gopi

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  1. किया था गोपियों ने यहीं - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (23)

    गोपियों ने मन को चुराने वाले चंचल श्रीकृष्ण को पाने की तीव्र लालसा में इसी श्रीधाम वृन्दावन में श्री कात्यायनी देवी का व्रत किया था।

  2. शोभा युगल किशोरकी को कवि - ब्रज के दोहे

    श्री युगल किशोर (राधा-कृष्ण) की अलौकिक शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है? वे दोनों मन को मोहने वाले शीतल चंद्रमा के समान पवित्र हैं और समस्त गोपियों के जीवन के एकमात्र धन और प्राण हैं।

  3. आनँद भवन वृषभान कै - श्री चतुर्भुज दास

    राजा वृषभान के घर में आज परम आनंद का धाम छा गया है, क्योंकि माता कीर्ति के महल में एक ऐसी लाड़ली पुत्री ने जन्म लिया है, जिसके समान अलौकिक और सुंदर कोई दूसरी किशोरी इस संसार में नहीं है।

  4. नैन बैन मन श्रवण सब - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (16)

    विरहाकुल गोपी के नेत्र, वाणी, मन एवं कर्ण प्रियतम श्यामसुंदर के पास ही चली गई हैं। उनके शरीर-रूपी घट में केवल थोड़े-से प्राण ही इस आशा से शेष हैं कि प्रियतम पुनः लौटकर आएँगे।

  5. प्रभु के दो ही दास हैं साँचे - श्री रूप कुँवरि जी

    इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं।

  6. बड़े जोर की प्यास लगी उर में - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

    हे सखा! मेरे हृदय में आपके मिलन की बड़े ज़ोर की प्यास जगी है, आप शीघ्र आकर मुझे अपने अधरों का दिव्य अमृत (अधरामृत) पिलाकर तृप्त कर दीजिए।

  7. यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)

    हे गोपीजनवल्लभ (श्री कृष्ण)! मैं आपसे बस यही वरदान माँगता हूँ की जब जब भी मुझे मनुष्य जन्म प्राप्त हो, श्री हरि की सेवा मिले और श्री ब्रजधाम का ही वास प्राप्त हो।

  8. नन्दगाँव गोकुल गोवर्धन की काह कहौं - श्री मधुरेश जी

    नन्दगाँव, गोकुल और श्री गोवर्धन की ऐसी अगाध महिमा है कि इसका कहाँ तक वर्णन करूँ? वहाँ की गोपियों, गोपों, ग्वालबालों और गायों की शोभा का बखान करना शब्दों की सीमा से परे है।

  9. साँचौ निहचै प्रेम कौ जीवन मुक्ति रसाल - श्री सूरदास, सूर सागर (4713.26)

    उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मुक्ति है और जब जीवन में श्री गोपाल के प्रति प्रेम दृढ़ हो जाता है, तो वे अवश्य मिल जाते हैं।

  10. चितवत चित करषत जिते - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (54)

    श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।

  11. प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला - श्री पुरुषोत्तम जी

    नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।

  12. हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति - श्री सूरदास, सूर सागर (4713.15)

    जब उद्धव योग की युक्ति-विधि की चर्चा करते हैं, तब ब्रज की गोपियाँ उत्तर देती हैं— हम तो सीधी-सादी ग्वालिनें हैं, हम योग साधने की क्रिया कैसे समझेंगी? तुम ही बताओ श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम के एकमात्र व्रत को छोड़ कर कौन दीवार पर बने चित्र या अंकित चिह्न/अक्षर आदि की पूजा करेगा?

  13. मनमोहन तें बिछुरी जबसौं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (116)

    एक विरहिणी गोपी अपनी पीड़ा व्यक्त करती है कि जब से प्राणप्रिय मनमोहन से बिछुड़ी हूँ, मेरा यह शरीर नित्य अश्रुओं की धारा से प्रक्षालित (धुलता) होता रहता है।

  14. प्राणनाथ या जगत में सो अभागिनी नार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, रास पंचाध्यायी लीला (11)

    एक गोपी कहती है—हे प्राणनाथ (श्री कृष्ण)! इस संसार में वह स्त्री (अथवा जीव-रूपी नारी) अत्यंत अभागिनी है, जो आपको त्यागकर पुनः सांसारिक कुटुंब और परिवार के सुखों की चाहना करती है।

  15. नमो नमो जु भक्ति रिझवार - श्री वृंदावन दास जी

    मैं उन भगवान शिव को बार-बार नमस्कार करता हूँ जो केवल भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं। जिनका नाम जगत में 'गोपेश्वर' (गोपियों के ईश्वर) के रूप में प्रसिद्ध है, वे ही इस वृंदावन के रक्षक (कोतवाल) हैं।

  16. यत्पादाम्बुरुहेक रेणु-कणिकां - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (72)

    जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय की प्रबल गति से साधारण गोपी सी प्रतीत हो गई हैं — हे दैव (काल)! तुम्हें नमस्कार है।