श्री रूप सखी जी

श्री रूप सखी जी, हरिदासी सम्प्रदाय में वृंदावन धाम के रसिक संत थे ।

60 लेख उपलब्ध हैं

  1. रूप रस मांते महा प्रेम - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)

    जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।

  2. बदन झलक अंग-अंग ललक अधरनि - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (42)

    परम चतुर श्री श्यामा-श्याम के मुखारविंद की दिव्य आभा, उनके अंग-अंग की परस्पर मिलन के लिए व्याकुलता और अधरों की मंद मुस्कान ही उनके नित्य विहार का मुख्य आधार तथा प्राणों का एकमात्र आहार है।

  3. तन वन सरस सुहावनों तरु बेली फल फूल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (28)

    वृक्षों, लताओं, फलों और पुष्पों से सदा सरस एवं मनोहर बने हुए श्रीधाम वृंदावन में श्यामा-कुंजबिहारी (प्रिया-प्रियतम), दोनों परस्पर समरस भाव से एवं नित्य-किशोर स्वरूप में सदा नित्य विहार करते रहते हैं।

  4. कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)

    प्रिया-प्रियतम अपनी अंतरंग केलि में, तन और मन से एक होकर अत्यंत मनोहर लग रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग की शोभा परम मधुर है, और कुंज-महल ही उनकी केलि का निज धाम है।

  5. स्यामा तू करुना को सागर - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (186)

    हे श्यामाजू (श्री राधा)! आप अगाध करुणा की सागर हैं। आपकी दिव्य कान्ति को निहारकर रसिक-चूड़ामणि श्री कुंजबिहारी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

  6. श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)

    जो स्वामी हरिदास जी के अनन्य जन हैं, वे युगलवर, श्री श्यामा कुंज बिहारी के नित्य विहार रूपी रस-केलि में ही अपने मन को लगाते हैं तथा युगल किशोर दंपति की रूप-रस माधुरी का नित्य अपने नयनों से पान करते रहते हैं।

  7. नित्यविहार सों करि प्रीति - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)

    प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस से प्रीति करो क्योंकि वही अनन्य रसिक संतों का जीवन सार है। ऐसे अनन्य रसिकों के संग एवं दिखाए मार्ग के अनुसरण करने से भाव-भक्ति में दृढ़ प्रतीति (स्थिर निश्चय) सहज ही प्रकट हो जाती है।

  8. रतन-खचित वृदाविपुन भूमि लता-द्रुम रंग - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (22)

    श्रीधाम वृंदावन की दिव्य भूमि रत्नों से जड़ित है, जहाँ रंग-बिरंगी लताएँ और विविध रंगों के वृक्ष सौंदर्य बिखेर रहे हैं। उसी परम पावन भूमि पर श्री स्वामी हरिदास जी के लाड़ले श्यामा-कुंजबिहारी, प्रेम-केलि में उन्मत्त होकर नित्य विहार रस बरसा रहे हैं।

  9. प्यारी तेरी छबि पर रबि ससि वारौं - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (251)

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! तुम्हारे अनुपम सौंदर्य पर तो मैं सूर्य और चंद्रमा को भी अर्पण कर दूँ। निकुंज महल में सुंदर शय्या पर विराजित तुम्हारे संग प्रियतम की छवि को सदा, एकटक निहारा करूँ — यही मेरी अभिलाषा है।

  10. श्री हरिदास अनन्य जै, जिनकै प्रेम प्रधान - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (31)

    जो रसिकजन स्वामी श्री हरिदास जी के पूर्ण रूप से अनुगामी होते हैं, उनकी प्रधानता केवल प्रेम की ही होती है । वे सखीभाव को अंगीकार कर, प्रिया-प्रियतम को नित्य लाड़ लड़ाते हुए, उनकी रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं ।

  11. श्री स्वामी हरिदास के नवल निकुंज बिहार - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (44)

    श्री स्वामी हरिदास जी के परम लाड़िले, नवीन निकुंजों में नित्य विहार करने वाले बांके बिहारी ही सिरमौर हैं। उनकी छवि का छींटा पाकर ही दशावतार प्रकाश पाते हैं।

  12. होरी खेलैं श्यामा श्याम - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (808)

    श्री श्यामा-श्याम होली के आनंदमय रंगों में मग्न हैं, उनकी मोहक दृष्टियाँ प्रेम के रंगों में सराबोर हो रही हैं। कमान-सी टेढ़ी भौहें जल-वृष्टि करने वाली पिचकारी के समान, मधुर मुस्कान से युक्त, नयन-बाणों की वर्षा कर रही हैं।

  13. स्यामा स्याम निकुंज निधि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (37)

    रसिक सिरमौर स्वामी श्री हरिदास जी के लाड़ले ठाकुर-ठकुरानी श्री श्यामा कुंजबिहारी निकुंज की निधि हैं। श्री रूप सखी जी कहते हैं कि उन दोनों की सुंदर छवि मेरे हृदय में सदा समायी हुई है, उनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को नहीं जानता।

  14. जै श्रीहरिदास रसिक वर की - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (36)

    रसिकवर श्रीस्वामी हरिदासजी की सदा जय हो, जिन्होंने इस धराधाम पर अवतार लेकर ऐसा अनुपम अनन्य धर्म प्रकट किया, जिससे विधि-निषेधात्मक शुभ और अशुभ कर्म कांप उठे हैं।

  15. श्री हरिदास अनूप अलि रसिक रूप बलिहार - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (47)

    रूप सखी कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी अद्वितीय हैं, मैं उनपर बार बार बलिहार जाता हूँ। वे इक-टक श्यामा कुंजबिहारी के अखंड नित्य विहार को ही अपलक नेत्रों से निहारते रहते हैं।

  16. विलसत रंग महल सुखरासी - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (169)

    निधिवन में विराजित “रंग महल” में प्रिया-प्रियतम सुखपूर्वक विलस रहे हैं। आनंद की निधि, श्री हरिदासी सखी, श्यामा-श्याम की केली का नित्य ही अवलोकन कर रही हैं।

  17. चरण कमल चित लाई कै गाऊँ गुन सुख-रासि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (52)

    अपने चित्त को श्री प्रिया-प्रियतम के चरण कमलों में लगाकर उनके गुणों का गान करूँ, जो सुखों की राशि हैं। ऐसे आनंद निधि और नित्य कृपा बरसाने वाले श्री चरणों से अपने हृदय को प्रेम रूपी धन से प्रकाशित करूँ।

  18. स्यामा नित्य बिहार बनी - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (673)

    मेरी श्यामा जू नित्य विहार में अति शोभायमान हैं । उनके संग नित्य ही कुंज बिहारी भी शोभायमान हैं जो श्री श्यामा जू के रस में सदा मगन रहते हैं । [1]

  19. मेरी कुंजबिहारिन रानी - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (578)

    मेरी स्वामिनी कुँजबिहारिनी श्री राधारानी हैं, जिन्हें कुंजबिहारी श्री कृष्ण बड़े हर्ष से लाड़ लड़ाते हैं, जिनके अंग-अंग की छवि की कांति वाणी से परे है।