प्रेम रस मदिरा

प्रेम रस मदिरा, श्री राधा कृष्ण की लीलाओं, भक्ति दर्शन, भक्ति गीतों की 1008 पदों की काव्य रचना, जिसे इक्कीस माधुरी में विभाजित किया गया है। लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

139 लेख उपलब्ध हैं

  1. मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

    मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।

  2. सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)

    एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी ! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गुलाल उड़ा कि जड़-चेतन सब लाल हो गये।

  3. कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)

    एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?

  4. रास-रस रसिक रँगीली राधा - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)

    श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।

  5. श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (46)

    श्री राधा जू के दरबार में अधाधुंध (बेहिसाब) कृपा बरसती है। जिन ब्रज की वनचारी स्त्रियों का आचरण संसार की दृष्टि में निंदनीय और व्यभिचारी कहा जाता है क्योंकि वे पति के घर में रहते हुए भी, श्रीकृष्ण को (उन्हें पूर्ण ब्रह्म रूप में न जानते हुए भी) परपुरुष मानकर अनन्य प्रेम करती थीं, उन्हीं गोपिकाओं को श्री राधा ने अपनी निज-सहचरियाँ बना लिया।

  6. हम भूखे ब्रज की गारी के - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (132)

    भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ।

  7. श्री श्यामा जू को श्याम पलोटत पाम - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (49)

    श्री श्यामा जू (श्री राधा) के चरण कमलों को श्यामसुन्दर दबाया करते हैं । जिन्हें वेदों ने पूर्णकाम सच्चिदानंद ब्रह्म बताया है, वही ब्रह्म नन्दनन्दन बनकर अवतीर्ण हुए हैं ।

  8. संत जन बारह मास बसंत - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (103)

    संत महात्माओं के पास बारहों महीने बसन्त का निवास रहता है । संत लोग बसन्तकालीन कोयल की कूक के समान अत्यन्त प्रेम भरी ध्वनि में निरन्तर ‘पिउ’ ‘पिउ’ ऐसा कहा करते हैं ।

  9. धरु उन स्वामिनी को ध्यान रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (19)

    अरे मन! तू उन वृषभानुनंदिनी स्वामिनी का ध्यान कर, जिनकी नखमणि चन्द्रिका का ध्यान स्वयं श्यामसुन्दर करते हैं ।

  10. रहु श्री बरसाने गाम रे - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (90)

    अरे मन! चलकर श्री बरसाने ग्राम में निवास कर, जहाँ पूर्णब्रह्म घनश्याम भी अपने मुकुट से झाड़ू लगाया करते हैं।

  11. वृषभानु ललिहिं उर आनिये - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44)

    श्री वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) को ही अपने हृदय में बसाओ । विकर्मों द्वारा नरक, सुकर्म द्वारा स्वर्ग एवं ज्ञान द्वारा मोक्षादि की व्यर्थ ही खाक क्यों छान रहे हो ?

  12. मेरो मन गौर चरण अनुराग्यो - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (79)

    मेरा मन तो किशोरी जी के चरणों में अनुरक्त हो गया है। मैं अनादि काल से मोह की नींद में सो रहा था, रसिकों ने मुझे जगा दिया है।

  13. रहो रे मन गौर चरन लव लाई - श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (91)

    रे मन! तू भी वृषभानुनंदिनी श्री राधिका जू के उन कमल-कोमल-युगल-अरुण चरणों से प्रेम कर, जिन चरणों की चरण-धूलि का ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी सेवन करते हैं ।

  14. बार कत करति हमारिहिं बार - श्री कृपालु जी, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (73)

    हे श्री राधे! हमारी ही बार इतनी देर क्यों कर रही हो? तुम तो अपने सरल-स्वभाव-वश ‘राधे’ नाम सुनते ही अति अधीर होकर पतितों के पास आ जाया करती हो ।

  15. कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, मान माधुरी (28)

    हाय ! हाय !! किशोरी जी के बिना अब तो किसी प्रकार भी रहा नहीं जाता । अरी सखियों ! जो कोई किशोरी जी को मना लाये उस पर मैं अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर कर दूँगा ।

  16. सुनो मन यह अनन्य की रीत - श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119)

    हे मन! मैं तुमको अनन्य प्रेम का सिद्धांत समझाता हूँ, ध्यान देकर सुनो । श्यामा- श्याम का अनन्य प्रेमी केवल श्यामा-श्याम एवं उनके परिकर (सेवक) रसिक-जनों के सिवाय अन्यत्र कहीं भी, स्वप्न में भी, अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ता ।

  17. हमारी राधे, अति भोरी सरकार - श्री कृपालु जी, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (94)

    हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं । वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं ।

  18. श्री श्यामा जू को, ऐसो सरल सुभाय - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (48)

    श्री निकुंज-विहारिणी किशोरी जी का स्वभाव इतना सरल है जितना मैंने न कहीं देखा है और न सुना ही है, यह मैं प्रतिज्ञापूर्वक कह रहा हूँ ।

  19. बलि जाऊं प्रेम-रस-सार की - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, प्रेम माधुरी (7)

    श्री राधा-कृष्ण के प्रेम की मधुरता पर मैं बार-बार स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । रसिकों के चूड़ामणि प्रिय श्री श्यामसुंदर एवं उनकी प्राण-प्यारी रस की खान श्री राधिका जी पर मैं स्वयं को अनंत बार न्योंछावर करता हूँ । प्रिय श्री श्यामसुन्दर सौन्दर्य के मूर्तिमान स्वरुप हैं एवं श्री राधा श्रृंगार की ।

  20. हमारे मन भाईं भानुलली- प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (133)

    मेरे मन को श्री वृषभानुनंदिनी किशोरी जी ही अच्छी लगती है।‘वे हमारी स्वामिनी हैं’ मैं इसी अभिमान में सदा दिवानी रहती हूँ। संसार मुझे पगली समझता है।