सिद्धान्त की साखी [श्री ललित किशोरी देव]

सिद्धान्त की साखी, ग्रंथ श्री ललित किशोरी देव जी की वाणी में श्री श्री ललित किशोरी देव द्वारा लिखित सिद्धांत के दोहों का संकलन है। रचैयता: श्री ललित किशोरी देव

71 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रीस्वामी के पद कमल - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (394)

    ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों को हृदय रूपी शुभ स्थान में बड़े ही प्रेम से विराजमान कर गौर और श्यामल वर्ण की आभा से युक्त श्री युगल-सरकार (राधा-कृष्ण) को मनभावने भाव से स्वेच्छापूर्वक लाड़ लड़ाओ।

  2. हमरी बात भली बनी भई लडैती प्रान - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (279)

    जगत में हमारी बात बहुत ही सुन्दर बन गई क्योंकि स्वयं सर्वोपरि श्रीनित्यविहारिनीजू (श्री राधा) हमारी प्राण-स्वरूप हो गई हैं। रसिक-शिरोमणि श्यामा प्यारी जू के मिलने से हमें अति ही सुख प्राप्त हो गया है।

  3. व्यास रसिक निर्णय कियौ श्रीवृंदावन माँहिं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (356)

    श्रीधाम वृन्दावन में रसिक-समाज के मध्य गहन विचार के उपरांत, श्री हरिराम व्यास जी ने यह निष्कर्ष स्थापित किया कि रसिक अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' के समान अन्य कोई उपासना मार्ग नहीं है। यह रस-पद्धति अद्वितीय है, जिसमें निरंतर केवल प्रिया-प्रियतम के अखंड विहार का ही अनन्य भाव से भजन किया जाता है। अतः इसकी तुलना किसी अन्य साधन-पथ से संभव नहीं है।

  4. आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (440)

    सृष्टि की रचना से पूर्व और प्रलय के पश्चात भी जो सतत एकरस भूतल पर विद्यमान रहता है, वह केवल श्रीवृन्दावन धाम ही है। वहाँ जो जन समस्त अपराधों से रहित होकर अखंड वास करते हैं, उन पर अति प्रसन्न होकर श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज उन्हें अति अद्भुत, सुखदायक और सर्वोपरि नित्य-विहार रस प्रदान कर देते हैं।

  5. कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (346)

    कोई भगवान का निज स्वरूप वैकुंठनाथ को बताता है, कोई ब्रह्म को बताता है। कोई अयोध्यानाथ श्री राम को बताता है तो कोई स्वयं भगवान श्री कृष्ण को बताता है ।

  6. श्री स्वामी हरिदास को धर्म सुमेर समान - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (317)

    प्रिया-प्रियतम के एकान्तिक एवं अखंड नित्य विहार रस रूपी भक्ति-भाव का सतत पालन करने वाला स्वामी श्री हरिदास जी का सर्वोपरि प्रेम-धर्म, सुमेरु पर्वत के समान अत्यंत ऊँचा है। इसके समक्ष अन्य नाना धर्म तो मानो डूँगरी (छोटी पहाड़ी) के समान तुच्छ प्रतीत होते हैं।

  7. श्रीस्वामी हरिदास के - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (437)

    श्री स्वामी हरिदास जी के जो अनन्य जन हैं, उनका यह यश जगत में विख्यात है कि वे लोक-वेद की समस्त मर्यादाओं को त्यागकर, सदैव एकमात्र सर्वोपरि नित्यविहार का ही दृढ़ अनन्य भाव से सेवन करते हैं।

  8. आये तैं हर्षे नहीं, गये करें नहिं सोग - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (399)

    कोई व्यक्ति या वस्तु आए, हमें कोई हर्ष नहीं; कोई व्यक्ति या वस्तु छिन जाए, हमें कोई शोक नहीं क्योंकि हम तो गौर-श्यामल वर्ण वाले श्यामा कुंज बिहारी के नित्य विहार में ही अपने मन को सदाकाल लगाये हुए हैं।​

  9. सदा बसै वृन्दाबिपिन तजे न कबहूँ खेत - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (412)

    जो बड़भागी महतजन ऐसे अनन्य भाव से श्रीवृन्दावन में वास करते हैं कि वे एक क्षण को भी वृंदावन को त्याग कर नहीं जाते, वे ही महतजन साक्षात श्रीप्रियाजू (श्री राधा) से अनन्य प्रेम संबंध स्थापित कर, श्री जुगल को मनमानी लाड़-लड़ाते हैं ।

