उत्कंठा माधुरी [श्री माधुरी दास]

उत्कंठा माधुरी, गौड़ीय संप्रदाय के श्री माधुरीदास द्वारा संकलित ग्रंथ है जिसमें उत्कंठा [लालसा] माधुरी का वर्णन किया गया है ।

15 लेख उपलब्ध हैं

  1. और कहाँ ते सुमरिये - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (112)

    श्री प्रिया-प्रियतम के इस रास-विलास की लीला इतनी अगाध है कि वे मेरी सामर्थ्य से परे है। उनका पूर्ण स्मरण तो दूर, यहाँ तो ऐसी दशा हो जाती है कि ‘राधा’ नाम के केवल ‘रा’ अक्षर के उच्चारण मात्र से ही हृदय में अष्ट सात्त्विक भाव प्रकट हो जाते हैं और शरीर में कंपन, रोमांच आदि होने लगते हैं।

  2. वामुख की आशा लगी - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (28)

    अब मुझे केवल उन (प्रिया-प्रियतम) के मुख-दर्शन की ही उत्कंठा लगी है। योग, साधना और अन्य सभी उपायों की आशा मैंने पूर्णतः त्याग दी है। अब यदि शीघ्र ही उनके साथ मेरा मिलन (संजोग) नहीं हुआ, तो ये प्राण भी छूट जाएँगे।

  3. वा मुख देखन को कहौं - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (24)

    ऐसा कौन-सा उपाय करूँ कि मुझे श्री श्यामा-श्याम के मुख-कमल के दर्शन प्राप्त हो सकें? मैं क्या करूँ, किससे कहूँ? अब तो यह पीड़ा अत्यंत असहनीय हो गई है।

  4. कहा करूँ कासों कहूँ को बूझे कित जाउँ - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (29)

    क्या करूँ, किससे कहूँ, कौन समझेगा, किसके पास जाऊँ? श्री प्रिया-प्रियतम के दर्शन की तीव्र लालसा लिए, श्री धाम वृंदावन के वनों में उनका नाम लेलेकर व्याकुलता पूर्वक डोलता हुआ फिर रहा हूँ।

  5. वृन्दावन विहरहिं सदा गहे परस्पर बाँह - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (4)

    दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे का आलिंगन कर सदा वृंदावन में नित्य विहार करते हैं। मेरे हृदय में उनसे मिलने की तीव्र उत्कंठा जाग उठी है।

  6. जो मोसों मोसी करौ नाहीं कछु मोहि ठौर - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (76)

    यदि आप मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मेरे कर्मों के अनुसार होना चाहिए, तो हे प्रभु, मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मेरा उद्धार कभी संभव नहीं होगा। आपके अतिरिक्त अब मेरा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। आप तो परम कृपालु हैं, पतितों को भी अपने हृदय से लगाने वाले हैं। कृपा करके, हे रसिक सिरमौर, अपने उसी स्वभाव वश मुझ दीन पर भी अपनी कृपा बरसाइए।

  7. दसन खँडित वीरी रुचिर दैहैं निकट बुलाय - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (149)

    मेरी यही अभिलाषा है कि कुंवरी श्री राधा अपने सुकोमल हाथों से उनके द्वारा चर्वित पान मुझे अपने निकट बुलाकर प्रदान करेंगी एवं अपने कंठ के हार को मेरे कंठ में पहनाएंगी।

  8. जो वन वन डोलत रहों - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (30)

    यदि कोई जीव श्री श्यामाश्याम से मिलने की आशा बाँधकर वृन्दावन के कुंज वनों में डोलेगा, तो अनजाने में ही कहीं न कहीं उसकी उनसे अचानक भेंट अवश्य होगी।

  9. कठिन मनोरथ मन उठे, को पुरनि करे आनि - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (106)

    मेरे मन में प्रेम भरे दुर्लभ मनोरथ उत्पन्न हो रहे हैं, उन्हें कैसे पूरा करूँ? कोई उपाय नहीं सुझता, केवल श्री लाड़लीजी ही अब कृपा करेंगी मुझे दीन-दुखिया समझकर।

  10. अहो लड़ैती लाड़ली, अलखि लड़ी सुकुमारु - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (35)

    हे लड़ैती लाड़ली श्री राधे! हे अति सुकुमार अलख लड़ी, मनोहारनी किशोरी जू! कृपा कर मुझे अपने सुंदर मुख की थोड़ी सी झलक दिखलाइये ।

  11. श्री वृंदावन स्वामिनी करि सुदृष्टि इहि ओर - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (10)

    हे वृंदावन की महारानी, श्री राधा! कृपा करके मेरी ओर सुदृष्टि डालिए और अपने कृपा-कटाक्ष की कोर से अनुराग-रस की वर्षा कर दीजिए।

  12. गुणनि अगाधा राधिका, श्री राधा रस धाम - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (36)

    श्री राधिका समस्त गुणों की अगाध खान हैं एवं अद्बुत रस की ही एक मात्र धाम हैं, जिनका केवल आधा नाम अर्थात् “रा" के उच्चारण से ही समस्त सुखों की प्राप्ति हो जाती है ।

  13. नैनन सों नैना मिले, मुख सौं मुख लपटाय - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (187)

    वृन्दावन युगल-रस का परम-पावन स्थान है जहाँ युगल (श्री राधा कृष्ण) प्रेम के वशीभूत होकर नयन से नयन मिलाते, मुख से मुख लगाते और भुजाओं में परस्पर लिपटकर दिव्य प्रेम-रस में निमग्न रहते हैं।