स्कंद पुराण

स्कंद पुराण सबसे बड़ा महापुराण है, जो अठारह हिंदू धार्मिक ग्रंथों की एक शैली है। पाठ में 81,000 से अधिक छंद शामिल हैं।

24 लेख उपलब्ध हैं

  1. न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

    भगवान कहते हैं— मेरे परम पावन धाम ब्रज की प्राप्ति न तो पुण्य कर्मों से होती है, न दान से, न तपस्या से और न ही स्तुति-प्रार्थनाओं से। विविध प्रकार के योग-साधनों द्वारा भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दिव्य धाम केवल मेरी अहैतुकी कृपा और अनुग्रह से ही प्राप्त होता है।

  2. तस्मिन्नन्दात्मजः कृष्ण - स्कंद पुराण (2.6.1.21)

    उस व्रजधाम में नंदकुमार श्रीकृष्ण, जिनका श्रीविग्रह नित्य आनंदमय है, जो आत्माराम और आप्तकाम हैं, वे केवल प्रेम में रंगे हुए भक्तों द्वारा ही साक्षात् अनुभव किए जाते हैं।

  3. मूका जडांधबधिरास्तपो - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (49)

    जो मनुष्य चाहे गूंगे, मूर्ख, अंधे, बहरे हों अथवा तप तथा नियमों से रहित हों— वे भी यदि ब्रज में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो मेरे दिव्य लोक को प्राप्त होते हैं।

  4. मथुरामपि संप्राप्य योऽन्यत्र कुरुते स्पृहाम् - स्कंद पुराण, मथुरा माहात्म्यम् (2.5.17.37)

    यदि मथुरा (ब्रज) पहुँचकर भी कोई अन्य स्थान की इच्छा करे, तो उस दुर्बुद्धि व्यक्ति को अभी पूर्ण ज्ञान कहाँ है? वह तो अपनी अज्ञानता ही प्रकट करता है।

  5. सर्पदष्टाः पशुहताः पावकांबुविनाशिता - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (50)

    जो भी ब्रज में मृत्यु को प्राप्त करते हैं, भले ही साँप के काटने से, जंगली पशुओं द्वारा, अग्नि में जलकर, जल में डूबने से अथवा किसी भी प्रकार की अकाल मृत्यु से, वे सभी मेरे दिव्य धाम को प्राप्त होते हैं।

  6. अत्रैव व्रजभूमिः सा यत्र तत्त्वं सुगोपितम् - स्कंद पुराण, मथुरा माहात्म्यम् (2.6.1.28)

    भू आदि लोकों में मथुरा मंडल की वही ब्रजभूमि है, जहाँ वह परम गुप्त तत्व स्थित है। भगवान की कृपा से, कदाचित जिस व्यक्ति के हृदय में पूर्ण प्रेम का आविर्भाव हो जाता है, उसी को वह तत्व स्पष्ट रूप से भासित होता है।

  7. न पापेभ्यो भयं यत्र - स्कंद पुराण, मथुरा माहात्म्यम् (2.5.17.46)

    जहाँ पापों का भय नहीं है, जहाँ यमराज (मृत्यु) का भय नहीं है, और जहाँ गर्भवास का भय नहीं है, ऐसे दिव्य मथुरा क्षेत्र (ब्रज) की शरण कौन नहीं लेगा?

  8. फल भूमिर्व्रज भूमिर्दत्ता - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), भागवतमाहात्म्यम् (6), अध्यायः (2), छंद (23)

    ब्रज की भूमि फल भूमि (अर्थात् साधना का फल) है जो पूर्व काल में उद्धव जी को प्राप्त हुई थी । जिस प्रकार यहाँ फल छुपे हुए हैं उसी प्रकार उद्धव जी भी यहाँ अदृश्य रहते हैं ।

  9. तस्या एवांश विस्तारा - स्कंद पुराण, भागवत महात्म्य (2.12)

    रुक्मिणी सत्यभामा आदि श्रीकृष्ण की जितनी भी रानियाँ और पटरानियाँ हैं, वे सब श्री राधा के अंश से ही आविर्भूत हैं । राधा और कृष्ण सदा-सर्वदा एक दूसरे के सम्मुख रहते हैं, अर्थात् इनका पारस्परिक संयोग नित्यसिद्ध है ।

  10. अत्रैव व्रजभूमि: सा यत्र तत्त्वं सुगोपितम् स्कंद पुराण, भागवत महात्म (1.28)

    यह वही ब्रज भूमि है जहां नित्य [गुप्त रूप से] और प्रकट दोनों लीलाएँ एक साथ हो रही हैं । अधिकारी रसिक भक्तों को कभी कभी इसका दर्शन हो जाता है ।

  11. आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका - स्कन्दपुराण - खण्डः 2 (वैष्णवखण्डः)/भागवतमाहात्म्यम्/अध्यायः 02, छंद 11

    यमुना जी कहती हैं: आत्मा में रमण करने वाली श्री कृष्ण की आत्मा श्री राधारानी हैं और उनकी मैं दासी बन चुकी हूँ । श्री राधारानी के दासता की महिमा है की हमें श्री कृष्ण के विरह का अनुभव नहीं हो रहा है क्यूंकि श्रीराधा के साथ यहाँ श्री कृष्ण नित्य विहार करते हैं ।

  12. न दृष्टा मथुरा येन दिदृक्षा यस्य जायते - स्कंद पुराण (2.5.17.29)

    यदि ब्रज के दर्शन करने की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा पूरी होने से पहले ही प्राण त्याग देता है, तो वह निश्चित ही वह पुनः ब्रज में जन्म लेगा जिसमें कोई संदेह नहीं है।

  13. गो कोटि दानं ग्रहणेषु काशी - स्कन्द पुराण

    यदि पूर्ण ग्रहण के अवसर पर काशी धाम में एक करोड़ स्वर्ण मढ़ी सींग वाली गउएँ दान की जायें, दस हज़ार वर्ष तक प्रयाग में कल्प वास किया जाये और यज्ञ करके सुमेरु [सोने] के पर्वत को ही दान कर दिया जाए, और इन सब के फल को एक पलड़े [तराज़ू] में रख दिया जाये

  14. मयि येषां स्थिरा - स्कन्दपुराण (2.17.42)

    श्री कृष्ण कहते हैं : जो मेरी मथुरा [ब्रज] भूमि से प्रेम करते हैं [एवं बढ़ाते हैं] उन्हीं का ही मेरे चरणों में प्रगाढ़ प्रेम होता है, और वह ही मेरी नित्य कृपा पाने के अधिकारी हैं ।

  15. गुणातीतं परं ब्रह्म व्यापकं ब्रज उच्यते - स्कंद पुराण (2.6.1.20)

    जो परम ज्योति सदा आनंदमय है, वही परम ब्रह्म है , जो सत्व,रज तथा तम, तीनों गुणों से परे है, सर्व व्यापक है, इसी को श्री ब्रज धाम कहते हैं, जहाँ मुक्त महापुरुषों का वास है।