नैन बैन मन श्रवण सब - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (16)
विरहाकुल गोपी के नेत्र, वाणी, मन एवं कर्ण प्रियतम श्यामसुंदर के पास ही चली गई हैं। उनके शरीर-रूपी घट में केवल थोड़े-से प्राण ही इस आशा से शेष हैं कि प्रियतम पुनः लौटकर आएँगे।
श्री नंददास पुष्टिमार्ग या वल्लभ सम्प्रदाय के अष्टछाप कवि थे ।
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विरहाकुल गोपी के नेत्र, वाणी, मन एवं कर्ण प्रियतम श्यामसुंदर के पास ही चली गई हैं। उनके शरीर-रूपी घट में केवल थोड़े-से प्राण ही इस आशा से शेष हैं कि प्रियतम पुनः लौटकर आएँगे।
इस पद में सखियाँ श्री राधा की सुंदरता और उनके प्रति श्री कृष्ण के समर्पण का वर्णन करती हुई कहती हैं कि हे सखी! तेरी सहज मनमोहक मुस्कान ने श्री कृष्ण को मोह लिया है। सारा संसार जिनका यश गाता है, वे श्री कृष्ण अब तुम्हारे अधीन हैं।
इस जगत में रूप (सौंदर्य), प्रेम, आनंद और रस के रूप में जो कुछ भी दिखाई देता है, उन सब के आधार श्री गिरधर देव (श्री कृष्ण) हैं। इसलिए मैं निडर होकर, बिना किसी संकोच के, उन्हीं श्री कृष्ण के स्वरूप का वर्णन करता हूँ।
हे सखी! नील मेघ सदृश कोई छबीली रूप-मूर्ति (श्री कृष्ण) इस वृन्दावन में क्रीड़ा कर रही है। उनके अंग-अंग पर विविध आभूषण सुशोभित हैं, अधरों पर मधुर बंसी विराजमान है, और उनकी परछाईं तक की शोभा भी मन को मोहित कर लेती है।
गोपियों के निष्काम प्रेम के प्रभाव एवं कृपा प्रसाद से आज उद्धव जैसे ब्रह्मज्ञानी भी, ज्ञान/योग की सब दुविधाएँ मिटाकर, प्रेम-मार्गी रसिक हो गए।
ब्रह्मज्ञानी उद्धव भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं — “हे प्रभु! अब मैं सदा-सदा के लिए ब्रज का कोई वृक्ष, लता या वेलि बनकर ब्रज में ही रहना चाहता हूँ, ताकि जब ये प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ इधर-उधर विचरण करें, तो उनकी छाया स्वाभाविक रूप से मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ।”
ब्रह्मज्ञानी उद्धव कहते हैं—“हे प्रभु! अब मैं सदा के लिए ब्रज में ही ब्रज की रज बनकर वास करना चाहता हूँ, ताकि जब यह प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ विचरण करें, तो उनके चरणों की धूल मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ। यही मेरे जीवन का परम आधार है।”
सुंदर श्री वृंदावन धाम का नित्य नवीन यमुना पुलिन अत्यंत मनोहर है, जहाँ गोवर्धन को धारण करने वाले नवल श्यामसुंदर विराजमान हैं।
यमुना के तट पर, बंसीवट की शीतल छाया में, बांसुरी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। रसिक श्रीकृष्णचंद्र ने वन में रास लीला का दिव्य आयोजन रचा है।
श्री कृष्ण नंद भवन के भूषण हैं, यशोदा के प्यारे लाल हैं, वीर बलराम के भाई हैं और श्री राधा को सुख देने वाले हैं।
भक्तों पर श्री यमुना जी विशेष कृपा करती हैं।
हे नंदनंदन,श्री कृष्ण! यदि आप मुझपर करुणा करना चाहते हैं तो मुझे अपने निज भक्तों के चरणों का रस अनुराग प्रदान कीजिए ।
अनंत कोटि ब्रह्मांड के कण कण में ब्रह्म स्वरूप से व्याप्त, मन को मोहने वाले श्री कृष्ण चन्द्र की रूप माधुरी ऐसी है जिसका वर्णन शब्दों में करना असंभव है।
यद्यपि वेद कहता है कि कमलनयन श्रीहरि शाश्वत रूप से किशोर अवस्था में ही विराजमान रहते हैं, तथापि ब्रजवासियों को बाल्य और पौगंड आदि समस्त अवस्थाओं का सुख प्रदान करने हेतु ही वे ब्रज में प्रकट हुए।
नंदनंदन श्री कृष्ण, जो घनीभूत आनंदस्वरूप हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है। वे रस के सागर, रस के मूल कारण तथा रसिक भक्तों के प्राणाधार हैं।
यदि पर्वत रुचिकर हो तो श्रीगोवर्धन में निवास करो, यदि ग्राम रुचिकर हो तो नंदगाँव में निवास करो।
जैसे जलचर जल में रहते हुए जल-वियोग की पीड़ा से अनभिज्ञ रहता है, परंतु उससे पृथक होते ही उसकी वेदना का अनुभव करता है, वैसे ही प्रभु-वियोग की वास्तविक पीड़ा वही जान सकता है जिसे उनके संयोग का साक्षात् अनुभव हुआ हो।
ब्रजांगनाओं के चरण-कमलों की रज की अभिलाषा स्वयं ब्रह्मा जी भी करते हैं, और उद्धव भी अपनी विशुद्ध बुद्धि से बार-बार उसी दिव्य रज की कामना करते हैं।
यदि किसी जीव के मन में घर-परिवार, जन-सम्पत्ति या वैभव का अभिमान उत्पन्न हो जाए, तो उसे स्मरण करना चाहिए कि स्वर्ग के सम्राट इंद्र का गर्व भी भगवान कृष्ण ने क्षणभर में धूल में मिला दिया था। अतः अहंकार का त्याग ही कल्याण का मार्ग है।
श्री राधा और श्री कृष्ण दोनों ने अपनी बेसर (नथ) पर दांव लगाया और ललिता जू से पूछा, "किसकी नथ अधिक सुंदर है?"