नंददास ग्रंथावली

नंददास ग्रंथावली वल्लभ संप्रदाय के अष्टाछाप कवि श्री नंददास जी द्वारा लिखित ग्रंथ है। लेखक: श्री नंददास जी

38 लेख उपलब्ध हैं

  1. अरी तेरी सहज की मुसिक्यान - श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (68)

    इस पद में सखियाँ श्री राधा की सुंदरता और उनके प्रति श्री कृष्ण के समर्पण का वर्णन करती हुई कहती हैं कि हे सखी! तेरी सहज मनमोहक मुस्कान ने श्री कृष्ण को मोह लिया है। सारा संसार जिनका यश गाता है, वे श्री कृष्ण अब तुम्हारे अधीन हैं।

  2. रूप प्रेम आनंद रस जो कछु जग मैं आहि - नंद दास ग्रंथावली, रस मंजरी (7)

    इस जगत में रूप (सौंदर्य), प्रेम, आनंद और रस के रूप में जो कुछ भी दिखाई देता है, उन सब के आधार श्री गिरधर देव (श्री कृष्ण) हैं। इसलिए मैं निडर होकर, बिना किसी संकोच के, उन्हीं श्री कृष्ण के स्वरूप का वर्णन करता हूँ।

  3. छबीले नील घन की पूतरी - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली

    हे सखी! नील मेघ सदृश कोई छबीली रूप-मूर्ति (श्री कृष्ण) इस वृन्दावन में क्रीड़ा कर रही है। उनके अंग-अंग पर विविध आभूषण सुशोभित हैं, अधरों पर मधुर बंसी विराजमान है, और उनकी परछाईं तक की शोभा भी मन को मोहित कर लेती है।

  4. गोपी प्रेम प्रसाद सो, हौ ही सीख्यौ आय - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (68.2)

    गोपियों के निष्काम प्रेम के प्रभाव एवं कृपा प्रसाद से आज उद्धव जैसे ब्रह्मज्ञानी भी, ज्ञान/योग की सब दुविधाएँ मिटाकर, प्रेम-मार्गी रसिक हो गए।

  5. कै ह्वै रहौं द्रुम गुल्म लता बेली बन माहीं - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (67.1)

    ब्रह्मज्ञानी उद्धव भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं — “हे प्रभु! अब मैं सदा-सदा के लिए ब्रज का कोई वृक्ष, लता या वेलि बनकर ब्रज में ही रहना चाहता हूँ, ताकि जब ये प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ इधर-उधर विचरण करें, तो उनकी छाया स्वाभाविक रूप से मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ।”

  6. अब रहिहौं ब्रजभूमि की ह्वै पगमारग धूरि - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (66.2)

    ब्रह्मज्ञानी उद्धव कहते हैं—“हे प्रभु! अब मैं सदा के लिए ब्रज में ही ब्रज की रज बनकर वास करना चाहता हूँ, ताकि जब यह प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ विचरण करें, तो उनके चरणों की धूल मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ। यही मेरे जीवन का परम आधार है।”

  7. वृंदावन बंसीवट जमुनातट बंसी रट - श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (122)

    यमुना के तट पर, बंसीवट की शीतल छाया में, बांसुरी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। रसिक श्रीकृष्णचंद्र ने वन में रास लीला का दिव्य आयोजन रचा है।

  8. नंददास सौं नंदसुवन, जौ करुना कीजै - श्री नंददास ग्रंथावली, श्री कृष्ण सिद्धान्त पंचाध्यायी (138)

    हे नंदनंदन,श्री कृष्ण! यदि आप मुझपर करुणा करना चाहते हैं तो मुझे अपने निज भक्तों के चरणों का रस अनुराग प्रदान कीजिए ।

  9. मोहन अद्भुत रूप कहि न आवत छबि ताकी - श्री नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (34)

    अनंत कोटि ब्रह्मांड के कण कण में ब्रह्म स्वरूप से व्याप्त, मन को मोहने वाले श्री कृष्ण चन्द्र की रूप माधुरी ऐसी है जिसका वर्णन शब्दों में करना असंभव है।

  10. जद्यपि नित्य किसोर हरि - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भाषा दशम स्कंध (5.2)

    यद्यपि वेद कहता है कि कमलनयन श्रीहरि शाश्वत रूप से किशोर अवस्था में ही विराजमान रहते हैं, तथापि ब्रजवासियों को बाल्य और पौगंड आदि समस्त अवस्थाओं का सुख प्रदान करने हेतु ही वे ब्रज में प्रकट हुए।

  11. जलचर ज्यों जलभीर मै जानत नाहिन पीर - श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (30)

    जैसे जलचर जल में रहते हुए जल-वियोग की पीड़ा से अनभिज्ञ रहता है, परंतु उससे पृथक होते ही उसकी वेदना का अनुभव करता है, वैसे ही प्रभु-वियोग की वास्तविक पीड़ा वही जान सकता है जिसे उनके संयोग का साक्षात् अनुभव हुआ हो।

  12. पुनि तिनकी पद-पंकज-रज - श्री नंददास ग्रंथावली, श्री कृष्ण सिद्धान्त पंचाध्यायी (42)

    ब्रजांगनाओं के चरण-कमलों की रज की अभिलाषा स्वयं ब्रह्मा जी भी करते हैं, और उद्धव भी अपनी विशुद्ध बुद्धि से बार-बार उसी दिव्य रज की कामना करते हैं।

  13. गर्व करो जिनि भूलि कोउ - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भाषा दशम स्कंध (17.18)

    यदि किसी जीव के मन में घर-परिवार, जन-सम्पत्ति या वैभव का अभिमान उत्पन्न हो जाए, तो उसे स्मरण करना चाहिए कि स्वर्ग के सम्राट इंद्र का गर्व भी भगवान कृष्ण ने क्षणभर में धूल में मिला दिया था। अतः अहंकार का त्याग ही कल्याण का मार्ग है।

  14. देवन में श्री रमारमन नारायन प्रभु जस - श्री नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (23)

    जैसे देवताओं में श्री रमा रमण (लक्ष्मीपति) भगवान नारायण का यश सर्वोपरि है, वैसे ही समस्त वनों में सर्वोपरि श्री वृन्दावन धाम है, जो सदा-सर्वदा दिव्य शोभा से सुशोभित रहता है।