किशोरी तोरी किरपा को आधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (118)
हे किशोरी जी (श्री राधा)! मेरे जीवन का एकमात्र आधार आपकी अहैतुकी कृपा ही है; मैं प्रतिपल इसी आस में आपकी बाट जोहता हूँ कि कब आपके अपार रूप-सौंदर्य के दर्शन होंगे।
पदावली श्री रूप माधुरी जी की वाणी का एक खंड है, जिसमें शुक संप्रदाय के रसिक संत श्री रूप माधुरी शरण जी द्वारा विभिन्न पदों का संकलन किया गया है।
28 लेख उपलब्ध हैं
हे किशोरी जी (श्री राधा)! मेरे जीवन का एकमात्र आधार आपकी अहैतुकी कृपा ही है; मैं प्रतिपल इसी आस में आपकी बाट जोहता हूँ कि कब आपके अपार रूप-सौंदर्य के दर्शन होंगे।
हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।
श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं।
राधेकृष्ण का नाम निरन्तर बोलो। संसार के व्यर्थ वाद-विवाद से मुख मोड़ लो और हरि की चर्चा में अपना मुख खोलो।
हे श्यामा जू, मुझे केवल आपके श्री चरण-कमलों का ही आसरा है। इसी कारण अब मैं निश्चिन्त हूँ, जन्म-मरण का अब कोई भय नहीं।
हे साधकों! यह विचार मैंने मन ही मन बहुत बारीकी से परखा है — जिसने भी भगवान से कुछ माँगा है, उसमें बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। जिसका चित्त श्री हरि के प्रेम में वास्तविक रंगा होता है, उसे विषय-भोग तुच्छ लगते हैं।
मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो।
अब मेरी सुरत (चेतना) रस में रम गई है । राधा-कृष्ण की युगल छवि मेरे नेत्रों में समा गई है और मेरा हृदय उनके प्रेम की डोरी में बँध गया है।
हे युगल सरकार! आप सब कुछ जानते हैं। कृपया मुझे वृंदावन वास वरदान कीजिए, क्योंकि मेरे हृदय को अब और कुछ भी नहीं भाता है ।
मेरी मदन मोहन (श्रीकृष्ण) से एक अंतरंग यारी बन गई है। उनके टेढ़े मुकुट की लटक मेरे हृदय में ऐसे बस गई है कि अब उनके अतिरिक्त मेरी किसी और से लगन ही नहीं रही।
हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।
हे किशोरी श्री राधा! आप तो परम उदार हैं। जो भी आपके नाम का गान करता है, वह असीम आनंद को प्राप्त करता है।
हे किशोरी जी, मेरी विनती को शीघ्र सुनिए। मैं चाहे जितना भी प्रयत्न कर लूँ, लेकिन करोड़ों जन्मों में भी मेरे पाप नहीं मिटेंगे।
हे किशोरी जी (श्री राधा), मेरी समस्त भव-बाधाओं का हरण कीजिए, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ। इस त्रिभुवन में मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ।
हे किशोरी जी (श्री राधा)! मुझे वृंदावन का सदा वास प्रदान कीजिए! मेरी यही आशा है कि रसिक संतों के चरणों में मेरी प्रीति सदा बनी रहे ।
श्री धाम वृंदावन उज्जवल रस की ख़ान है । यहाँ चारों ओर केवल “श्री राधे” की सुंदर ध्वनि ही सुनायी देती है तथा यमुना जी का जल पीने को प्राप्त है ।
जिस पर श्री राधा कृपा करतीं हैं केवल उसे ही श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होता है। श्री वृन्दावन दिव्य एवं अलौकिक है, यहाँ की भूमि सुहावनी है, जो युगल दम्पति श्री श्यामाश्याम का निज धाम कहलाता है।
हे राधारानी मेरी लाज तो आपके हाथ है । हे सुख स्वरूपा श्यामा जू! तुम्हारे अतिरिक्त मुझे और कोई नहीं भाता ! [1]