  10. रसिक सिरोमनी लाड़िली सो हमरे अंग संग - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (262)

    रसिक शिरोमणि कुंज बिहारिनी, श्री लाड़ली जू (श्री राधा) सदा हमारे अंग-संग रहती हैं, इसी कारण हम कुंज महल में विराजते हुए, उनकी अखंड केलि को सदा निहारते रहते हैं।

  11. राग द्वेष हमरे नहीं - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (309)

    ललित रस के जो सुजान रसिक होते हैं उनके राग द्वेष एवं देहाभिमान लेशमात्र भी नहीं होता क्योंकि वे तो सदाकाल अपने सरस भाव द्वारा श्री प्रिया जू (श्री राधा) से ही मिले रहते हैं।

  12. जाकौं चाहैं लाडिली - श्री ललित किशोरी देव जी की बानी, सिद्धान्त की साखी (500)

    जिसको श्री कुंजबिहारिनी लाड़ली जू [श्री राधा] चाहती हैं उसको ही सब सुख सहजता से प्राप्त हो जाता है । यह बात को सब जानते हैं कि प्रिया प्रियतम के निजमहल का दिव्य प्रेम श्री प्यारी जू की कृपा के बिना प्राप्त नहीं होता ।

  13. तनु की मनु की बचन की करी अविद्या दूरि - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (210)

    हमारी प्राण-प्यारी कुंज-बिहारिनी श्रीराधिका जू ने हमारे हृदय में सर्वोपरि प्रेम भरकर तन, मन एवं वचनों की समस्त अविद्याओं को दूर कर दिया है।

  14. श्री कुंजबिहारिनी लाडिली, श्री स्वामी हरिदास - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (210)

    श्री कुंजबिहारिनी लाड़िली जू और ललिता-अवतार स्वामी हरिदास जी वस्तुतः अभिन्न स्वरूप हैं। दोनों एक प्राण, एक रस होकर नित्य-विहार रूपी प्रेम-विलास में सतत निमग्न रहते हैं।

  15. भजन करै हरिदास को पावै नित्य बिहार - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (27)

    श्री स्वामी हरिदास जी का भजन करने से सर्वोपरि नित्यविहार रस सहज ही प्राप्त हो जाता है और स्वयं नित्य विहारिणी जू (श्री राधा) सदाकाल अपने ह्रदय का हार बनाकर रखती हैं ।

  16. नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (347)

    न तो मुझे वैकुण्ठ चाहिए, न ही ब्रह्मानंद चाहिए । न मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम चाहिए, न ही नंदलाल श्री कृष्ण ।

  17. रहनी कहनी एक सी, जयौं की त्यौं जो होइ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (307)

    जिन साधकों की रहनी और कहनी एक समान होती है, वे बड़भागी जन चाहे जागें या सोएँ, उन्हें परम वस्तु (प्रेम-रस) निश्चित ही प्राप्त हो जाती है।

  18. तन छूटै तो परम सुख, रहै तो भजन अपार - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (193)

    जिन साधकों ने श्री कुंजबिहारिनी लाड़िली जू श्री राधा को अपने जीवन और प्राणों का आधार बना लिया है, उनके लिए देह-त्याग परम आनंद का कारण बनता है; और जब तक देह रहती है, वे अपार भजन-रस में मग्न होकर उन्मत्त से रहते हैं।

  19. भूल छुड़ावो लाड़िली, समझ देउ भर-पूरि - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (156)

    हे लाड़िली! मेरी समस्त भूलों और अज्ञानता को दूर कर मुझे पूर्ण विवेक प्रदान कीजिए। हे मेरी प्राण-रसायन श्री किशोरीजी, यह कार्य केवल आपके ही हाथ में है और आपके लिए अत्यंत सहज है; आपके अतिरिक्त कोई भी इसे नहीं कर सकता।

  20. जा मारग मेरौ गुरु चलयौ, ता मारग हौं जाऊँ - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (557)

    जिस मार्ग पर मेरे सद्गुरु चले हैं, मैं भी उसी मार्ग का अनुसरण करूँगा। उनके बताए हुए स्वामी हरिदास जी के रस-उपासना-मार्ग के अतिरिक्त संसार में जितने भी अन्य मार्ग (मत-मतान्तर) हैं, मैं उन पर रंचक मात्र भी विश्वास नहीं करता।