श्री विट्ठल विपुल देव जी
श्री विट्ठल विपुल देव जी, श्री हरिदास के शिष्य, वृंदावन के रसिक संत हैं। वह स्वामी हरिदासी परम्परा के आठ आचार्यों में से दूसरे थे। वह निधिवन में रहते थे, और उनकी समाधि भी वहीं स्थित है।
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प्रिया स्याम-सँग जागी है सोभित - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (9)
श्रीप्रिया जी रात भर प्रियतम श्यामसुंदर के साथ जागती रही हैं। उनके सुवर्ण के समान कांतियुक्त कपोलों की सुंदर आभा पर प्रियतम के वस्त्रों की छाप अंकित है, जो अत्यंत सुशोभित हो रही है।
नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)
परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है।
मिलि खेलि मोहन सौं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)
श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं— हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलकर क्रीड़ा कीजिए। जब आप रस में उन्मत्त होकर अपने प्राणप्यारे कुंजबिहारी संग रस-विलास में प्रवृत्त होती हैं केवल तभी हमारे तन-मन-प्राण प्रफुल्लित होते हैं मानो हमारा रोम-रोम सब प्रकार से परितृप्त हो उठता है।
बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (32)
कुंज की इस दिव्य रजनी (रात्रि) में प्रियतमा श्री राधा और प्रियतम श्री लाल (कृष्ण) रस-विलास कर रहे हैं। वे मुख से मुख जोड़कर परस्पर प्रेम की क्रीड़ा कर रहे हैं, जहाँ उनके नूपुरों के स्वर और कंगनों की खनक से एक मधुर संगीत उत्पन्न हो रहा है।
डोल झूलें स्यामा स्याम सहेली - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (16)
हे सखी ! दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम डोल झूल रहे हैं। नव-निकुंज मन्दिर में नवरंगी प्रियतम के संग गर्वोन्मत्त गर्वीली प्रिया विहार कर रही हैं।
हौं तेरे वारनें मंद गति चलि - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (12)
अपनी प्राणसखी श्रीराधा से प्रेम-लीला की चातुर्यपूर्ण योजना करते हुए सहचरी (विठ्ठल विपुल) मधुर वाणी में कहती है — हे सखी! मैं तो आप पर बलिहार जाती हूँ। चलिए अब धीरे-धीरे प्रियतम की ओर चलते हैं।
स्यामा चलहु, लड़ैती प्रिया - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (11)
श्रीविपुलबिहारिनदासीजी निज प्राण-लालसा को प्रकट करती हुई अपनी प्राण-सखी श्री राधा से निवेदन करने लगीं - हे श्यामा प्यारी ! निकुंज-भवन पधार कर केलि-रंग में अनुरंजित हों, आपको इस रस में लाड़ लड़ाने के लिए हमारे तन-मन-प्राण आकुल-व्याकुल हो रहे हैं।
नैंना प्रगट करत पिय प्रेमैं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (24)
श्रीविपुलबिहारिनदासीजी श्री राधा से कह रही हैं कि आपके नेत्रों में तो प्रियतम के प्रति प्रेम स्पष्ट झलक रहा है। क्यों झूठमूठ में उत्तर प्रति-उत्तर देकर हमें आप बहकाने की चेष्टा कर रही हैं, इस मान का परित्याग करें।
जमुना तट स्याम घटनि की पाँति - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (28)
पावस की छटा का वर्णन करती हुई श्रीविपुलबिहारिनदासीजी कह रही हैं कि श्रीयमुनाजी के तट पर स्याम रंग की घटाएँ सुशोभित हो रही हैं।
सजनी नव निकुञ्ज द्रुम फूले - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (14)
हे सखि! इस वसंत में नव-नव विकसित मधुरता से युक्त वृक्ष और लताएँ पूर्णतः खिल उठी हैं। इन पुष्पों से उदित सौरभ की रसमादकता ने पूरे वन को मोह लिया है, जिससे मत्त भ्रमरावलि गुंजार करती हुई प्रेम और आनंद का संचार कर रही है और वातावरण में मन्मथ (कामदेव) का अद्भुत उद्रेक हो रहा है।
बदी पिय आजु प्रिया सों होड़ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (39)
आज प्रियतम (कृष्ण) प्रिया (राधा) के संग स्वर की गति में होड़ करते हुए अति उत्साह में भरकर नव-निकुंज के मध्य स्थित हैं, जहाँ वे सुरों के सूक्ष्म भेद-विभेदों को प्रकट कर रहे हैं।
तेरे नूपुर - धुनि री प्यारी स्रवन सुनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (33)
हे प्यारी ! आपके चरणारविंद से नूपुर ध्वनि की सुंदर झंकार का श्रवण कर, श्रीवृन्दावन की समस्त अचल सम्पत्ति चलायमान हो रही है एवं चलायमान अचल हो रहे हैं। खग- मृग आदि पक्षीगण एवं अन्य जन्तु मुनियों की भाँति रस-समाधि में तदाकार हो रहे हैं।
लाल करत तेरे गुन गानैं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (21)
हे प्यारी जू, मैं शपथ खाकर कहती हूँ कि श्री लाल जी तो सदा आपका ही गुणगान करते रहते हैं। यदि आपको मेरी वाणी और शपथपूर्वक कहने पर भी विश्वास नहीं हो रहा है तो आप चलकर स्वयं अपने कानों से सुन लीजिए।
मेरौ लाल रंगीलौ रंग भर्यौ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (23)
हे किशोरी श्री राधा ! मेरे रंगीले लाल (श्री कृष्ण) में तो एक मात्र प्रेम-रस-रंग ही भरा हुआ है।
प्रातहीं किसोर जोरि कुंज-केलिनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (7)
दिव्य युगल किशोर-किशोरी की जोड़ी कुंज-भवन में केलि-परायण है।
प्यारी तेरी चाल चितवन बाँकी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (6)
सहचरी भावापन्न श्री विट्ठल विपुल देव जी श्री राधा रानी से कहते हैं: हे प्यारी! आज आपकी चालचलन एवं चितवन में विशेष रस बंकता उदभासित हो रही है । आपके श्रीअंग पर विलक्षण वसन एवं आभूषण सुसज्जित हो रहे हैं । रस वैभव जनित विलक्षण रेखा आपके वक्षस्थल पर दृश्यमान हो रही है ।
लालहिं बस करनी, मदन मन हरनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (8)
रूप की राशि श्रीराधा लाल को सहज ही अपने वश में कर लेने वाली हैं, कामदेव का प्रचंड दर्प तो उन्हें देखते ही चूर चूर हो जाता है, अपने यौवन के उल्लास में वे लचक-लचक कर चलती हैं और शोभा का भार वक्ष्यस्थल को उठाये हुए है ।
जिन रूठौ लागौं तिय पैयाँ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (34)
प्रियाजी की मनुहार करते हुए लाल निवेदन कर रहे हैं कि आपके चरणारविन्द में मैं नत हूँ, कृपया आप रूठें नहीं ।
नव निकुंज मंदिर में प्यारी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (30)
नव निकुंज मन्दिर में श्री प्रियाजी (राधा) अपने प्रियतम (कृष्ण) को वीणा वादन की शिक्षा दे रही हैं ।
जुगल किसोर मेरे कुंजबिहारी प्यारी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (15)
बसंत की छवि का वर्णन करते हुए सखी कहती है कि हमारे युगल बिहारी बिहारिनी वन विहार करते हुए नव नव रंगों को प्रकाशित कर रहे हैं ।