madhuri

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  1. यह उत्कंठा की लता चली - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (15)

    मेरे हृदय में उत्पन्न हुई तीव्र उत्कंठा रूपी लता बड़ी शीघ्रता से मुरझाने लगी है। यदि आप दोनों घन-दामिनी स्वरूप श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अति शीघ्र पधारकर इस पर अपनी कृपा-जल की वर्षा नहीं करेंगे, तो यह लता विरह की अग्नि में सूखकर नष्ट हो जाएगी।

  2. लता कुंज वृंदा बिपिन बिहरें - श्री सरस माधुरी

    श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।

  3. रसिक रसीली रसभरी रसरूपा रस - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (02)

    समस्त रसिकों को परम रस प्रदान करने वाली श्रीराधारानी स्वयं रसस्वरूपिणी और दिव्य प्रेम-रस की सारस्वरूपा हैं। वे ही समस्त रसिकों की एकमात्र जीवन-प्राण तथा समस्त सखियों की परम स्वामिनी हैं।

  4. जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

    वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।

  5. अँग अँग माहीं जव लगै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

    जब श्रीधाम वृंदावन की परम-पावन रज मेरे अंग-अंग को स्पर्श करती है और नेत्रों से निष्काम प्रेम के अश्रु बहने लगते हैं, तभी इस जीवन में सच्चे सुख और परम शांति की अनुभूति होती है।

  6. राधा-राधा रट रही रसना प्रेम - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा प्रेम स्वरूपनी वर्णन (1)

    जीभ निरंतर प्रेम के परम सुंदर नाम 'राधा-राधा' का ही रटन कर रही है। श्री राधा साक्षात् प्रेम का धाम हैं और वे ही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।

  7. खग मृग द्रुम सेवत सदा - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (284)

    पक्षी, मृग और वृक्ष अपने अति सरस व अलौकिक रूप को धारण करके इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो परम पावन वंशीवट वृन्दावन धाम का सम्राट् होकर शोभायमान हो रहा है।

  8. हों सबभांति विगारी प्यारी तुम - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (121)

    हे प्यारी जी! मैं सब प्रकार से बिगड़ा हुआ हूँ, अब आप पतितों का उद्धार करने के अपने विरद (स्वभाव) को संभालिए। मैंने अपने अनेक जन्म अज्ञानता की नींद में सोकर ही गँवा दिए हैं, इसलिए अब आप मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालिए।

  9. विहारिणि तुमरोही विस्तार रहत - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    हे श्री विहारिणी जी! यह संपूर्ण लीला-विलास और ऐश्वर्य आपका ही विस्तार है। प्रियतम श्री विहारी जी सदा आपके ही रुख (संकेत और इच्छा) की ओर निहारते रहते हैं और उसी के अनुसार अनंत क्रीड़ाओं की रचना करते हैं।

  10. ऐसौ अद्भुत प्रेम है दम्पति - श्री सरस माधुरी

    दिव्य दम्पति के अंगों में परस्पर ऐसा अद्भुत और विलक्षण प्रेम व्याप्त है कि वे नित्य निरंतर सर्वदा एक-दूसरे के साथ ही रहते हैं, फिर भी उन्हें कभी तृप्ति नहीं होती है।

  11. तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

    हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही एकमात्र शरण व सर्वस्व हैं, किंतु आपके लिए तो मेरे जैसे अनगिनत जीव व अनुरागी हैं। अतः हे प्राणप्रियतम! आप जैसा भी उचित समझें वैसा व्यवहार करें, बस ऐसी कृपा करें कि हमारे इस निष्काम प्रेम की प्रतिज्ञा का सदा निर्वाह होता रहे।

  12. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  13. आरती राधिका-लाल पर वारौं सहज - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20)

    मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।

  14. राधेराधे नामकी जकलागै ये वीर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)

    हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।

  15. विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।

  16. बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

    हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।

  17. गौरांगी श्रीराधिका प्रीतम की उरहार- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (01)

    गोरे अंगों वाली श्रीराधिका अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय का हार हैं। वे सबके मन को मोहने वाले (मनमोहन) श्रीकृष्ण के मन को भी मोहने वाली हैं तथा अत्यंत कृपालु और परम उदार हैं।

  18. बहुत दिवस देखे बिन बीते - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (86)

    हे ललित लाड़ैती श्री राधे! आपके दर्शन किए बिना बहुत दिन बीत गए हैं। यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो और उसी के कारण आप मुझसे विमुख अथवा उदास हो गई हों, तो कृपापूर्वक उस अपराध को अब क्षमा कर दीजिए और मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए।