श्री नारायण स्वामी

श्री नारायण स्वामी वृंदावन के प्रसिद्ध रसिक संत हैं, जो "अनुराग रस" एवं "ब्रज विहार" के रचैता हैं।

159 लेख उपलब्ध हैं

  1. हम न भये व्रज में प्रगट - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (07)

    यद्यपि व्रजभूमि की पावन रज में जन्म लेने का सौभाग्य मुझे प्राप्त न हो सका, तथापि अब मेरे हृदय की एकमात्र अभिलाषा यही है कि श्रीधाम वृन्दावन का मैं अखंड वास करूँ तथा नित्य-प्रति श्री राधा-कृष्ण की मनोहर युगल छवि का दर्शन एवं चिंतन करते हुए अपना जीवन कृतार्थ करूँ।

  2. प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)

    हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ।

  3. नारायण दुख सुख उभै - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (101)

    सुख और दुख जीवन में दिन और रात के चक्र की भाँति बिना बुलाए आते-जाते रहते हैं। इसलिए विवेकी मनुष्य को इन दोनों ही परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना चाहिए और विचलित हुए बिना धैर्यपूर्वक अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

  4. प्राणनाथ या जगत में सो अभागिनी नार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, रास पंचाध्यायी लीला (11)

    एक गोपी कहती है—हे प्राणनाथ (श्री कृष्ण)! इस संसार में वह स्त्री (अथवा जीव-रूपी नारी) अत्यंत अभागिनी है, जो आपको त्यागकर पुनः सांसारिक कुटुंब और परिवार के सुखों की चाहना करती है।

  5. मन लाग्यो सुख भोग में तरन चहै संसार - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (51)

    श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि यदि मन भोग-विलास के सुखों में ही लगा हुआ है, दिन-रात उसी से आसक्ति बनी हुई है और पुन: संसार-सागर से तरना भी चाहे, तो ऐसा कैसे संभव हो सकता है?

  6. प्रेम खेल सबसों कठिन खेलत कोउ सुजान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (151)

    प्रेम का खेल सबसे कठिन है, जिसे कोई सच्चा सुजान ही खेल सकता है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिसने स्वयं भगवद् प्रेम-मार्ग का अनुभव ही नहीं किया, वह प्रेम की सच्ची महिमा, उसकी पहचान एवं उसका स्वरूप कभी समझ ही नहीं सकता।

  7. गुण गावै गोपाल के भरि लावै दृग नीर - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (171)

    गोपाल के गुणों का कीर्तन करते-करते आँखें आँसुओं से भर जानी चाहिए — यही सच्ची भक्ति की पहचान है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जब तक बलराम के भैया श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं हो जाते, तब तक उनका हृदय एक क्षण के लिए भी शांत नहीं होगा।

  8. रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (137)

    दिव्य प्रेम रूपी परम धाम की ओर ले जाने वाला यह संकीर्ण पथ अत्यंत कठिन है। इसमें चलने वालों को विश्राम केवल विकलता, मूर्छा या रुदन-सिसकियों के क्षणों में ही प्राप्त होता है।

  9. सघन बन झूलें दोऊ सुकुमार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24)

    वृंदावन के हरे-भरे, सघन वन में युगल किशोरी श्री राधा-कृष्ण एक संग झूला झूल रहे हैं। उनके हृदय हर्षोन्माद से भरे हुए हैं, वे बार-बार एक-दूसरे की छवि निहार रहे हैं, और प्रत्येक क्षण उनका प्रेम और अधिक बढ़ता जा रहा है।

  10. पंकज विषधर मीन मृग - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (94)

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! कमल, सर्प, मछली, मृग, बाण, खंजन पक्षी और बादाम — ये सब तुम्हारी आँखों के बिना मूल्य के गुलाम हैं, क्योंकि तुम्हारे नेत्रों की अनुपम छवि ने इनकी शोभा को अर्थहीन कर दिया है।

  11. रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (78)

    यदि किसी जीव की न तो रक्षा की और न ही उसे आदर-सत्कार दिया, तो ऐसे पुरुष से श्रेष्ठ तो वह वृक्ष है, जो जीवों को निष्काम भाव से छाया और फल प्रदान करता है।

  12. मोहि मति रोकै री तू एरी ब्रज नागरी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)

    जब श्री कृष्ण माननी श्री राधा से मिलने पहुंचते हैं तो श्री राधा की एक सखी उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक देती हैं ।

  13. गुण मन्दिर सुंदर युगल मंगल मोदनिधान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (184)

    युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) समस्त गुणों के मंदिर हैं और मंगल तथा आनंद के मूल स्रोत हैं। श्री नारायण स्वामी प्रार्थना करते हैं, "हे परम कृपालु युगल वर! कृपा कर मुझे अपने चरण कमलों में प्रेम रूपी अमूल्य वरदान प्रदान करें।"

  14. निरख निरख शोभा हर्ष - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (93)

    श्री राधा की अद्भुत रूप माधुरी को निहार कर श्री कृष्ण के हृदय को अपार आनंद होता है । तब माननी श्री राधा को मनाने के लिए वे अत्यंत विनम्र होकर, डरते-डरते श्री राधा से विनती करने लगते हैं। ऐसी सर्वोच्च स्वामिनी, वृंदावन की अधिष्ठात्री किशोरीजी की जय हो!

  15. साँवरे क्यों मोसों रिस मानी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (8)

    हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ।

  16. प्यारी जी तिहारे बिन कल न परत है - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (16)

    हे प्यारी जू [श्री राधा], आपके बिना मुझे एक क्षण को भई चैन चैन नहीं मिलता। मंदिर, अटारी, सुंदर चित्रों से सजी फुलवारी—इनमें से कोई भी मुझे प्रिय नहीं लगता।

  17. नारायण जब अंत में, यम पकड़ेंगे बाँह - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (49)

    नारायण स्वामी जी ऐसे जीवों को सावधान करते हुए कहते हैं, “जो अपने सांसारिक कार्यों को भजन से अधिक महत्ता देते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि जब तुम्हारा अंतिम समय आएगा और यमराज तुम्हारी बाँह पकड़ेंगे, तब उनसे भी यही कहना कि ‘अभी मुझे फ़ुरसत नहीं है।’ तब देखना, क्या वे तेरी यह बात सुनेंगे?”