नाहीं द्वैताद्वैत हरि - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (6)
श्री कृष्ण न तो द्वैताद्वैत सिद्धांत में बंधे हैं न विशिष्टाद्वैत में, वे तो परम स्वतंत्र हैं, अपनी इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं।
निर्विरोध मनरंजन, श्री भागवत रसिक देव जू की वाणी का तृतीय अध्याय है । रचयिता : श्री भागवत रसिक देव जी
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श्री कृष्ण न तो द्वैताद्वैत सिद्धांत में बंधे हैं न विशिष्टाद्वैत में, वे तो परम स्वतंत्र हैं, अपनी इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं।
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि रसिक भक्त अपने इष्टदेव के प्रति अनन्य होता है, इसी कारण वह अद्भुत रस का आस्वादन करता है। श्यामाश्याम के नित्यबिहार रस में खोए हुए उस रसिक को काल भी नहीं काट सकता।
साधारण साधक को वृन्दावन वास करने में मक्खी, मच्छर, भिखारी, चूहे, बंदर, चोर, काँटे, दीमक, जीविका और रहने के लिए स्थान की समस्या - ये दस घोर दुःख सताते हैं।
गुहस्थ हो या विरक्त, स्वामी हो या सेवक, जिसका मन जहां आसक्त है बस वो उसके ही पास रहता है । यदि कोई सांसारिक विषय में आसक्त है तो उस (संत, महात्मा, सेवक, विरक्त, ग्रहस्त आदि कोई हो) की माहात्म की गाथाएँ केवल कहने भर की ही हैं, परंतु माना तो वह विषयी ही जाएगा ।
एक समझदार एवं रसपरक भामिनी (पत्नी) अपने पति को प्रेमविहीन एवं बहिरंग साधन प्रधान संप्रदाय में दीक्षित देखकर कहती है कि जैसे एक अंधे के पीछे अंधा चलता है, जैसे एक नकटे के बहकावे में आकर दूसरा नाकदार भी अपनी नाक कटवाकर नकटा बन जाता है, ऐसे नकटों के से ये पंथ हैं ।
जो ग्यारह मासे भर (शुद्ध चाँदी) का बना है (अर्थात् रूपया, धन) वही सारे संसार का गुरु है, सब उसी धन के चेले चपाटे हैं ।
भाग्य में जो कुछ दुःख सुख लिखा है वह इस शरीर के साथ जुड़ा है। तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, वहीं वह भोगना पड़ेगा यह सिद्धांत अटल है।
जिस मनुष्य को इस संसार में सर्वत्र राधा कृष्ण की झलक दिखाई देती है, केवल उसे ही मरने के बाद दिव्य वृन्दावन में राधा कृष्ण का साक्षात्कार होता है । इस भ्रम में मत रहना कि उनकी भक्ति एवं साक्षात्कार किये बिना, मरने पर कुछ मिल जायेगा ।
उपदेशक (पंडित, संत, महंत, गुसाईं, परमहंस आदि ) - दूसरों को जो शिक्षा देते हैं, उस पर स्वयं अमल नहीं करते। संसार की होशियारी (मूर्खता) तो देखिये कि यह जान बुझकर अपने आप को धोखा देता रहता है ।
किसी ने स्वकीया आरै परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है।भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्रिया जी यानी यह रसिकों की जोड़ी एक क्षण को भी बिछुड़ नहीं सकती, यह नित्य, अनंत और अनादि है ।
जहाँ श्रीकृष्ण है वही श्रीराधा भी है,और जहाँ श्रीराधा है वही श्रीकृष्ण भी है । ये दोनों एक पल के लिए भी अलग नहीं होते । इस बात को ठीक प्रकार से समझने के बाद ही यह प्रश्न कीजिये ( की श्री बिहारीजी महाराज के साथ श्रीप्रिया प्रकट रूप में क्यों नहीं विराजमान है ।)
श्री भगवत रसिक जी कहते है हम रसिक जन जैसा कुछ गाते है, श्री श्यामाश्याम अनायास वैसा ही करते है और श्री श्यामा श्याम जैसा करते है हम तत्काल उसी की गाकर सुना देते है ।
किसी ने स्वकीया और परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्रिया जी यानी यह रसिकों की जोड़ी एक क्षण को भी बिछुड़ नहीं सकती, यह नित्य, अनंत और अनादि है।
जो व्यक्ति श्री हरि को हृदय-स्थल में विराजमान कर उनकी सच्ची भक्ति करता है और मन को वश में रखकर गुरु की आज्ञा के अनुसार चलता है, उसे संसार की कोई वेदना भोगनी नहीं पड़ती।
जहाँ श्री कृष्ण हैं वहीँ श्री राधा हैं, और जहाँ श्री राधा हैं वहीँ श्री कृष्ण हैं, यह दोनों एक पल के लिए भी अलग नहीं होते, इस बात को ठीक से जान कर ही प्रश्न करो कि श्री बांके बिहारी जी के साथ श्री राधारानी क्यों नहीं प्रकट रूप में विराजमान हैं |
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में सखी और लाड़ली लाल के परस्पर प्रेम का वर्णन है। जो सखी के मन में भाव आता है, तुरन्त लाड़ली लाल प्रेमवशीभूत होकर वह लीला करते हैं। और जो राधा-कृष्ण लीला करते हैं, वह हम (सखी) तत्काल गान करती हैं।
यह संसार भूत के लड्डू के समान है—जो इसे भोगता है, वह पछताता ही है; और जो नहीं भोगता, वह भी इसकी लालसा में पछताता है। दोनों ही स्थितियों में यह दुःखदायक है क्योंकि यह अनित्य, भ्रमपूर्ण और असली सुख से रहित है।
जिस मनुष्य को इस संसार में सर्वत्र राधा कृष्ण की झलक दिखाई देती है, केवल उसे ही मरने के बाद दिव्य वृन्दावन में राधा कृष्ण का साक्षात्कार होता है। इस भ्रम में मत रहना कि उनकी भक्ति एवं साक्षात्कार किये बिना, मरने पर कुछ मिल जायेगा।