676 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

    हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही एकमात्र शरण व सर्वस्व हैं, किंतु आपके लिए तो मेरे जैसे अनगिनत जीव व अनुरागी हैं। अतः हे प्राणप्रियतम! आप जैसा भी उचित समझें वैसा व्यवहार करें, बस ऐसी कृपा करें कि हमारे इस निष्काम प्रेम की प्रतिज्ञा का सदा निर्वाह होता रहे।

  2. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  3. आरती राधिका-लाल पर वारौं सहज - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20)

    मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।

  4. राधेराधे नामकी जकलागै ये वीर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)

    हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।

  5. विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।

  6. बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

    हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।

  7. गौरांगी श्रीराधिका प्रीतम की उरहार- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (01)

    गोरे अंगों वाली श्रीराधिका अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय का हार हैं। वे सबके मन को मोहने वाले (मनमोहन) श्रीकृष्ण के मन को भी मोहने वाली हैं तथा अत्यंत कृपालु और परम उदार हैं।

  8. बहुत दिवस देखे बिन बीते - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (86)

    हे ललित लाड़ैती श्री राधे! आपके दर्शन किए बिना बहुत दिन बीत गए हैं। यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो और उसी के कारण आप मुझसे विमुख अथवा उदास हो गई हों, तो कृपापूर्वक उस अपराध को अब क्षमा कर दीजिए और मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए।

  9. आय निकस ठाड़े भये थकित - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (282)

    जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।

  10. जो कराय सो कीजिये जो - श्री सरस माधुरी

    भगवान के वास्तविक भक्त के लक्षण बताते हुए सरस माधुरी कहते हैं कि प्रभु उससे जो कराते हैं, वह उसी में अपनी प्रसन्नता मानता है। वे जो सुख-दुःख अथवा जीवन की परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, उन्हें वह प्रभु का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। प्रभु उसे जहाँ रखते हैं, वह वहीं संतोषपूर्वक रहता है। यही एक सच्चे दास का धर्म एवं सर्वोत्तम साधन है।

  11. वौरी ह्वै मग डोलिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)

    हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।

  12. जय जय जमुना सब सुखकारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)

    सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।

  13. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  14. मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

    मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।

  15. भाव अनोखी वस्तु है जो कर जाने कोय - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (5)

    ‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।

  16. रस लोभी दम्पति महा अधिक एक ते एक - श्री सरस माधुरी

    यह दिव्य दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) रसास्वादन के अत्यंत लोभी हैं, और रस की उस प्यास में दोनों एक-दूसरे से बढ़कर हैं। उनके हृदय का यही एक दृढ़ संकल्प है कि वे एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते।

  17. भुजा परस्पर अंश दे - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।

  18. मृगनैनी आमोदनी महामोद की रास - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (40)

    हे मृग के समान चपल और सुंदर नेत्रों वाली, आनंद प्रदान करने वाली, साक्षात् महा-आनंद की पुंज, श्री राधा महारानी! हे गोवर्धन, वृंदावन के वनों और यमुना के तटों पर विलास (क्रीड़ा) करने वाली स्वामिनी! आप कृपा करके मेरे मन में सदैव निवास करें।

  19. आनदेश के गमन को - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (34)

    हे भाई! अपने मन में किसी अन्य स्थान या देश में जाने का विचार स्वप्न में भी न लाओ। श्री धाम वृन्दावन का यह परम-पावन वास और यहाँ होने वाला श्री युगल-सरकार का नित्य-विहार भला अन्यत्र कहाँ सुलभ है? अतः जो परम सौभाग्य तुम्हें यहाँ प्राप्त है, उसका त्याग कर कहीं और जाने की कल्पना भी मत करो।