सूरदास

सूरदास ब्रज के विख्यात संत, पुष्टिमार्ग या वल्लभ सम्प्रदाय के अष्टछाप कवि थे। श्री सूरदास जी ने सूरसागर में अपनी रचनाओं का वर्णन किया है।

136 लेख उपलब्ध हैं

  1. जब परसे प्यारी-चरन परम-प्रीति - श्री सूरदास, सूर सागर (3446.36)

    जब परम स्नेही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने अत्यधिक प्रेम के साथ अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह का सारा दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।

  2. हरि-मुख राधा-राधा बानी - श्री सूरदास, सूरसागर (3377)

    श्री हरि के मुख से निरंतर केवल 'राधा-राधा' का ही नाम निकल रहा है। वे सुध-बुध खोकर अचेत अवस्था में पृथ्वी पर पड़े हुए हैं, उनकी ऐसी दशा देखकर सखियाँ अत्यंत व्याकुल हो उठी हैं।

  3. साँचौ निहचै प्रेम कौ जीवन मुक्ति रसाल - श्री सूरदास, सूर सागर (4713.26)

    उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मुक्ति है और जब जीवन में श्री गोपाल के प्रति प्रेम दृढ़ हो जाता है, तो वे अवश्य मिल जाते हैं।

  4. ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि - श्री सूरदास, सूरसागर (1108)

    ब्रह्मा कहते हैं— ब्रज की गलियों में बसने की रीति ऐसी ही होनी चाहिए जहाँ हम ब्रजवासियों और ग्वालों के जूठे पत्तलों से अन्न के दानों (सीथ) को चुन-चुनकर अपना पेट भरें।

  5. हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति - श्री सूरदास, सूर सागर (4713.15)

    जब उद्धव योग की युक्ति-विधि की चर्चा करते हैं, तब ब्रज की गोपियाँ उत्तर देती हैं— हम तो सीधी-सादी ग्वालिनें हैं, हम योग साधने की क्रिया कैसे समझेंगी? तुम ही बताओ श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम के एकमात्र व्रत को छोड़ कर कौन दीवार पर बने चित्र या अंकित चिह्न/अक्षर आदि की पूजा करेगा?

  6. माधौ मोहिँ करौ वृंदावन रेनु - श्री सूरदास, सूरसागर (1107)

    ब्रह्मा जी विनयपूर्वक स्तुति करते हुए कहते हैं—“हे माधव! मुझे श्री वृन्दावन की पावन रज बना दीजिए। यह वही दिव्य धूल है, जिस पर आप अपने चरणों से विचरण करते हैं और प्रतिदिन वन-वन जाकर गौओं को चराते हैं।”

  7. सजन कुटुंब परिजन बढ़े - श्री सूरदास, सूर सागर (325.21)

    जैसे-जैसे तेरे प्रियजन, कुटुम्ब और परिवार का विस्तार होता गया, और पुत्र, पत्नी, धन तथा वैभव बढ़ते गए, वैसे-वैसे तू विषयासक्त होकर भ्रमित होता गया। सांसारिक इच्छाओं और कामनाओं ने तेरे चित्त को इस प्रकार बांध लिया कि तू अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को ही भूल बैठा। अरे मूर्ख! क्या इसी को तू अपनी विजय समझ बैठा है? स्मरण कर—तेरा जन्म केवल भगवद्प्राप्ति और आत्मोद्धार के लिए हुआ था।

  8. बृंदाबन खेलत हरि होरी - श्री सूरदास, सूरसागर

    वृंदावन में भगवान हरि (श्रीकृष्ण) होली खेल रहे हैं। वहाँ ताल, मृदंग, झाँझ और डफ बज रहे हैं, और नंदलाल (कृष्ण) व वृषभानुकिशोरी (राधा मिलकर उत्सव मना रहे हैं।

