भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)
हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक आपके नाम का उच्चारण करेगा? मेरे हृदय में ऐसी निष्कपट और अखण्ड प्रीति-दशा की प्राप्ति कब होगी?
