श्री भक्तिरस मंजरी [श्री रामसखी जी]
श्री भक्तिरस मंजरी ग्रन्थ श्री रामसखी जी महाराज द्वारा रचित है जिसमें श्री राधाकृष्ण की सखी भाव की उपासना से सम्बंधित विभिन्न दोहे एवं छंद सकलित हैं।
22 लेख उपलब्ध हैं
निरतत रसिक सदा उजियारी थेई - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण सदा परम उज्ज्वल कांति से प्रकाशित होकर नृत्य कर रहे हैं। वे 'थेई-थेई' शब्द का मधुर उच्चारण करते हुए समस्त ब्रज-युवतियों के मन का हरण कर लेते हैं तथा करोड़ों कामदेवों के मद का नाश करने वाले हैं।
कहा कहौं शोभा सुभग कहत - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
श्री युगल सरकार की उस परम सुंदर और मंगलमयी शोभा का मैं क्या वर्णन करूँ, उसके विषय में कुछ भी कहते नहीं बनता है। दोनों एक ही समान किशोर अवस्था के हैं, जो अद्भुत सौंदर्य की कांति से परिपूर्ण हैं और उनके श्रीअंग अत्यंत सुंदर तथा सुकोमल हैं।
वारि वारि अली पीवत पानी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
The sakhīs repeatedly offer their very lives for Śrī Yugala, waving water over Them and drinking it—a loving and auspicious ritual in which water is waved over the beloved ones so that no obstacle or inauspiciousness may ever touch Them.
आरति करत नवल सुकुमारी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं।
प्यारे को नचवत प्रिया कबहुँ लकुट लै त्रासि - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी, दोहा (93)
प्रिया जी (श्री राधा) अपने प्रियतम श्री कृष्ण को नाचना सिखा रही हैं, और कभी-कभी वे अपने हाथ में लकुटी (छड़ी) लेकर उन्हें तनिक डराती भी हैं। जैसे-जैसे लाड़िली जी उन्हें नचाती हैं, श्री कृष्ण उनके अधीन होकर बिल्कुल वैसे-वैसे ही नाचते हैं।
देखोरी वृन्दावन शोभा - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
हे सखी! श्री वृन्दावन की इस अनुपम शोभा को देखो, जो समस्त सौंदर्य का सार है। यहाँ की छबि को देखकर साक्षात् युगल-चन्द्र (श्री राधा-कृष्ण) भी चकित रह जाते हैं और इसे निहारते हुए सुध-बुध खो देते हैं।
राम इन्है सब कहत हैं ताको अर्थ रसाल - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
सब लोग जिन्हें “राम” कहते हैं, उसका वास्तविक अर्थ रसिकों की दृष्टि में अत्यन्त मधुर रस से भरा हुआ है। “रा” में श्री राधिका हैं और “म” में मनमोहन लाल (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं।
जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
श्रीवृंदावन की रज परम शुभता का मूल है। जिस रज का ध्यान मुनिजन लगाते हैं,जिसका स्पर्श ब्रह्मा आदि के लिए भी परम दुर्लभ है।
अनुछिन लालहु रहत हैं सदा प्रिया आधीन - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी, दोहा (92)
लालजी (श्रीकृष्ण) हर क्षण अपनी प्रिया (श्रीराधा) के अधीन रहते हैं। उसी भाव-रस में समस्त सहचरियाँ उसी प्रकार मग्न रहती हैं, जैसे मछलियाँ जल में तन्मय होकर लीन रहती हैं।
जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
जय हो ललितादिक सखियों में श्रेष्ठ, सखियों की चूड़ामणि श्री राधा महारानी की। हे स्वामिनी! मुझ पर अनुग्रह कर मेरी सुध लें और कृपापूर्वक अपने चरणकमलों को मेरे मस्तक पर सुशोभित कराएं।
अहो नवलाल पिय विनय सुन लीजिये - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए।
श्री वृंदावन धाम, परम मंगल मुदखानी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
श्री वृंदावन परम मंगल एवं सुखप्रद धाम है जहां युगल किशोर ठाकुर एवं ठकुरानी सदा नित्य विहार पारायण हैं ।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्तिही - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्था में भी श्रीराधा कृष्ण के चरण कमलों की छटा ही मेरे मन में स्फुरित होती रहे । बैकुण्ठ अथवा नरक में भी उनके अतिरिक्त मेरे लिये कोई अन्य गति न हो ।
खेलत दोऊ कुंजन होरी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
श्री राधा कृष्ण कुञ्ज में होली खेल रहे हैं। श्री राधा मुठी भर-भरकर गुलाल उड़ा रही हैं एवं रंग से भरा घड़ा बहा रही हैं।
रा श्रीराधा राजही - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
“रा” में श्री राधा विराजती हैं और “म" में मनमोहन श्याम, अत: राम नाम संपूर्ण युगल नाम ही है जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है ।
वृन्दावन बसि ध्याइये - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
वृन्दावन वास करते हुए नित्य युगल किशोर श्री राधा कृष्ण के स्वरूप का ध्यान कीजिये। मधुर स्वर से श्री राधावल्लभ के गुणों का गान कीजिये।
अहो नव लाल पिय विनय सुनि लीजिये - श्री रामसखी जी, श्री भक्तिरस मंजरी
हे नवनागर लाल पिय [श्री कृष्ण], मेरी यह विनती सुन लीजिए! मुझे श्री धाम वृंदावन का वास प्रदान कर, कुंजों की महल टहल जैसे सोहनी सेवा आदि देकर कृतार्थ कीजिए ।
जो भागन सों पाइये वृंदावन विश्राम - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
यदि किसी जीव को सौभाग्यवश वृंदावन-वास प्राप्त हो जाए, तो उसे इस अहैतुकी कृपा को सार्थक करते हुए सांसारिक द्वंद्वों का पूर्णतया त्याग कर दिन-रात दृढ़ भाव से श्री राधा-कृष्ण की रसोपासना में मन को लगाना चाहिए, जिससे वह परम आनंद को प्राप्त कर सके।
कुंज की कुटीर दोऊ आली री उमंग भरे - श्री रामसखी जी, श्री भक्तिरस मंजरी
अरी सखी, श्री वृन्दावन के कुञ्ज कुटीर में दोनों युगल किशोर श्री श्यामाश्याम उमंग से भरे हुए मधुर गान कर रहे हैं एवं सखियाँ उन्हें मंद गति से झूला झूला रही है।
राधा पद पंकज कृपा - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
श्री राधा के चरणों की कृपा से समस्त ह्रदय की अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं । श्री हरि एवं श्री राधिका एक ही तत्व हैं केवल लीला के हेतु ही इनके दो नाम हैं ।