  9. सब रस कौ रस प्रेम है विषयी खेलै सार - श्री सूरदास, सूर सागर

    संसार के समस्त रसों में प्रेम-रस ही सर्वोत्तम है। जैसे एक विषयी जुआरी सार (जुए की गोटियाँ) खेलते समय तन, मन, धन और यौवन अर्थात् सब कुछ दाँव पर लगा देता है। वह सब कुछ नष्ट कर बैठता है, फिर भी हार स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसका चित्त पूरी तरह उसी खेल में आसक्त हो जाता है। उसी प्रकार प्रेम-रस में प्रविष्ट व्यक्ति भी अपने सर्वस्व को अर्पित कर देता है और किसी भी दशा में पीछे नहीं हटता ।

  10. दोऊ राजत स्यामा स्याम - श्री सूरदास, सूरसागर (1696)

    श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर रही हैं।

  11. सुनि परमित पिय प्रेम की चातक चितवति पारि - श्री सूरदास, सूर सागर

    प्रिय के असीम प्रेम को सुनकर चातक पक्षी सदा बादलों की ओर अनन्य भाव से निहारता है। उसी मेघ की आशा से सब दुख सहता है, परंतु मरते दम तक भी जल (वर्षा) के लिए यांचना नहीं करता। सच्चे प्रेमी का यही स्वभाव होता है कि वह अपने प्रियतम से कुछ भी माँगता नहीं।

  12. चारि बदन मैं कह कहौं - श्री सूरदास, सूर सागर, दशम सकंध

    ब्रह्मा जी, श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करते हुए कहते हैं — "हे प्रभु! आप ब्रज में गायें चराते रहते हो और नन्दबाबा की शपथ की दुहाई देते हो। आपकी इन अलौकिक लीलाओं को जब सहस्र (हज़ार) मुख वाले शेषनाग नहीं जान सके, तो फिर मैं चार मुख वाला ब्रह्मा कैसे गुणगान कर सकता हूँ?"

  13. वृन्दावन व्रज को महत कापे बरनी जाई - श्री सूरदास, सूर सागर, दशम सकंध

    श्रीधाम वृन्दावन और सम्पूर्ण व्रजभूमि का ऐसा अपार महत्व है कि उसका वर्णन वाणी और बुद्धि की सीमाओं से परे है। जब स्वयं चार मुख वाले ब्रह्मा जी ने ब्रज में अपने अपराध को स्वीकारते हुए श्रद्धा से श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया, तब वे अपने ब्रह्मलोक लौटकर अनन्त सुख को प्राप्त हुए।

  14. ब्रज-वासी-पटतर कोऊ नाहीं - श्री सूरदास, सूर सागर

    ब्रजवासियों की बराबरी कोई नहीं कर सकता। जिन श्रीकृष्ण को ब्रह्मा, शिव, सनकादि आदि भी ध्यान में नहीं पा सकते, वही श्रीकृष्ण प्रेमवश ब्रजवासियों की जूठी थाली से अन्न ग्रहण करते हैं।

  15. वेद, पुरान, सु‍मृति सबैं सुर-नर सेबत जाहि - श्री सूरदास, सूर सागर

    सभी वेद, पुराण और स्मृतियाँ उसी प्रभु की महिमा का बखान करते हैं, जिसकी सेवा सभी सुर-नर-मुनि आदि करते हैं। अरे महामूर्ख मन! तू उस परम प्रभु का स्मरण क्यों नहीं करता?

  16. खान-पान-परिधान मैं जीवन गयौ सब बीति - श्री सूरदास, सूर सागर

    खाने-पीने और भोग-विलास में सम्पूर्ण जीवन यूँ ही व्यर्थ बिता दिया। जैसे कोई दुराचारी व्यक्ति रात किसी पराई स्त्री के साथ बिताकर सुबह भयभीत हो उठे, वैसे ही जब मृत्यु रूपी सवेरा निकट आता है, तो मायारूपी परस्त्री में अनुरक्त होकर जीवनरूपी रात्रि व्यर्थ बिताने वाला जीव भय से काँपने लगता है।

  17. जब जब मुरली कान्ह बजावत - श्री सूरदास, सूर सागर

    श्री सूरदास सखी भाव धारण कर श्री राधा से कहते हैं - जब-जब श्रीकृष्ण मुरली बजाते हैं, तब-तब वह “राधा” नाम का बार-बार उच्चारण कर आपको रिझाने का प्रयत्न करते हैं।