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  1. रसना! श्रीराधाबल्लभ कहि री - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (205)

    हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर।

  2. राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)

    श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।

  3. जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को - श्री रूपचंद जी ‘भूप’

    साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।

  4. न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

    भगवान कहते हैं— मेरे परम पावन धाम ब्रज की प्राप्ति न तो पुण्य कर्मों से होती है, न दान से, न तपस्या से और न ही स्तुति-प्रार्थनाओं से। विविध प्रकार के योग-साधनों द्वारा भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दिव्य धाम केवल मेरी अहैतुकी कृपा और अनुग्रह से ही प्राप्त होता है।

  5. समता वृन्दाविपिन की - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.70)

    श्री वृन्दावन धाम अद्वितीय है, उसकी तुलना भला किससे की जा सकती है? वहाँ निवास करना तथा उसके पावन यमुना-तट पर प्राण त्यागना परम मंगलमय और आनन्ददायक है।

  6. लाड़ो तुम ही हो मम भाग - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (43)

    हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।

  7. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  8. पिता सुत बंधु कहा सम्बंध - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35)

    हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के जितने भी नाते हैं, वे मूलतः स्वार्थ की नींव पर टिके हैं। यहाँ वास्तविक निस्वार्थ प्रेम की सुगंध तक नहीं है, इसलिए केवल अज्ञानी लोग ही इन संबंधों में उलझते हैं।

  9. आनदेश के गमन को - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (34)

    हे भाई! अपने मन में किसी अन्य स्थान या देश में जाने का विचार स्वप्न में भी न लाओ। श्री धाम वृन्दावन का यह परम-पावन वास और यहाँ होने वाला श्री युगल-सरकार का नित्य-विहार भला अन्यत्र कहाँ सुलभ है? अतः जो परम सौभाग्य तुम्हें यहाँ प्राप्त है, उसका त्याग कर कहीं और जाने की कल्पना भी मत करो।

  10. वृन्दावन नीरस रसिक बनावत - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    श्री वृन्दावन धाम की यह अपार महिमा है कि वह शुष्क हृदय वाले व्यक्ति को भी प्रेम के रस से सराबोर कर रसिक बना देता है। जो संसार का मोह त्याग कर इस पावन भूमि की शरण में आता है, यह धाम उसके समस्त संताप और दोषों का अंत कर देता है।

  11. श्रीराधा पद कमल रेणु कौ - श्री अनुराग सखी जी

    यदि किसी ने श्री राधा के चरण-कमलों की रज की सम्यक उपासना नहीं की और श्री वृन्दावन की उस पावन रज का आश्रय नहीं लिया जो उनके चरण-चिह्नों से अंकित है; तथा श्री राधा को नित्य लाड़ लड़ाने वाले वृन्दावन के प्रेमी-रसिकों का सत्संग नहीं किया, तो उसके लिए श्री श्यामसुन्दर रूपी रस-सागर में अवगाहन करना सर्वथा असंभव है।

  12. धन धन वृन्दावन जमुना जल पानी - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (02)

    श्री वृन्दावन में प्रवाहित होती श्री यमुना जी का जल परम धन्य है। जब यमुना जी की लहरें उठकर शरीर का स्पर्श करती हैं, तो वे संचित पापों के घने समूह (परतों) को सहजता से काट देती है।

  13. अग्र काम हरिनाम से, संकट होत सहाय - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

    श्री अग्रदास जी कहते हैं कि श्रीहरि का नाम ही जीव का सच्चा हितैषी है और नाम-स्मरण ही समस्त प्रकार के संकटों में सहायक सिद्ध होता है। इस संसार में कोई भी वास्तव में किसी का अपना नहीं है—इस सत्य को भली-भाँति जाँच-परख कर स्वयं देख लो।

  14. चले पिय भाँवती रस लेन - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उनकी गति कामदेव के समान अत्यंत मतवाली और लुभावनी हो गई है।