नेति नेति कहि ताहि वेदहू - श्री चरणदास, भक्ति सागर
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
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वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं।
हे सखा! मेरे हृदय में आपके मिलन की बड़े ज़ोर की प्यास जगी है, आप शीघ्र आकर मुझे अपने अधरों का दिव्य अमृत (अधरामृत) पिलाकर तृप्त कर दीजिए।
हे गोपीजनवल्लभ (श्री कृष्ण)! मैं आपसे बस यही वरदान माँगता हूँ की जब जब भी मुझे मनुष्य जन्म प्राप्त हो, श्री हरि की सेवा मिले और श्री ब्रजधाम का ही वास प्राप्त हो।
नन्दगाँव, गोकुल और श्री गोवर्धन की ऐसी अगाध महिमा है कि इसका कहाँ तक वर्णन करूँ? वहाँ की गोपियों, गोपों, ग्वालबालों और गायों की शोभा का बखान करना शब्दों की सीमा से परे है।
उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मुक्ति है और जब जीवन में श्री गोपाल के प्रति प्रेम दृढ़ हो जाता है, तो वे अवश्य मिल जाते हैं।
श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।
नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।
जब उद्धव योग की युक्ति-विधि की चर्चा करते हैं, तब ब्रज की गोपियाँ उत्तर देती हैं— हम तो सीधी-सादी ग्वालिनें हैं, हम योग साधने की क्रिया कैसे समझेंगी? तुम ही बताओ श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम के एकमात्र व्रत को छोड़ कर कौन दीवार पर बने चित्र या अंकित चिह्न/अक्षर आदि की पूजा करेगा?
एक विरहिणी गोपी अपनी पीड़ा व्यक्त करती है कि जब से प्राणप्रिय मनमोहन से बिछुड़ी हूँ, मेरा यह शरीर नित्य अश्रुओं की धारा से प्रक्षालित (धुलता) होता रहता है।
एक गोपी कहती है—हे प्राणनाथ (श्री कृष्ण)! इस संसार में वह स्त्री (अथवा जीव-रूपी नारी) अत्यंत अभागिनी है, जो आपको त्यागकर पुनः सांसारिक कुटुंब और परिवार के सुखों की चाहना करती है।
देश-देशान्तर के अनेक व्यक्ति यहाँ खिंचे चले आते हैं, जिनके हृदय में प्रेम की प्रज्वलित ज्वाला धधक रही है।
मैं उन भगवान शिव को बार-बार नमस्कार करता हूँ जो केवल भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं। जिनका नाम जगत में 'गोपेश्वर' (गोपियों के ईश्वर) के रूप में प्रसिद्ध है, वे ही इस वृंदावन के रक्षक (कोतवाल) हैं।
जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय की प्रबल गति से साधारण गोपी सी प्रतीत हो गई हैं — हे दैव (काल)! तुम्हें नमस्कार है।
उद्धव कहते हैं — यदि मैं वृन्दावन में किसी झाड़, लता अथवा औषधि के रूप में जन्म ले पाता, तो कितना सौभाग्यशाली होता, जिससे मैं इन गोपियों की चरण-रज का सेवन कर पाता।
ब्रह्मा और इन्द्र कहते हैं—हमें ब्रह्मलोक अथवा स्वर्गलोक के सम्राट की पदवी नहीं चाहिए। यदि ब्रज में एक वृक्ष बनने का भी सौभाग्य मिल जाए, तो हम सदा वहीं बने रहना चाहेंगे।
श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर रही हैं।
एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?
हे सखी! नील मेघ सदृश कोई छबीली रूप-मूर्ति (श्री कृष्ण) इस वृन्दावन में क्रीड़ा कर रही है। उनके अंग-अंग पर विविध आभूषण सुशोभित हैं, अधरों पर मधुर बंसी विराजमान है, और उनकी परछाईं तक की शोभा भी मन को मोहित कर लेती है।
एक बार मीराबाई ने तुलसीदास जी से पूछा — “मेरे परिवारवाले भजन-मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं, मुझे क्या करना चाहिए?” इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास जी ने यह पद रचकर उन्हें भेजा। जिसको भगवान राम प्रिय न हों अर्थात् जिसका भगवान से प्रेम न हो, भले ही वे हमारे अत्यन्त स्नेही क्यों न हों, फिर भी उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए।