पदावली [श्री रूप माधुरी जी]

पदावली श्री रूप माधुरी जी की वाणी का एक खंड है, जिसमें शुक संप्रदाय के रसिक संत श्री रूप माधुरी शरण जी द्वारा विभिन्न पदों का संकलन किया गया है।

26 लेख उपलब्ध हैं

  1. जय जय जमुना सब सुखकारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)

    सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।

  2. किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (16)

    हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।

  3. दोऊ मगन भये रस होरी में - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (172)

    श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं।

  4. साधो यह विचार मन जांचा है - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

    हे साधकों! यह विचार मैंने मन ही मन बहुत बारीकी से परखा है — जिसने भी भगवान से कुछ माँगा है, उसमें बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। जिसका चित्त श्री हरि के प्रेम में वास्तविक रंगा होता है, उसे विषय-भोग तुच्छ लगते हैं।

  5. मैं तो तेरे दर्शन की हूँ भिखारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)

    मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो।

  6. लगी मेरी मदन मोहन से यारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (136)

    मेरी मदन मोहन (श्रीकृष्ण) से एक अंतरंग यारी बन गई है। उनके टेढ़े मुकुट की लटक मेरे हृदय में ऐसे बस गई है कि अब उनके अतिरिक्त मेरी किसी और से लगन ही नहीं रही।

  7. प्रिया मैं तो हूँ चेरिन की चेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)

    हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।

  8. किशोरी मेरी हरो सकल भव बाधा - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (6)

    हे किशोरी जी (श्री राधा), मेरी समस्त भव-बाधाओं का हरण कीजिए, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ। इस त्रिभुवन में मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ।

  9. श्री बन उज्जवल रस की खान - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (139)

    श्री धाम वृंदावन उज्जवल रस की ख़ान है । यहाँ चारों ओर केवल “श्री राधे” की सुंदर ध्वनि ही सुनायी देती है तथा यमुना जी का जल पीने को प्राप्त है ।

  10. जापै कृपा कर श्रीराधा - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (140)

    जिस पर श्री राधा कृपा करतीं हैं केवल उसे ही श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होता है। श्री वृन्दावन दिव्य एवं अलौकिक है, यहाँ की भूमि सुहावनी है, जो युगल दम्पति श्री श्यामाश्याम का निज धाम कहलाता है।

  11. किशोरी मेरी जीवन प्रान अधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (106)

    हे किशोरीजू [श्री राधा]! तुम ही मेरे जीवन की एकमात्र आधार हो। आपके अतिरिक्त अन्य किसी और से मेरा कोई वास्ता नहीं; आप मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं ।

  12. किशोरी राखो शरण गहे की लाज - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (120)

    हे किशोरी जी! तुम्हारी शरण में आए हुए इस जीव की लाज अब तुम्हारे ही हाथ है। हे रसिकन की सिरताज! अब आपके दर्शन के बिना मेरा मन कहीं नहीं लगता ।