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  1. हम भूखे ब्रज की गारी के - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (132)

    भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ।

  2. अहो नवलाल पिय विनय सुन लीजिये - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए।

  3. नव कुँवर चक्र चूड़ा नृपतिमनि साँवरौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (46)

    श्री वृंदावन धाम प्रेम की राजधानी है जहां के राजा नायक शिरोमणि श्री श्‍याम सुन्‍दर और रानी तरुणि-मणि श्री राधिका हैं । पाताल से वैकुंठ तक के सब लोकों का स्वामी यह वृंदावन धाम है ।

  4. अहो नव लाल पिय विनय सुनि लीजिये - श्री रामसखी जी, श्री भक्तिरस मंजरी

    हे नवनागर लाल पिय [श्री कृष्ण], मेरी यह विनती सुन लीजिए! मुझे श्री धाम वृंदावन का वास प्रदान कर, कुंजों की महल टहल जैसे सोहनी सेवा आदि देकर कृतार्थ कीजिए ।

  5. नवधा भक्ति निमित्त लै, जे सेबत अवतार - श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित्य बिहारी जुगल ध्यान (129)

    जो साधक मुक्ति, बैकुंठ‑प्राप्ति या किसी भी अन्य सिद्धि‑कामना को लक्ष्य बनाकर नवधा भक्ति का आश्रय लेते हैं और भगवान के अवतारों की उपासना करते हैं, वे इस विशुद्ध प्रेममयी रस‑उपासना के अधिकारी नहीं माने जाते।

  6. नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (347)

    न तो मुझे वैकुण्ठ चाहिए, न ही ब्रह्मानंद चाहिए । न मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम चाहिए, न ही नंदलाल श्री कृष्ण ।

  7. सुनो मन यह अनन्य की रीत - श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119)

    हे मन! मैं तुमको अनन्य प्रेम का सिद्धांत समझाता हूँ, ध्यान देकर सुनो । श्यामा- श्याम का अनन्य प्रेमी केवल श्यामा-श्याम एवं उनके परिकर (सेवक) रसिक-जनों के सिवाय अन्यत्र कहीं भी, स्वप्न में भी, अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ता ।

  8. यशोदा कुण्ड एवं हाऊबिलाऊ - नंदगांव

    यशोदा कुण्ड का नाम यशोदा जी पर इसलिए है कि यहाँ यशोदा जी प्रतिदिन स्नान करती थीं । कभी-कभी कृष्ण और बलराम को भी साथ लाती थीं तथा उन दोनों बालकों की बाल क्रीड़ा का दर्शनकर अत्यन्त आनन्दित होती थीं ।

  9. वृंदावन मोकों अति भावत - श्री सूरदास, सूर सागर

    श्री श्यामसुन्दर कहते हैं: अरे सब सखाजन सुबल, श्रीदामा, तुम लोग सुनो! वृन्दावन मुझे बहुत प्रिय है, इसी कारण व्रज से मैं यहाँ वन में गायें चराने आता हूँ ।

  10. देस विदेश भिखारिया - श्री बिहारी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (31)

    भिखारी की भाँति विषयों के लिए देश-विदेश भटकने से भीखरूपी दुःख ही प्राप्त होगा और श्री वृन्दावन की रज का सेवन किए बिना बैकुण्ठ की प्राप्ति भी दुःख देने वाली भीख के समान है। अर्थात् श्री वृन्दावन के रजोपासक रसिक संत के लिए संसार का समस्त वैभव—यहाँ तक कि बैकुण्ठ-धाम का वास भी—दुःखप्रद है; उनका एकमात्र विश्राम तो श्री वृन्दावन की में रज ही है।

  11. प्रथम महातम प्रकृति - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (45)

    आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्रीस्वामीहरिदासी का मंगल भवन है, इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवतरसिकजी कहते हैं:

  12. व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (146)

    ब्रज का रस वैकुंठधाम में भी नहीं है। जब हरि की कथा अत्यंत मीठी लगती है तभी ब्रजरस मिलता है। ब्रजरस के बिना ऐसा क्या है जो रसिकों ने गाया है अर्थात ब्रज रस ही रसिकों ने गाया है, यदि आप ब्रज को हटा (नज़र अंदाज़) देंगे तो आपका सारा रस ही मर (खत्म) जाएगा। ब्रज महिमा को केवल वही जानता है जिसका ब्रज से नाता है।

  13. हमें तो अली लली सौं काम - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (135)

    अरी सखी! मुझे तो एकमात्र किशोरी जी से ही काम है। जो रसिकों को रिझाने वाली गुणों की खान एवं रूप रस की सीमा हैं। पूर्णकाम श्यामसुन्दर भी जिनकी दिन-रात चाकरी करते हैं।

  14. सखी सबै उडगन मनौं - श्रीध्रुवदास जी, बयालीस लीला, आनंदाष्टक लीला

    श्री वृंदावन नित्य विहार के नित्य नव निभृत निकुञ्ज विलासी चतुर्व्यूह परिकर का संक्षिप्त परिचयात्मक रूपक प्रस्तुत करते हुए श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि आनंद धाम श्रीवृंदावन ही मानो एक निरभ्र, प्रेमाकाश है।

  15. प्रिया बिन सुद्ध प्रेम नहीं पावै - श्री ललित किशोरी, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (45)

    इस पृथ्वी मंडल या बैकुंठ धाम या फिर कहीं किसी भी लोक चले जाओ परंतु यह निर्विवाद सत्य है कि सर्वोपरि श्री वृंदावन की अनन्य विलासिनी श्री नित्य बिहारिनि श्री राधा के बिना कहीं प्रेम का विशुद्ध पूर्णतम दाता नहीं है ।