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  1. भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)

    हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक आपके नाम का उच्चारण करेगा? मेरे हृदय में ऐसी निष्कपट और अखण्ड प्रीति-दशा की प्राप्ति कब होगी?

  2. बहुत भूमि इत-उत फिरयौ - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी

    बहुत समय से मैं माया से मोहित होकर संसार में यहाँ-वहाँ भटक रहा हूँ। हाय! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे पाँव वास्तव में सफल होंगे — जब वे वृंदावन की ओर बढ़ेंगे और कभी वापस नहीं लौटेंगे।

  3. रतन-खचित वृदाविपुन भूमि लता-द्रुम रंग - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (22)

    श्रीधाम वृंदावन की दिव्य भूमि रत्नों से जड़ित है, जहाँ रंग-बिरंगी लताएँ और विविध रंगों के वृक्ष सौंदर्य बिखेर रहे हैं। उसी परम पावन भूमि पर श्री स्वामी हरिदास जी के लाड़ले श्यामा-कुंजबिहारी, प्रेम-केलि में उन्मत्त होकर नित्य विहार रस बरसा रहे हैं।

  4. सबहीं भूमि गोपाल की या में अटक कहा - ताज़ बेगम (ताज़ बीबी)

    समस्त संसार ही भगवान श्रीकृष्ण का है, इसके कण-कण में वे समाए हुए हैं। यह संसार किसी को बाधा नहीं पहुँचाता। वास्तव में जीव का अपना ही मन राग एवं द्वेष रूपी विकारों में अटका (फँसा) होता है। यदि मन को भगवान के भजन में लगा दिया जाए, तो इसकी समस्त अटकन सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाए और वह जीव परम निर्भयता को प्राप्त कर ले।

  5. कंचन की यह भूमि है - श्री चरणदास, भक्ति सागर

    श्रीधाम वृंदावन की यह भूमि स्वर्ण जैसी है, जिसने सतोगुण रूपी आभूषण धारण कर रखा है। श्री चरणदास बार बार बलिहारी जा रहे हैं, जिसे केवल दिव्य दृष्टि से ही निहारा जा सकता है।

  6. गिरि-पति लागी मेरु - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)

    पर्वतराज हिमालय स्वयं मेरु पर्वत के अधीन हैं। मेरु पर्वत पृथ्वी के अधीन है। पृथ्वी का आधार शेषनाग, वराह, कच्छप और जलमय स्वरूप हैं — अतः पृथ्वी इन आधारों के अधीन है।

  7. काँटेदार करील के वृक्ष जिस भूमि पर - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (30)

    जिस भूमि पर काँटेदार करील के वृक्ष हैं, और जहाँ हर ओर खारे जल से भरे कूप ही दिखाई देते हैं।

  8. फिरति रहे वन भूमि में झूमि नैन अकुलाय - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (21)

    मैं श्री वृंदावन धाम की परम पावन भूमि में आनंदपूर्वक झूमते हुए विचरण करूँ, जहाँ मेरे नयन सदैव दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण के दर्शन की लालसा में व्याकुल रहें। वहाँ की रज में अपने तन को बार-बार लोटाऊँ, फिर उठकर प्रिया प्रियतम के अनुपम रूप और गुणों का प्रेमपूर्वक गान करूँ।​

  9. कमला तप साधि अराधति है - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (467)

    श्री लक्ष्मी जी तप-साधना द्वारा श्री कृष्ण की आराधना करती हैं, मानो अभिलाषा रूपी महोदधि (समुद्र) में अवगाहन करने के लिए तपस्या कर रही हों।

  10. श्री राधा पद पद्म रस, पगी रसीली भूमि - ब्रज के दोहे

    मैं श्री वृषभानुपुर (बरसाना धाम) को प्रणाम करता हूँ, जहाँ की रसीली भूमि श्री राधा के चरणों के रस से पगी हुई है और जहाँ के वृक्ष एवं लताएँ, प्रेम में विभोर होकर, झूम रहे हैं।

  11. छबि निधि बिहरत प्रीतम प्यारी - श्री किशोरी अलि

    सुंदरता की निधि, श्री प्रीतम प्यारी (श्री राधा कृष्ण), वृंदावन में विचरण कर रहे हैं। वे सघन बादलों से बरसते हुए जल और वृंदावन के हरे-भरे वनों को निहार रहे हैं।

  12. भूमि जानि व्रज भूमि निज मंत्र श्री राधे श्याम - श्री चरण दास

    व्रजभूमि को ही निज अपनी भूमि मानो, और मंत्र "श्री राधे श्याम" का निरंतर जप करो । इसे परम पावन गायत्री मानो क्योंकि यह समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है ।

  13. वंशीवट तट निकट भूमि - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (3)

    यमुना तट के निकट वंशीवट की भूमि सदा वृक्षों और लताओं से आच्छादित हरिभरी रहती है जहां सर्वदा पिय प्यारी (राधा कृष्ण) नित्य विहार पारायण हैं।

  14. जापै कृपा कर श्रीराधा - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (140)

    जिस पर श्री राधा कृपा करतीं हैं केवल उसे ही श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होता है। श्री वृन्दावन दिव्य एवं अलौकिक है, यहाँ की भूमि सुहावनी है, जो युगल दम्पति श्री श्यामाश्याम का निज धाम कहलाता है।

  15. कौन भूमि की माधुरी डोलनि परमानंद - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (60)

    ब्रज भूमि के अतिरिक्त ऐसी कौन सी भूमि है जिसकी ऐसी विशेष माधुरी है जहां पर परमानंद डोलता हुआ फिरता है । ऐसा कौन सा रसिक कवि है जो इसकी महिमा कहने में समर्थ है, इसे तो केवल ब्रज चन्द्र श्री कृष्ण ही जानते हैं ।

  16. कहा भयौ वृंदावनहि बसै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (262)

    श्री धाम वृंदावन में यदि वास भी मिल गया तो ऐसा क्या हो गया क्योंकि जब तक लोभ एवं पाखंड रूपी माया से वे ग्रसित है तब तक उसने घर को त्याग कर भी ऐसा क्या कमाल कर दिखाया?