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  1. धन-धन वृन्दावन के साँप प्यारे - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (81)

    वृंदावन धाम के वे प्यारे सर्प अत्यंत धन्य हैं, जो वास्तव में काले भुजंग होकर भी सीधे ठाकुर जी के मंदिर में निवास करते हैं और वहाँ बोलते हैं।

  2. तत्समो नास्ति तीर्थोऽन्यो न च - सनत्कुमार संहिता (32.1)

    हे मुनि! ब्रज-वृंदावन के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। यहाँ तक कि वैकुण्ठ भी उसकी समानता नहीं कर सकता, फिर अन्य तीर्थों की तो बात ही क्या! इस धाम की तुलना में वे सभी अंधे कुओं के समान हैं।

  3. टेरत राधा-नाम टरे न मुख - श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (36)

    श्री राधा के वियोग में श्री कृष्ण 'राधा' नाम की निरंतर पुकार कर रहे हैं, एक क्षण को भी मुख से नहीं भुला रहे। समस्त विश्राम को त्याग कर अब तो केवल यही लालसा है कि कब प्रिया जी की उस बाँकी चितवन की रसमय झाँकी प्राप्त होगी।

  4. रूप रस मांते महा प्रेम - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)

    जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।

  5. दया नाव हरिनाम की सतगुरु - श्री दयाबाई

    दयाबाई कहती हैं कि हरिनाम भवसागर से पार उतारने वाली नौका है और सतगुरु उसके खेवनहार हैं। यदि वास्तविक संत का सच्चा संग प्राप्त हो जाए, तो इस संसार-सागर को पार करने में तनिक भी विलम्ब नहीं होता।

  6. सब तजि कीजिये सतसंग भक्ति - श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा (31)

    अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के अटूट व अखंड प्रेम को दिलाने वाला है।

  7. रसना! श्रीराधाबल्लभ कहि री - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (205)

    हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर।

  8. राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)

    श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।

  9. जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को - श्री रूपचंद जी ‘भूप’

    साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।

  10. न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

    भगवान कहते हैं— मेरे परम पावन धाम ब्रज की प्राप्ति न तो पुण्य कर्मों से होती है, न दान से, न तपस्या से और न ही स्तुति-प्रार्थनाओं से। विविध प्रकार के योग-साधनों द्वारा भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दिव्य धाम केवल मेरी अहैतुकी कृपा और अनुग्रह से ही प्राप्त होता है।

  11. समता वृन्दाविपिन की - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.70)

    श्री वृन्दावन धाम अद्वितीय है, उसकी तुलना भला किससे की जा सकती है? वहाँ निवास करना तथा उसके पावन यमुना-तट पर प्राण त्यागना परम मंगलमय और आनन्ददायक है।

  12. लाड़ो तुम ही हो मम भाग - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (43)

    हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।

  13. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  14. पिता सुत बंधु कहा सम्बंध - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35)

    हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के जितने भी नाते हैं, वे मूलतः स्वार्थ की नींव पर टिके हैं। यहाँ वास्तविक निस्वार्थ प्रेम की सुगंध तक नहीं है, इसलिए केवल अज्ञानी लोग ही इन संबंधों में उलझते हैं।

  15. आनदेश के गमन को - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (34)

    हे भाई! अपने मन में किसी अन्य स्थान या देश में जाने का विचार स्वप्न में भी न लाओ। श्री धाम वृन्दावन का यह परम-पावन वास और यहाँ होने वाला श्री युगल-सरकार का नित्य-विहार भला अन्यत्र कहाँ सुलभ है? अतः जो परम सौभाग्य तुम्हें यहाँ प्राप्त है, उसका त्याग कर कहीं और जाने की कल्पना भी मत करो।