राधामाधव अद्भुत जोरी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)
रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।
श्री युगल शतक श्री भट्ट देवाचार्य द्वारा लिखित श्री युगल सरकार की महिमा, उनकी माधुरी और श्री वृंदावन धाम महिमा इत्यादि के 100 पदों का संग्रह है। श्री भट्ट देवाचार्य ने वृंदावन के बंशीवट में इस ग्रन्थ की रचना की। लेखक: श्री भट्ट देवाचार्य
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रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।
श्रीरंगदेवीजी श्रीललिताजी से कहती हैं- हे श्रीललिते ! श्री राधा के नेत्रों की ओर तो देख ! उनके ये नेत्र खंजन (पक्षी) की भाँति शोभायमान लग रहे हैं। यद्यपि श्रीप्रियाजी ने अपने नेत्रों में अञ्जन-धारण नहीं किया है, तथापि बिना अञ्जन के ही उनके ये खञ्जन-नेत्र वृन्दावन-बिहारी श्रीकृष्ण के हृदय की विरह-व्यथा को नष्ट करने वाले हैं।
जिस प्रकार चंद्रमा के संग ज्योत्सना शोभायमान लगती है, उसी प्रकार श्यामसुन्दर के संग श्री राधिका रस में भरी परम शोभायमान हैं। आज वे अति ही आनंद में भरकर डोल रही हैं।
श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर प्रेम-रस की माधुरी में सराबोर दृष्टिगोचर हो रहे हैं; उनके हृदयों में अनुराग का अगाध सिन्धु उमड़ रहा है। श्रीप्रियाजी के मुख-कमल के मकरन्द का पान कर सौभाग्यशाली श्रीलालजी का मन-रूपी भ्रमर पूर्णतः मत्त हो उठा है।
श्रीश्यामसुंदर ने नेत्रों के संकेतों द्वारा अपनी विनती मानिनी श्रीराधा के समक्ष प्रस्तुत की, और श्रीप्रियाजी ने भी नयनों के संकेत से ही उस विनती को स्वीकार कर लिया। किंतु जब श्रीकृष्ण ने अत्यंत विनम्र होकर अपना मस्तक श्रीराधा के श्रीचरण-कमलों पर रखकर मनुहार की, तब लाड़िलीजी अपने मान का परित्याग कर पूर्णतः प्रसन्न हो उठीं।
श्रीवृन्दाबिपिन में सर्वत्र वसन्त की शोभा छायी हुई है। इसमें विहार-परायण श्रीराधा-कृष्ण की जोड़ी नवल है। उनके समीपस्थ सारी साज-सज्जा भी नवल है। श्रीधाम वृन्दावन भी नवल है, नवल कुसुमावलि फूली हुई है तथा ऋतुराज वसन्त भी तो नवल ही है।
श्री वृंदावन निजधाम में नित्य विहार परायण इस सुंदर जोड़ी के समक्ष चौदह भुवन का सौंदर्य भी गौण कोटि का लगता है।
हे राधे! मन, वाणी एवं कर्म से भी जिनका दर्शन संभव नहीं, जो हर प्रकार से अति दुर्लभ हैं, वे प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे चरणों में अपना सिर रखते हैं। सचमुच ही राधे! तुम्हारे प्रेम की बात निराली है, जो कहते ही नहीं बनती।
श्रीप्रिया-प्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंबित नेत्र, देखने वाले के नेत्रों में मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीश्यामाश्याम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं।
वर्षा से बचने के लिए प्रिया-प्रियतम सघन कुंजों के नीचे खड़े हैं, जहाँ कामदेव भी आनंदवृद्धि की सेवा कर रहा है। ऐसे युगल किशोर (श्री राधा कृष्ण) को वर्षा में भींजते हुए, आपस में लिपटे हुए, कब इन नैनों से देखूँगा?
हे श्री राधे, मैं बिनामोल का आपका सेवक हूँ, जैसा आप चाहे वैसा करें, लेकिन मुझे मुरली प्रदान कर दीजिये, मैं आपसे विनती करता हूँ।
हे भामिनी श्रीराधे! वर्षा की इन मंद-मंद फुहारों से आपके वस्त्र भीग रहे हैं; अतः कृपा कर क्षण-भर के लिए मेरे इस छत्र की छाया में आकर वर्षा से अपनी रक्षा कर लीजिए।
एक दिन श्रीप्रियाप्रियतम वंशीवट के निकट श्रीयमुना किनारे बैठ जल में अपनी चंचल परछाईं देख अति प्रसन्न होते हैं।
जिस साधक के मन को श्री वृंदावन धाम रूपी आनंद-मेघ ने अपने वश में कर लिया है, वह सहज ही युगल किशोर श्री श्यामा-श्याम के रूप-रस-सागर में अपनी समस्त सुध-बुध भुलाकर निमग्न हो जाता है।
जब श्री प्रिया प्रियतम वृन्दावन के निकुंजों से आ रहे होते हैं तो मेह बरसने लगते हैं । जैसे जैसे श्री राधा की सुंदर चुनरी भींजने लगती है वैसे वैसे श्री लालजी [कृष्ण] उन्हें अपने ह्रदय से लगा लेते हैं ।
श्री प्रिया-प्रियतम की गौर-श्यामल जोड़ी अत्यंत शोभायमान है। सहचरियाँ उनकी छवि को निहार-निहार कर प्रेमपूर्वक आरती उतारती हैं।
हे मदनगोपाल! इस जीव को अपना निजी दास मानकर अपने श्रीचरण-कमलों की सहज, स्वाभाविक और रसमयी सेवा प्रदान कीजिये, तथा मुझे सदैव अपनी ही शरण में रखिये।
श्री वृन्दावन में नित्य-विलास की लीलाएँ सम्पन्न करने वाले श्री प्रिया-प्रियतम ही हमारे सदा सेव्य हैं। नंदनंदन श्री कृष्ण और वृषभानु-नंदिनी श्री राधिका के चरणारविंदों की अनन्य उपासना ही हमारा व्रत है।
हे श्रीराधे! आपके अनुपम रूप की उपमा भला किससे दी जा सकती है? आपके नयनों के कोर के कटाक्षों के वशीभूत होकर श्रीश्यामसुंदर अपना सर्वस्व न्योछावर कर पूर्णतः आपके ही होकर रह गए हैं।
श्रीवृन्दावन की निभृत निकुञ्जों में श्रीप्रिया-प्रियतम विहार कर रहे हैं। श्रीप्रियाजी के वक्ष पर पुष्प-हार को देख श्रीलालजी का मन प्रेम की मधुर अभिलाषाओं से उत्कंठित हो उठता है और वे प्रियाजी से उनके हृदय से स्पर्श किए हुए हार की याचना करते हैं।