगों को निहारकर नेत्र कभी तृप्त नहीं होते।
श्री राधा परम आनंद की स्वरूपा हैं, जो मन का हरण करने वाली और सुख की अनंत रसधारा हैं। वे अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय में रस की तरंगें उत्पन्न करती हैं और उनके हृदय में सदा निवास करती हैं।
मेरी स्वामिनी, ललित छवि वाली श्री राधा हैं जो अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ वृंदावन के कुंजों में बाँह में बाँह डालकर विहार करती हैं ।